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राजनीति
पश्चिमी बंगाल की बंपर वोटिंग रचेगी नया खेला
मगर पश्चिम बंगाल का यह चुनाव यह भी दिखाता है कि लोकतंत्र में सुधार धीरे-धीरे ही संभव है
मनोज कुमार अग्रवाल
देश के अब तक के संवैधानिक इतिहास में पहली बार किसी राज्य का चुनाव मतदान है जिसमें इतना बंपर तादाद में मतदाताओं ने अपने अधिकार का इस्तेमाल कर नया रिकार्ड बनाने की पहल की है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में राज्य की जनता ने इस बार बंपर मतदान किया है, जो राज्य की राजनीतिक चेतना, सामाजिक सक्रियता और लोकतांत्रिक भागीदारी का जीवंत उदाहरण है। पहले चरण में 89.93 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है, जो सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक चेतना, सामाजिक सक्रियता और लोकतांत्रिक भागीदारी का जीवंत उदाहरण है। जब लगभग नब्बे प्रतिशत मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं, तो यह स्पष्ट संकेत देता है कि जनता केवल दर्शक नहीं रहना चाहती,जनता जागरूक हो चुकी है बल्कि सत्ता के गठन में सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि इस बंपर वोटिंग के मायने क्या है और क्यों तृणमूल कांग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी दोनों ही अपनी-अपनी जीत के दावे कर रही हैं।
इन सबके बीच सबसे पहले, इतने बड़े पैमाने पर मतदान को लोकतंत्र की मजबूती के रूप में देखा जाना चाहिए। अक्सर यह धारणा रही है कि शहरी क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत कम रहता है और ग्रामीण इलाकों में अपेक्षाकृत अधिक, लेकिन इस बार जिस तरह से हर वर्ग महिला, युवा, बुजुर्ग ने मतदान में बढ़-चड़कर हिस्सा लिया, वह एक सकारात्मक बदलाव का संकेत है। यह दर्शाता है कि लोगों में अपने अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूकता बढ़ी है। खासकर महिलाओं को बड़ी भागीदारी यह संकेत देती है कि वे अब केवल सामाजिक नहीं, बल्कि राजनीतिक निर्णयों में भी अपनी भूमिका मजबूत कर रही हैं। सबसे बड़ी बात है कि इस बार का चुनाव पूर्व में बंगाल में हुए चुनावों के मुकाबले हिंसा कम हुआ है।
बंगाल में चुनावी हिंसा का लंबा इतिहास रहा है। हालांकि यह भी सच है कि मुर्शिदाबाद के नौदा और बीरभूम के खैराशोल जैसे क्षेत्रों में हिंसा और और ईवीएम ईवीएम से से जुड़ी शिकायतों कायतों ने ने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। झड़पें, पथराव और तोड़फोड़ की घटनाएं यह बताती हैं कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब भी कई जगहों पर असहिष्णुता में बदल जाती है। चुनाव आयोग और प्रशासन की जिश्वमेदारी है कि ऐसी घटनाओं पर सख्ती से कार्रवाई कर भरोसा कायम रखें। नौदा में हुमायूं कबीर द्वारा लगाए गए आरोप और खैराशोल में ईवीएम गड़बड़ी की शिकायतें केवल स्थानीय घटनाएं नहीं हैं, बल्कि वे उस व्यापक चुनौती की ओर इशारा करती हैं, जिसमें निष्पक्षता और पारदर्शिता को लगातार परखा जाता है।
लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विश्वास की एक सतत प्रक्रिया है, जिसे बनाए रखना सभी संस्थाओं की जिम्मेदारी है। इसके बावजूद, यह स्वीकार करना होगा कि इस बार केंद्रीय बलों और राज्य पुलिस की तैनाती ने कई संभावित बड़ी घटनाओं को रोका है। इसी तरह बीरभूम के खैराशोल और अन्य इलाकों में ईवीएम में गड़बड़ी के आरोपों के बाद जो हिंसक झड़पें हुईं, वे तकनीकी विश्वास के संकट को सामने लाती हैं। जब मतदाता यह महसूस करने लगते हैं कि उनका बोट सही जगह नहीं जा रहा है, तो उनका आक्रोश स्वाभाविक है। हालांकि इस तरह की शिकायतों की सत्यता की जांच जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि चुनाव आयोग और प्रशासन इस तरह की आशंकाओं को तुरंत और पारदर्शी तरीके से दूर करें। बंगाल में चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं है।
इसका इतिहास लंबा और जटिल रहा है। 1977 में वाम मोर्चा के सत्ता में आने के बाद से लेकर पंचायत राजनीति तक, सत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण की लड़ाई ने कई बार हिंसक रूप लिया। 'पार्टी सोसाइटी' जैसी अवधारणाएं इसी पृष्ठभूमि में जन्मी, जहां राजनीति ने सामाजिक ढांचे को पूरी तरह प्रभावित किया। 1993 की कोलकाता फायरिंग, सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलन, और 2011 के बाद के राजनीतिक बदलाव इन सभी घटनाओं ने यह दिखाया कि बंगाल की राजनीति में टकराव एक स्थायी तत्व बन चुका था। तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद उम्मीद थी कि हिंसा की संस्कृति में कमी आएगी, लेकिन 2018 के पंचायत चुनाव, 2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव ने इस उम्मीद को पूरी तरह साकार नहीं होने दिया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी इस दिशा में संकेत करते हैं कि राजनीतिक हत्याओं के मामले में पश्चिम बंगाल लंबे समय से शीर्ष राज्यों में रहा है।
