पांच राज्यों के चुनाव में कानून व्यवस्था सबसे बड़ी कसौटी

आरोप-प्रत्यारोप के बीच लोकतंत्र की परीक्षा

Swatantra Prabhat UP Picture
Published On

देश के पांच महत्वपूर्ण राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों ने राजनीतिक तापमान को चरम पर पहुंचा दिया है। पश्चिम बंगाल असम तमिलनाडु केरल और पुडुचेरी में चुनावी गतिविधियां तेज हैं, लेकिन इस बार सबसे अधिक चर्चा कानून व्यवस्था को लेकर हो रही है। राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष और शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हो पाएंगे या नहीं।

सबसे अधिक विवाद और तनाव पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस पर चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने का गंभीर आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि राज्य में प्रशासनिक तंत्र निष्पक्ष नहीं है और मतदाताओं को डराने-धमकाने का प्रयास किया जा रहा है। इन आरोपों के बाद मामला भारत निर्वाचन आयोग तक पहुंच चुका है। यह स्थिति कानून व्यवस्था की दृष्टि से चिंताजनक मानी जा रही है क्योंकि जब सत्तारूढ़ दल पर ही इस प्रकार के आरोप लगते हैं तो चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

दूसरी ओर ममता बनर्जी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए विपक्ष पर भ्रामक प्रचार करने का आरोप लगाया है। राज्य में पहले भी चुनावों के दौरान हिंसा और तनाव की घटनाएं सामने आती रही हैं। इस बार भी पूरक मतदाता सूची को लेकर असमंजस और लाखों नामों पर विचाराधीन स्थिति ने प्रशासनिक चुनौती को और बढ़ा दिया है। स्पष्ट है कि बंगाल में कानून व्यवस्था चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है और इसे संभालना प्रशासन के लिए बड़ी परीक्षा है।

पूर्वोत्तर के राज्य असम में भी स्थिति पूरी तरह शांत नहीं कही जा सकती। यहां कांग्रेस और एआईयूडीएफ कार्यकर्ताओं के बीच झड़प की घटना सामने आई है, जिसने चुनावी माहौल में तनाव का संकेत दिया है। यह घटना दर्शाती है कि जमीनी स्तर पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कभी-कभी टकराव का रूप ले लेती है। हालांकि राज्य में सत्तारूढ़ पक्ष लगातार यह दावा कर रहा है कि कानून व्यवस्था पहले की तुलना में बेहतर हुई है, लेकिन इस तरह की घटनाएं चुनाव के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े करती हैं।

तमिलनाडु में स्थिति अपेक्षाकृत शांत दिखती है, लेकिन यहां भी राजनीतिक गतिविधियां काफी तेज हैं। नामांकन, रैलियां और जनसंपर्क कार्यक्रमों के बीच प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि कहीं भी अव्यवस्था या टकराव की स्थिति न बने। विभिन्न दलों के नेताओं के बीच बयानबाजी जरूर तेज है, परंतु अभी तक बड़े स्तर पर हिंसक घटनाओं की खबर नहीं है। यह राज्य परंपरागत रूप से अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण चुनावों के लिए जाना जाता है, लेकिन सतर्कता यहां भी जरूरी है क्योंकि चुनावी प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।

दक्षिण भारत के ही केरल में चुनावी प्रक्रिया एक अलग ही स्वरूप में नजर आती है। यहां राजनीतिक चेतना उच्च स्तर की मानी जाती है और मतदाता सक्रिय रूप से भागीदारी करते हैं। इस बार भी बुजुर्गों और दिव्यांग मतदाताओं के लिए घर से मतदान की सुविधा शुरू की गई है, जो लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। हालांकि यहां प्रत्यक्ष हिंसा की घटनाएं कम देखने को मिलती हैं, फिर भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और वैचारिक टकराव लगातार जारी रहता है। कानून व्यवस्था की दृष्टि से राज्य अपेक्षाकृत संतुलित नजर आता है, लेकिन प्रशासन को पूरी सतर्कता बनाए रखनी होती है।

पुडुचेरी में चुनावी गतिविधियां सीमित दायरे में होती हैं, लेकिन यहां भी राजनीतिक समीकरण काफी जटिल होते हैं। छोटे क्षेत्रफल के बावजूद यहां गठबंधन राजनीति का प्रभाव अधिक है। कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए प्रशासन को विशेष सतर्कता बरतनी पड़ती है, क्योंकि छोटी घटनाएं भी बड़े विवाद का रूप ले सकती हैं। हालांकि अब तक यहां से किसी बड़ी हिंसक घटना की सूचना नहीं है, लेकिन चुनावी माहौल को देखते हुए सावधानी आवश्यक है।

इन पांचों राज्यों की स्थिति का समग्र विश्लेषण यह बताता है कि जहां एक ओर लोकतंत्र का उत्सव मनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कानून व्यवस्था एक गंभीर चुनौती के रूप में सामने आई है। चुनाव केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम नहीं होते, बल्कि यह जनता के विश्वास और प्रशासन की निष्पक्षता की भी परीक्षा होते हैं। यदि मतदाता भयमुक्त होकर मतदान नहीं कर पाएंगे तो चुनाव का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा।

राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है। प्रशासन और भारत निर्वाचन आयोग की भूमिका इस समय सबसे अहम हो जाती है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर मतदाता बिना किसी दबाव के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सके।

अंततः यह कहा जा सकता है कि इन चुनावों में जीत-हार से अधिक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा है। कानून व्यवस्था की स्थिति ही तय करेगी कि यह चुनाव लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक बनेंगे या फिर अव्यवस्था की मिसाल। देश की नजरें इन पांच राज्यों पर टिकी हैं और उम्मीद की जा रही है कि चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से संपन्न होंगे, जिससे लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत होंगी।

कांतिलाल मांडोत

About The Author

Post Comments

Comments

संबंधित खबरें