मुंबई की सत्ता और संयम की राजनीति, मेयर की कुर्सी से बड़ा है गठबंधन का भविष्य
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मुंबई महानगरपालिका के चुनावी नतीजों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि महाराष्ट्र की राजनीति केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि प्रतीकों, भावनाओं, स्मृतियों और सत्ता-संतुलन की जटिल बुनावट है। देश की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई में भाजपा का सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरना ऐतिहासिक है। यह संकेत देता है कि शहरी मतदाता ने इस बार परंपरागत राजनीति से हटकर निर्णय लिया है। लेकिन नतीजों के तुरंत बाद जिस तरह मेयर पद को लेकर खींचतान शुरू हुई, उसने जीत की चमक को धुंधला कर दिया है और गठबंधन की मजबूती पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भाजपा के 89 पार्षदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा बनी कि पहली बार मुंबई को भाजपा का मेयर मिलेगा। दूसरी ओर, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के पास 29 पार्षद हैं, जो बहुमत के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। इसी गणित के सहारे शिंदे गुट ने मेयर पद पर ढाई साल का दावा ठोक दिया है। तर्क दिया जा रहा है कि यह साल शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे का जन्म शताब्दी वर्ष है, इसलिए प्रतीकात्मक रूप से मेयर पद शिवसेना के पास होना चाहिए। राजनीति में प्रतीकों का महत्व होता है, इसमें संदेह नहीं, लेकिन सत्ता संचालन केवल प्रतीकों से नहीं चलता, इसके लिए व्यवहारिकता और दूरदर्शिता की जरूरत होती है।
पार्षदों को ताज होटल में शिफ्ट करना, कड़ा पहरा, बंद दरवाजों के पीछे रणनीति बनाना, यह सब दृश्य मुंबई की राजनीति में नया नहीं है, लेकिन यह संकेत जरूर देता है कि अविश्वास की दीवारें ऊंची हो रही हैं। सवाल यह नहीं है कि शिंदे गुट अपनी ताकत दिखा रहा है या भाजपा दबाव में है, सवाल यह है कि क्या यह टकराव उस गठबंधन के हित में है, जिसने कुछ समय पहले तमाम मतभेद भुलाकर महाराष्ट्र की सत्ता संभाली थी।
पिछले विधानसभा चुनाव और उसके बाद की घटनाओं को अगर याद किया जाए, तो यह साफ दिखता है कि भाजपा ने अपने राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया था। उस समय शिवसेना टूट के दौर से गुजर रही थी, संगठन बिखरा हुआ था और शिंदे गुट को वैधता और स्थिरता की सबसे ज्यादा जरूरत थी। भाजपा ने उस वक्त सहयोग का हाथ बढ़ाया, सत्ता साझा की और यह संदेश दिया कि गठबंधन केवल मजबूरी नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी है। आज उसी साझेदारी की परीक्षा मुंबई महानगरपालिका में हो रही है।
मुंबई केवल एक नगर निगम नहीं है। यह बजट, प्रभाव और निर्णय क्षमता के लिहाज से एशिया की सबसे ताकतवर नगरपालिकाओं में से एक है। यहां का मेयर पद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति का भी प्रतीक है। यही कारण है कि उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी भी उम्मीदों के सहारे बयानबाजी कर रही है और कांग्रेस अपनी आंतरिक लड़ाई में उलझी हुई है। लेकिन असली मुकाबला भाजपा और शिंदे गुट के बीच है, और इसका असर राज्य की राजनीति पर दूरगामी हो सकता है।
शिंदे गुट की चिंता समझ में आती है। उद्धव ठाकरे की ओर से लगातार ‘मराठी अस्मिता’ और भावनात्मक राजनीति का कार्ड खेला जा रहा है। ऐसे में शिंदे गुट को डर है कि अगर मुंबई में भाजपा का मेयर बनता है, तो शिवसेना की पारंपरिक पहचान और कमजोर हो सकती है। यही डर उन्हें आक्रामक रुख अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है। लेकिन राजनीति में डर के आधार पर लिए गए फैसले अक्सर नुकसानदेह साबित होते हैं।
