धार्मिक मंचों पर 'अश्लीलता' समाज और धर्म के लिए घातक।

धार्मिक मंचों पर 'अश्लीलता' समाज और धर्म के लिए घातक।

स्वच्छंद होकर धार्मिक मंचों से मनमानी करते है। और उस स्वच्छंदता का धार्मिक कार्यक्रम से तनिक भी लेना देना नही है।


स्वतंत्र प्रभात 
 

संतोष तिवारी रिपोर्टर


वैसे तो संविधान ने देश के हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया है। जिससे लोग पूरी तरह से स्वतंत्र है लेकिन यह स्वतंत्रता कही कही ऐसा उदाहरण पेश करती है कि लोग स्वच्छंद होकर धार्मिक मंचों से मनमानी करते है। और उस स्वच्छंदता का धार्मिक कार्यक्रम से तनिक भी लेना देना नही है।


 और अब तो धार्मिक मंचों पर अश्लीलता भी देखने को मिलती है। लेकिन इस तरह के कुत्सित विचारधारा और सोच को रोके कौन? क्योंकि किसी भी कार्यक्रम के आयोजकों की सहमति से इस तरह के कार्यक्रम होते है। और आयोजको का तर्क भी होता है कि जब मनोरंजन नही होगा तो जनता नही आयेगी। 

अब यहां सवाल उठता है कि अपनी संस्कृति और धार्मिक पवित्रता को खराब करके भीड़ इक्ट्ठा करना ही मात्र धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजको का उद्देश्य हो गया है। जिस मंच से समाज को धार्मिक प्रगाढ़ता, अपनी संस्कृति और संस्कार को मजबूती देने का कार्य होना चाहिए उस मंच से धार्मिक कार्यक्रम के नाम पर केवल मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता का उदाहरण देखने को मिलता है। बेशक ऐसे आयोजनों से संस्कृति और संस्कार को भारी नुकसान हो रहा है। 

 इस तरह के मनमानी को रोकना नितांत आवश्यक है। क्योकि इस तरह का कार्यक्रम आगे आने वाली पीढियों के लिए बेहद ही खतरनाक साबित होगा। अभी तो आयोजक केवल मनोरंजन के नाम पर धार्मिक मंचों पर  नर्तकियों का नृत्य कराते है और कभी कभी ऐसे गीत भी बचते है जो सच में धार्मिक मंच के लिए काफी नुकसानदेह है। धार्मिक मंचों से समाज को एक संदेश दिया जाता है और भगवान के लीलाओं का मंचन होता है।

 जिसमें रामलीला, रासलीला, जागरण या अन्य समारोह होते है जिसमें भगवान के आदर्श चरित्र का मंचन होता जिससे लोग भगवान के चरित्र से सीख कर अपने परिवार, समाज में अच्छा करें लेकिन इन्ही धार्मिक मंचों से जब बेवजह के गीत व नृत्य केवल मनोरंजन के नाम पर जोड़ कर कार्यक्रम को अच्छा बनाने की धुन में अपनी धार्मिक धरोहर के साथ खिलवाड़ किया जाता है जो कही न कही समाज के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

 अपनी धार्मिक पवित्रता बनाये रखना सभी का कर्तव्य है। मनोरंजन और अश्लीलता के लिए और भी मंच और कार्यक्रम होने चाहिए न कि देवी देवताओं और महापुरूषों के नाम पर हो रहे आयोजन और कार्यक्रम में इस तरह के कार्य हों। धार्मिक समारोह में आध्यात्मिक संदेश देने और उनके पात्रों के चरित्र को अपने जीवन में उतारने का प्रयास होता है। लेकिन इसी बीच नर्तकियों का नृत्य और वह भी अश्लील गीतों पर जहां पर महिलाएं, बच्चे और परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठे रहते है 

और इसका दुष्प्रभाव बहुत बडा होता है। रामायण में सर्वविदित है कि राजा जनक उच्च कोटि के विद्वान थे और आज की रामलीला में जब राजा जनक का भी दरबार का मंचन होता है तो राजा जनक के दरबार का एक 'जोकर' तुरंत ही दरबार में किसी नाचने वाली को बुलाओ कहकर 'भीड़' को रोकने का अनोखा प्रयास करता है। और जोकर की यह बात मौजूद दर्शकों को भी खुब अच्छी लगती है और उनके मन में एक अपार खुशी होती है। 