हालांकि इन आंकड़ों पर अक्सर बहस होती रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान हिंसा की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। ऐसे परिदृश्य में 2026 के पहले चरण में अपेक्षाकृत कम हिंसा होना एक सकारात्मक संकेत जरूर है। खासकर यह तथ्य कि अब तक किसी बड़ी जानलेवा भटना की खबर नहीं आई है, राहत देने वाला है। जहां पहले चुनावी हिंसा आम बात होती थी, वहां अच नियंत्रण और सतर्कता दिखाई दे रही है। यह सुधार लोकतांत्रिक संस्थाओं के मजबूत होने का संकेत है। लेकिन छिटपुट झड़पें, बमबाजी और तोड़फोड़ की घटनाएं यह याद दिलाती हैं कि अभी बहुत कुछ बदलना बाकी है। मगर पश्चिम बंगाल का यह चुनाव यह भी दिखाता है कि लोकतंत्र में सुधार धीरे-धीरे ही संभव है।
हिंसा में कमी एक सकारात्मक कदम है, लेकिन पूरी तरह शांतिपूर्ण चुनाव अभी भी एक लक्ष्य है, जिसे हासिल करना बाकी है। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक सख्ती और सामाजिक जागरूकता तीनों का समन्वय जरूरी है। हालांकि इन सबके बीच अच्छी बात यह है कि पिछले साल का रिकॉर्ड टूटा है, 2021 के विधानसभा चुनाव में 83.17 और 2016 विधानसभा चुनाव 82.66 प्रतिशत मतदान हुआ था, इस बार यह आंकड़ा 92 या 93 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। अब सवाल यह है कि बंपर वोटिंग का फायदा किसे होगा? राजनीतिक विश्लेषकों की राय अक्सर इस मुद्दे पर बंटी रहती है।
एक पक्ष का मानना है कि उच्य मतदान प्रतिशत आमतौर पर सत्ता विरोधी लहर का संकेत होता है, यानी लोग बदलाव चाहते हैं और इसलिए बड़ी संख्या में वोट डालने निकलते हैं। यदि इस तर्क को मानें, तो यह भाजपा के पक्ष में जा सकता है, जो खुद को परिवर्तन का विकल्प बताती रही है। वहीं दूसरा पक्ष यह मानता है कि अधिक मतदान का मतलब यह भी हो सकता है कि सत्तारूवु दल के समर्थक अपने आधार को मजबूत करने के लिए अधिक संख्या में मतदान कर रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा और ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी पकड़ को देखते हुए यह तर्क भी कमजोर नहीं है।
खासकर उन क्षेत्रों में जहां सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ लोगों तक पहुंचा है, वहां सत्तारूढ़ दल के समर्थन में अधिक मतदान देखा जा सकता है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि राज्य के लोगों ने एसआईआर के विरोध में वोटिंग किया है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल इस बंपर मतदान को अपने-अपने तरीके से व्याख्यायित कर रहे हैं। तृणमूल इसे अपनी नीतियों और जनकल्याणकारी योजनाओं की स्वीकृति के रूप में देख रही है, जबकि भाजपा इसे बदलाव की इच्छा और सत्ताविरोधी लहर का संकेत बता रही है। सच्वाई इन दोनों के बीच कहीं हो सकती है, जिसका फैसला केवल मतगणना के दिन ही स्पष्ट होगा। अंततः, यह कहा जा सकता है कि 89.93 प्रतिशत मतदान पश्चिम बंगाल के लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है। यह दर्शाता है कि जनता अब अपने अधिकारों के प्रति सजग है और वह अपने भविष्य को तय करने में सक्रिय भूमिका निभाना चाहती है। चाहे परिणाम किसी के भी पक्ष में जाए, इस बंपर वोटिंग ने यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र की असली ताकत जनता के हाथ में है।
दरअसल पं बंगाल का चुनाव ममता बनर्जी की तृणमूल और भाजपा के बीच सत्ता पाने का अखाड़ा तो है ही इसमे दोनों के समर्थक वोटर भी आरपार के मूड में आ चुके हैं लंबे समय से सत्ता में काबिज ममता बनर्जी मुसलिम तुष्टिकरण की राजनीति और कानून व्यवस्था के बिगडते हालात के कारण राज्य के एक बड़े मतदाता वर्ग के भी निशाने पर है राज्य में बड़ी संख्या में केंद्रीय सुरक्षा बल की तैनाती ने छापा वोटिंग को नियंत्रित कर मतदाता को सुरक्षा प्रदान करने का काम किया है यही कारण है कि बंपर वोटिंग हुई है और परिणाम भी चौकाने वाला आएगा।
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