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होली: परिवार, समाज और राष्ट्र का हो लेने का पर्व
प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश
होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह भारतीय जीवन-दर्शन का जीवंत उत्सव है। यह ऐसा पर्व है जो व्यक्ति को परिवार से, परिवार को समाज से और समाज को राष्ट्र की व्यापक चेतना से जोड़ देता है। ‘हो लेना’ अर्थात् स्वयं को अहंकार, भेदभाव और संकीर्णताओं से मुक्त कर समष्टि के साथ एकात्म कर लेना।होली इसी भाव की अभिव्यक्ति है।
परिवार के स्तर पर होली स्नेह, क्षमा और पुनर्संयोजन का पर्व है। वर्षभर की व्यस्तता, मतभेद और मौन इस दिन रंगों में घुलकर समाप्त हो जाते हैं। बड़े-बुजुर्गों के चरणों में गुलाल, बच्चों की खिलखिलाहट, घर-आंगन में गूंजते फाग आदि सब मिलकर पारिवारिक संबंधों में नई ऊष्मा भर देते हैं। होलिका-दहन की अग्नि प्रतीक है कि ईर्ष्या, क्रोध और कटुता जलकर राख हो जाए और परिवार प्रेम के रंग में रंग जाए।
समाज के स्तर पर होली समानता और समरसता का संदेश देती है। इस दिन रंग जाति, वर्ग, भाषा और आर्थिक भेद नहीं देखते। सब एक-दूसरे को रंग लगाते हैं।यह व्यवहारिक रूप से सामाजिक समता का पाठ है। लोकगीत, नृत्य, ढोल-नगाड़े और सामूहिक उल्लास समाज को जोड़ते हैं। होली यह सिखाती है कि सामाजिक जीवन में संवाद, हास्य और सहभागिता कितनी आवश्यक है; कठोरता नहीं, बल्कि अपनत्व समाज को मजबूत बनाता है।
राष्ट्रीय स्तर पर होली सांस्कृतिक एकता का उत्सव है। विविधताओं से भरे भारत में यह पर्व उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक समान भाव से मनाया जाता है।कहीं फाग, कहीं शिगमो, कहीं रंगपंचमी के रूप में। अलग-अलग परंपराएँ होते हुए भी उत्सव का मूल भाव एक है: आनंद, मेल-मिलाप और नवसृजन। यह सांस्कृतिक एकात्मता ही राष्ट्र की आत्मा है। होली हमें याद दिलाती है कि हमारी विविधता विभाजन नहीं, बल्कि शक्ति है।
होली का आध्यात्मिक संकेत भी उतना ही गहरा है। यह ऋतु परिवर्तन का पर्व है।
वसंत के आगमन के साथ जीवन में नई ऊर्जा का संचार। रंग यहाँ केवल बाह्य नहीं, आंतरिक भी हैं
-विवेक, करुणा, साहस और सत्य के रंग। होलिका-दहन असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है; प्रह्लाद की कथा हमें बताती है कि आस्था और नैतिकता अंततः विजयी होती है।
आज के समय में होली का संदेश और भी प्रासंगिक है। जब समाज में वैमनस्य, अविश्वास और तनाव बढ़ रहा हो, तब होली हमें ‘हो लेने’ का मार्ग दिखाती है,परिवार के लिए समय निकालने का, समाज के प्रति संवेदनशील होने का और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यनिष्ठ रहने का। यह पर्व हमें संयम, सौहार्द और पर्यावरण-संवेदनशीलता के साथ उत्सव मनाने की प्रेरणा भी देता है।
अंततः, होली रंग लगाने का नहीं, रंग बनने का पर्व है।
प्रेम का, एकता का और राष्ट्रभाव का। जब व्यक्ति परिवार में, परिवार समाज में और समाज राष्ट्र में ‘हो’ जाता है, तभी होली अपने पूर्ण अर्थ में साकार होती है। यही होली का शाश्वत संदेश है।
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