क्योकि दर्शको को अब लगता है कि अब इस मंच से नर्तकियों द्वारा कोई धमाकेदार नृत्य होगा जो मन को काफी सुकून देगा। लेकिन क्या कभी हम सोचते है कि राजा जनक के विद्वता का क्या स्तर था और आज के जोकर केवल भीड़ बनी रहे इसके लिए राजा जनक जैसे विद्वान को भी बलि का बकरा बनाकर अपने नयनों को सुख देने के लिए किसी नाचने वाली को बुला लेते है। जो केवल धार्मिक पवित्रता को नष्ट और बर्बाद करने के अलावा कुछ नही है।

 यदि मंच पर जब कोई राक्षस का दरबार लगा हो तो यह बात कुछ हद तक जमती है लेकिन किसी राक्षस के दरबार में भी अश्लील गीतों पर नृत्य कराना उचित नही है। आजकल कृष्ण लीला के नाम पर भी भाड़े के नचनिये भी अश्लीलता की सारे हदें पार कर देते है।

 जो केवल भगवान कृष्ण और राधा समेत सखियों को केवल अपने जैसे गंदा ही समझते है जबकि भगवान कृष्ण की लीला अपने आप में अद्वितीय रही। देखा जाता है कि तथाकथित मथुरा, वृंदावन का कलाकार कहने वाले भाड़े के लोग जिनको कृष्ण सही से लिखने नही आता है वे भी एक किलो मुंह में रंग पोत कर भगवान कृष्ण और चंद रूपये के लिए अपनी अश्लीलता की परिचय देने वाली कलाकर राधा और सखियां बनती है।

 और केवल नृत्य करके रासलीला का ढोंग करते है। जबकि कभी कभी इन्ही रासलीला करने वाले ऐसा नृत्य और कृत्य करते है जो बेहद ही घृणित है। जो केवल भगवान कृष्ण और देवी राधा समेत सखियों को बदनाम करती है। क्योकि जिस तरह ये तथाकथित भाड़े के नर्तक नाचते है वह समाज के लिए सही के जगह गलत संदेश देता है। हालांकि कुछ लोग धार्मिक पवित्रता को बनाये रखने में ध्यान भी देते है। 

इसलिए समाज के जिम्मेदार लोगो को चाहिए कि धार्मिक कार्यक्रमों के नाम पर किसी तरह की अश्लीलता को पूरी तरह से रोकने में आगे आये और जो भी धार्मिक कथा से जुड़ी बाते हो उसी को मंचन करें। क्योकि आज यदि हम थोडी सी लापरवाही करते है तो आगे आने वाली पीढी और लापरवाही करेगी और एक दिन ऐसा आयेगा कि हमारी धार्मिक स्वच्छंदता ही कलंक बन जायेगा। जब लोग किसी धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होते है

 तो उनको ऐसा संदेश मिले कि यदि वे कार्यक्रम के बाद घर जाये तो कुछ अच्छा सीखकर जाये। नही तो यदि धार्मिक समारोह में अश्लीलता और फालतू चीजे होंगी तो बेशक उनके दिमाग में वही चीज घर करेंगी और उसका ही असर देखने को मिलेगा।

 हम देखते है कि धार्मिक कार्यक्रम में पुरूषों की अपेक्षाकृत महिलाएं अधिक शामिल होती है। और महिलाएं अपने बच्चों और परिवार के लिए रीढ़ होती है। इसलिए धार्मिक कार्यक्रम में अश्लीलता और फालतू चीजों पर पूरी तरह रोक होनी चाहिए। 


इस पर रोक न केवल हमारी समाज को मजबूती प्रदान करेगा बल्कि धार्मिक मान्यताओं को भी और प्रभावी बनायेगा। किसी भी धार्मिक कार्यक्रम में केवल उस प्रसंग से जुडी ही चीजे हो न कि मनोरंजन के लिए नृत्य या अश्लील गीत व कार्यक्रम का आयोजन हो। तभी हमारी धार्मिक स्वतंत्रता का सही लाभ मिल पायेगा।

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