टेलीविज़न: जो जोड़ता, दिखाता और दिशा देता रहा

टेलीविज़न: कल्पना से हक़ीक़त तक की सबसे बड़ी क्रांति

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वह स्क्रीन जिसने मानवता को एक ही फ्रेम में बाँध दिया

कुछ आविष्कार बदले नहीं जातेवे हमें बदल देते हैं। टेलीविज़न ऐसा ही एक आविष्कार है। उसने कभी दरवाज़े पर खड़े होकर नहीं पूछा कि आप अमीर हैं या गरीबकस्बे में रहते हैं या महानगर मेंबस एक तार खींचा और पूरी दुनिया को घर के आँगन में खोल दिया। हर सुबह आँख खुलते ही आपकी नज़र सबसे पहले किसे खोजती हैउसी छोटे-से काले रिमोट कोजो एक बटन में समूची दुनिया को आपके कमरे में बुला लेता है। आज हम उस जादुई खिड़की को सलाम कर रहे हैं जिसने इंसान की कल्पना को हक़ीक़त में ढाल दिया—टेलीविज़न को। यह महज़ मशीन नहींएक क्रांति है। एक तिलिस्म है। एक ऐसा दर्पणजिसमें हम अपने आप को देखते हैं—हँसते हुएडरते हुएरोते हुए और हर बार थोड़ा बदलते हुए।

सोचिए ज़रा। 1920 के दशक में जब जॉन लोगी बेयर्ड ने पहली बार चलती तस्वीरें प्रसारित की थींतब किसी ने कल्पना भी न की थी कि एक दिन यही डिब्बा दुनिया को अपने आगे झुका लेगा। 1947 में भारत आज़ाद हुआऔर 1959 में दिल्ली के आकाश में पहला टेलीविज़न टावर खड़ा हुआ। उस दिन दूरदर्शन ने सिर्फ़ तरंगें नहीं भेजीं—एक साझा सपना भेजा। गाँव की चौपाल से लेकर मेट्रो के कोच तकहर जगह एक ही आवाज़ गूँजने लगी। हम अलग-अलग थेपर एक साथ सुबके जब ‘महाभारत’ में भीष्म शर-शय्या पर लेटेहम साथ गूँजे जब कपिल देव ने लॉर्ड्स की बालकनी में विश्व कप उठाया। टेलीविज़न ने हमें सिर्फ़ जोड़ा नहीं—हमें एक राष्ट्र होने का एहसास दिया।

रंग आया और जैसे किसी ने समय की नसों में नया खून दौड़ा दिया। 1982 का एशियाड सिर्फ़ खेल नहीं थावही वह पल था जब भारत ने पहली बार टेलीविज़न की आँखों से खुद को रंगों में देखा। दुकानों पर सजे नए टीवी ऐसे लगते थे मानो शहर अपनी ही परछाईं को चकित होकर निहार रहा हो। सीता-हरण का दृश्य देखकर माँओं ने आँचल से आँसू पोंछेऔर बच्चों ने पहली बार नीला आकाश सचमुच के नीले में चमकता देखा। टेलीविज़न सिर्फ़ दिखाता नहीं था—वो हमें जीना सिखाता था। ‘हम लोग’ ने हमें बताया कि साधारण इंसान भी असाधारण संघर्ष कर सकता है। ‘बुनियाद’ ने बँटवारे के घावों को फिर से कुरेदाताकि हम भूल न जाएँ कि नफ़रत की कीमत कितनी भारी होती है।

और फिर आया 90 का दशक। स्टारज़ीसोनी। एक चैनल से सैकड़ों चैनलसैकड़ों आवाज़ें। दूरदर्शन का एकाधिकार टूटा और सपनों की खुली मंडी लग गई। ‘शांति’ ने बताया कि औरत भी बोल सकती है। ‘तारा’, ‘हिप हिप हुर्रे’ ने दिखाया कि बच्चे भी इंसान होते हैं। केबल वाला भैया जब छत पर एंटीना घुमाता थातो हम सैटेलाइट के ज़रिए पूरी दुनिया को अपने ड्रॉइंग रूम में बुला लेते थे। सीएनएन पर गल्फ वॉर लाइव देखाएमटीवी पर माइकल जैक्सन को मूनवॉक करते देखा। टेलीविज़न अब सिर्फ़ भारतीय नहीं रहा, वो ग्लोबल हो गया।

