बिहार : क्या यही है 'सुशासन' के दावों की हक़ीक़त ?
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बिहार विधानसभा चुनाव अपने अंतिम पड़ाव की ओर अग्रसर है। दावों प्रतिदावों और आरोपों व प्रत्यारोपों का दौर अपने चरम पर है। सत्ता की तरफ़ से चुनाव जीतने के लिये सबसे अधिक ज़ोर लगाया जा रहा है। हरियाणा सहित कई अन्य भाजपा शासित राज्यों से तो बिहारी मतदाताओं को विशेष ट्रेन्स द्वारा मतदान करने हेतु बिहार भेजा जा रहा है। उधर भाजपा स्टार प्रचारक नीतीश सरकार को 'सुशासन' व भ्रष्टाचार मुक्त सरकार के रूप में प्रचारित करते नहीं थक रहे।
परन्तु सुशासन व भ्रष्टाचार मुक्त बिहार के इन्हीं दावों के बीच कुछ ऐसे सनसनीख़ेज़ रहस्योद्घाटन हो रहे हैं व घटनायें घटित हो रही हैं जिन्होंने बिहार में 'सुशासन' व भ्रष्टाचार मुक्त सरकार की क़लई खोल कर रख दी है। हैरानी की बात तो यह है कि इसतरह के खोखले दावों की हवा निकालने में किसी सत्ता विरोधी दल या विपक्ष की कोई भूमिका नहीं है बल्कि स्वयं भाजपा-जे डी यू के नेता ही इस 'क़लई खोल अभियान ' के मुख्य सूत्रधार हैं।
सबसे पहले तो ज़िक्र करते हैं पूर्व केंद्रीय मंत्री राजकुमार सिंह (आरके सिंह) के बयानों का। आर के सिंह बिहार के आरा से दो बार सांसद रह चुके हैं और मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में वे ऊर्जा मंत्री थे। उनकी गिनती भाजपा के वरिष्ठ नेता के रूप में होती है। सर्वप्रथम तो आर के सिंह ने चुनाव अभियान के बीच ही गत 20 अक्टूबर को एक वीडियो संदेश जारी कर मतदाताओं से अपील की थी कि वे अपराधी और भ्रष्ट छवि वाले उम्मीदवारों को वोट हरगिज़ न दें। उन्होंने विशेष रूप से जेडीयू के मोकामा से उम्मीदवार अनंत सिंह व भाजपा के तारापुर से उम्मीदवार व बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का नाम लिया था।
उस सन्देश में सिंह ने यहां तक कहा था कि ऐसे उम्मीदवारों को वोट देना "चुल्लू भर पानी में डूब मरने" से भी बदतर है, क्योंकि ये "जनता का ख़ून चूस रहे हैं"। उन्होंने यह भी कहा था कि 'आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को हटाकर ही बिहार का विकास संभव है, और यदि सभी उम्मीदवार ऐसे हों तो मतदाता नोटा का विकल्प चुनें'। सिंह ने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले इसी तरह के कुल 8 उम्मीदवारों के नाम लिए। अब आरके सिंह के इस बयान को भाजपा के अंदर सुलग रही बग़ावत की चिंगारी के रूप में देखा जा रहा है।
आर के सिंह के उपरोक्त बयानों पर अभी चर्चा चल ही रही थी कि पिछले दिनों उन्होंने बिजली घोटाला सम्बन्धी एक और बड़ा धमाका कर दिया। उन्होंने बिहार की एनडीए सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। ये आरोप मुख्य रूप से बिहार में बिजली विभाग से जुड़े 62,000 करोड़ रुपये के घोटाले से संबंधित हैं, जो बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के ठीक पहले यानी गत 4 नवंबर को सामने लाये गये हैं। इन आरोपों के अनुसार बिहार सरकार ने एक थर्मल पावर प्लांट के निर्माण के लिए अदानी ग्रुप से सम्बंधित एक कंपनी को अत्यधिक ऊंची क़ीमत पर अनुबंध दिया।