व्यवहारिक राजनीति यह कहती है कि गठबंधन में छोटे और बड़े दलों को अपने-अपने दायरे समझने होते हैं। भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते मेयर पद का स्वाभाविक दावा है, जबकि शिंदे गुट के लिए उपमहापौर, स्थायी समिति अध्यक्ष जैसे पद भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। नगर निगम का असली नियंत्रण इन्हीं समितियों और प्रशासनिक ढांचे के जरिए चलता है। अगर इन पदों के कार्यकाल और अधिकार स्पष्ट रूप से तय कर दिए जाएं, तो सत्ता संतुलन बना रह सकता है।
यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि मुंबई के मतदाता ने इस बार किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया है। यह जनादेश सहयोग और समन्वय का संकेत है, न कि टकराव का। अगर भाजपा और शिंदे गुट के बीच खींचतान बढ़ती है, तो इसका सीधा फायदा विपक्ष को मिलेगा। उद्धव ठाकरे की शिवसेना, जो फिलहाल दूसरे नंबर पर है, इसी इंतजार में है कि गठबंधन कमजोर पड़े और उसे नैतिक बढ़त मिले। कांग्रेस की अंदरूनी कलह भी इसी बड़े खेल का हिस्सा बन सकती है।
एकनाथ शिंदे के सामने यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ है। मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने की उनकी यात्रा साहसिक रही है, लेकिन सत्ता में टिके रहने के लिए केवल साहस नहीं, संतुलन भी जरूरी होता है। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि भाजपा के साथ गठबंधन ने ही उन्हें राज्य की राजनीति में केंद्रीय भूमिका दी है। अगर मुंबई में मेयर पद को लेकर टकराव इतना बढ़ जाता है कि गठबंधन की नींव हिलने लगे, तो यह अल्पकालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक नुकसान जैसा होगा।
भाजपा के लिए भी यह जरूरी है कि वह जीत के अहंकार में सहयोगी की भावनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज न करे। राजनीति में जीत तभी टिकाऊ होती है, जब सहयोगियों को सम्मान और हिस्सेदारी का एहसास हो। लेकिन यह सम्मान सत्ता की वास्तविक स्थिति और जनादेश के अनुरूप होना चाहिए, न कि दबाव की राजनीति के तहत।
मुंबई की जनता विकास, सुशासन और स्थिर प्रशासन चाहती है। सड़कें, जल आपूर्ति, कचरा प्रबंधन, आवास, परिवहन जैसे मुद्दे मेयर और नगर निगम के लिए प्राथमिक होने चाहिए। अगर सत्ता संघर्ष इन मुद्दों पर भारी पड़ता है, तो जनता का भरोसा टूटता है और राजनीति अपनी विश्वसनीयता खो देती है।
इस पूरे घटनाक्रम से एक स्पष्ट संदेश निकलता है कि गठबंधन धर्म केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं होता, बल्कि सत्ता चलाने के दौरान और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। एकनाथ शिंदे को इस समय भावनात्मक तर्कों से ऊपर उठकर व्यवहारिक फैसला करना चाहिए। बालासाहेब ठाकरे के नाम और विरासत का सम्मान सत्ता की कुर्सी से नहीं, बल्कि स्थिर और जनहितकारी शासन से होता है। अगर मुंबई में भाजपा के मेयर बनने से गठबंधन मजबूत रहता है और शिवसेना को अन्य महत्वपूर्ण पदों के जरिए प्रभावी भूमिका मिलती है, तो यह सभी के लिए लाभकारी होगा।
अंततः, मुंबई की राजनीति केवल मेयर पद तक सीमित नहीं है। यह महाराष्ट्र की सत्ता, भविष्य की चुनावी दिशा और गठबंधन की विश्वसनीयता से जुड़ी हुई है। एकनाथ शिंदे और भाजपा दोनों के लिए यह समय संयम, संवाद और समझदारी का है। अगर इस परीक्षा में व्यवहारिकता जीतती है, तो मुंबई ही नहीं, पूरा महाराष्ट्र एक स्थिर और मजबूत राजनीतिक संदेश देखेगा।
कांतिलाल मांडोत
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