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फिर आया रियलिटी टीवी का दौर—जहाँ स्क्रीन सिर्फ़ कहानी नहींकिस्मत लिखने लगी। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ ने साबित किया कि आम आदमी भी करोड़पति बन सकता है। एक सवालएक जवाबऔर पूरी ज़िंदगी बदल जाती है। ‘इंडियन आइडल’ ने गलियों के गवैयों को स्टार बनाया। ‘बिग बॉस’ ने हमें दिखाया कि इंसान कितना नीचे गिर सकता है जब कैमरा 24 घंटे उस पर लगा हो। टेलीविज़न अब महज़ मनोरंजन नहीं रहावो समाज का असली आईना बन गयाकभी हँसाताकभी रुलाताकभी उबाल देताऔर कभी अपनी ही परछाईं से शर्मिंदा कर जाता।

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आज जब हम नेटफ्लिक्सप्राइमहॉटस्टार पर बिंज करते हैंतब भी टेलीविज़न ज़िंदा है। वो अब सिर्फ़ डिब्बा नहीं—वो हमारी जेब में हैहमारी उँगलियों पर है। पर उसकी असली ताकत अब भी वही है—लोगों को एक साथ बाँधने की। 2020 का लॉकडाउन याद हैजब ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ फिर से चले थेतो पूरा देश एक ही समयएक ही सांस में कहानी देख रहा था। करोड़ों स्क्रीन पर एक ही दृश्य। एक ही संवाद। एक ही भाव। टेलीविज़न ने फिर साबित किया—वो सिर्फ़ तकनीक नहींवो भावना है। वो संस्कृति है। वो स्मृति है।

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विश्व टेलीविज़न दिवस हमें ठहरकर यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम इस स्क्रीन को आखिर कैसे  देख रहे हैं—सिर्फ़ मनोरंजन उगलती मशीन के रूप मेंया दुनिया को नया अर्थ देने वाली एक अतिरिक्त आँख के रूप मेंटीवी केवल देखने की क्रिया नहींजागने का अनुभव भी बन सकता है। यह बताता है कि कहानियों की शक्ति असीम हैकि कभी-कभी एक अकेला दृश्य हज़ार शब्दों से भी गहरी चोट या गहरा सुकून दे सकता है। यही वह ताकत है जिसने हमें स्थानीय चौखट से उठाकर वैश्विक नागरिक बनाया—दृष्टि को सीमाओं की दीवारों के पार ले जाकर। और यही याद दिलाता है कि इंसान की कहानी चाहे कहीं भी जन्म लेउसकी गूँज दुनिया के हर कोने में सुनाई दे सकती है।

इस दिन यह स्वीकार करना जरूरी है कि टेलीविज़न ने न सिर्फ हमारी आदतेंबल्कि हमारी संवेदनाएँ भी बदल दी हैं। उसने हमें वह दुनिया दिखा दीजिसके दरवाज़े शायद हमारे लिए कभी खुल ही नहीं पाते। यह वह प्रकाश है जो समय के अंधेरे कोनों को चीरकर हमारे पास आता है—कभी चेतावनी बनकरकभी उम्मीद बनकर। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी खासियत है: टेलीविज़न ऐसा माध्यम है जो सिर्फ बताता नहींबल्कि जोड़ता हैसिर्फ दिखाता नहींबल्कि दिशा देता हैऔर सिर्फ मनोरंजन नहीं करताबल्कि मानवता के साझा भविष्य पर अपनी तेज़गहरी स्याही से खिंचती हुई एक अमिट रेखा है।

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