इस अनुबंध के तहत कंपनी को 25 वर्षों के लिए बिजली की क़ीमत 6.075 रुपये प्रति यूनिट निर्धारित की गई, जो बाज़ार दर से काफ़ी अधिक है। इससे सरकार को पूंजी की वापसी के साथ-साथ अतिरिक्त लाभ होगा, जो कुल 62,000 करोड़ रुपये का नुक़्सान बिहार के बिजली उपभोक्ताओं को पहुंचाएगा। उन्होंने बिहार सरकार के बिजली विभाग के कई अधिकारियों को इस घोटाले के लिये आरोपित करते हुये सीबीआई से इसकी निष्पक्ष जांच कराने की मांग की, ताकि दोषियों पर कार्रवाई हो सके। सिंह का आरोप है कि यह घोटाला सीधे तौर पर बिहार के लोगों को प्रभावित करेगा, क्योंकि बिजली के दाम बढ़ेंगे। इससे पहले भी आर के सिंह राज्य की 'सुशासन ' कही जाने वाली नीतीश सरकार पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगा चुके हैं। परन्तु चुनावों के बीच उनके द्वारा लगाये जा रहे उपरोक्त गंभीर आरोपों ने बिहार में कोहराम मचा दिया है। विपक्षी महागठबंधन इन आरोपों को अपने हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।
दूसरी बड़ी घटना केंद्रीय मंत्री लल्लन सिंह से संबंधित है। गत 4 नवंबरको पटना ज़िला प्रशासन ने लल्लन सिंह के विरुद्ध एफ़ आई आर दर्ज की है। ललन सिंह ने मोकामा में जेडीयू प्रत्याशी अनंत सिंह जोकि इस समय दुलारचंद यादव हत्याकांड के मामले में बेऊर जेल में बंद हैं के समर्थन में किये जा रहे प्रचार के दौरान एक सभा में कहा कि "कुछ नेताओं को वोटिंग के दिन घर में बंद कर दो। घर से उसी को निकलने दो जो हमारे पक्ष में वोट करे। अगर ज़्यादा हाथ-पैर जोड़े तो अपने साथ ले जाकर वोट गिराने देना है।" ग़ौर तलब है कि अनंत सिंह की गिरफ़्तारी के बाद ललन सिंह ही उनके चुनाव प्रचार की कमान संभाल रहे थे। विपक्ष ने ललन सिंह के इस बयान को "लोकतंत्र पर हमला" बताया और कहा कि यह ग़रीब वोटरों को डराने की साज़िश है।
अब इन घटनाओं व बयानों के सन्दर्भ में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दावों का ज़िक्र भी ज़रूरी है। एक ओर तो आर के सिंह व ललन सिंह जैसे भाजपा-जे डी यू के केंद्रीय स्तर के नेताओं के बयान बिहार में भ्रष्टाचार, कुशासन व जंगल राज की तस्वीर पेश कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ गृह मंत्री अमित शाह इन्हीं चुनाव प्रचार के दौरान जनसभाओं में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार को 'भ्रष्टाचार मुक्त' सरकार का प्रमाणपत्र दे रहे हैं। शाह के अनुसार नीतीश कुमार पर " चवन्नी के भ्रष्टाचार' का भी आरोप नहीं लगा है"।
उनके अनुसार केवल नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार, जिन पर चार आने का भी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है, वे ही बिहार का विकास कर सकते हैं।" वे केंद्र में मोदी सरकार के 11 वर्षों और बिहार में नीतीश के 20 वर्षों के शासन को "भ्रष्टाचार मुक्त" बताते हैं जबकि विपक्ष पर घोटालों का आरोप लगाने के साथ ही लालू यादव के 20 वर्ष पूर्व के कथित 'जंगल राज ' की भी याद दिलाना नहीं भूलते। ऐसे में आर के सिंह के व लल्लन सिंह जैसे सत्ता से जुड़े केंद्रीय नेताओं के ही बयान क्या यह सवाल नहीं खड़ा करते कि क्या यही है बिहार में 'सुशासन' के दावों की हक़ीक़त ?
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