अफ़वाहों का बाज़ार: सरकार, विपक्ष और समाज की ज़िम्मेदारी

इसके परोक्ष आर्थिक दुष्प्रभावों का सामना करने को विवश हैं।

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प्रो. (डॉ.) मनमोहन प्रकाश
 
​वर्तमान में संपूर्ण विश्व भू-राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध की विभीषिकाओं और आर्थिक अनिश्चितताओं के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। इस वैश्विक उथल-पुथल के मूल में रूस-यूक्रेन महासमर, ईरान-अमेरिका,इजरायल के मध्य गहराता संघर्ष, अमेरिका की संरक्षणवादी टैरिफ नीतियां तथा तीव्र होती वैश्विक गुटबाजी जैसे कारक प्रमुख रूप से उत्तरदायी नजर आते हैं।​इन द्वंद्वों के परिणामस्वरूप ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक तंत्र, कूटनीतिक संतुलन और वैश्विक व्यापक आर्थिक स्थिरता जैसे विषय आज राष्ट्रों के लिए अत्यंत चिंताजनक बन गए हैं। जहाँ कुछ राष्ट्र प्रत्यक्ष रूप से युद्ध की विभीषिका झेल रहे हैं, वहीं भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं इसके परोक्ष आर्थिक दुष्प्रभावों का सामना करने को विवश हैं।
 
विशेष रूप से तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना और कीमतों की अस्थिरता को नियंत्रित रखना विकसित से लेकर अविकसित देशों तक के लिए एक चुनौती बन गया है।​ऐसे संकटकाल में, भारत जैसे विशाल एवं संवेदनशील लोकतंत्र के समक्ष न केवल ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को अक्षुण्ण बनाए रखने और मुद्रास्फीति पर लगाम लगाने की चुनौती है, बल्कि आंतरिक स्तर पर प्रसारित होने वाली भ्रामक सूचनाओं और अफ़वाहों के विरुद्ध जनमानस को सचेत व जागरूक करना भी एक अनिवार्य दायित्व बन गया है।
आज सोशल मीडिया और अनौपचारिक स्रोतों के माध्यम से भ्रामक खबरें तीव्र गति से फैल रही हैं। कहीं फिर से लॉकडाउन लगने का डर दिखाया जा रहा है, तो कहीं ईंधन की भारी कमी की आशंका जताई जा रही है, तो कुछ तेल और गैस की कीमतों के साथ रोजमर्रा के आवश्यक सामान जैसे किराना आदि के दामों में भारी वृद्धि होने का डर फैलाया जा रहा है।कुछ तत्व तो विश्व युद्ध या परमाणु हमले का भय दिखाकर जनता को आवश्यक वस्तुओं के भंडारण की अनुचित सलाह दे रहे हैं।
 
ऐसी अपुष्ट सूचनाएं न केवल सामाजिक तनाव बढ़ाती हैं, बल्कि आर्थिक असंतुलन और 'पैनिक बाइंग' (घबराहट में खरीदारी) को भी जन्म देती हैं।इसका सबसे घातक परिणाम यह होता है कि बाज़ार में कृत्रिम कमी पैदा हो जाती है, जिसका लाभ जमाखोर और कालाबाजारी करने वाले तत्व उठाते हैं।हाल ही में गैस की कालाबाजारी के कुछ मामले पकड़े भी गए हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि अफ़वाहें केवल सूचना का संकट नहीं, बल्कि राष्ट्र की आर्थिक सुरक्षा के लिए भी खतरा है।
डिजिटल क्रांति ने सूचना के प्रसार को पंख दे दिए हैं, लेकिन इसी के साथ अफ़वाहों की गति भी बढ़ी है। कुछ राष्ट्रविरोधी तत्व पुराने वीडियो को वर्तमान संघर्षों से जोड़कर या विदेशी घटनाओं को भारत का बताकर साझा करते हैं। कुछ लोग तो पड़ोसी और अन्य विश्व के देशों में तेल और गैस की किल्लत और दामों में वृद्धि को दिखा कर भ्रम फैला रहे हैं कि भारत में भी ऐसे ही हालात निर्मित होने वाले हैं।ऐसी भ्रामक स्थिति में आम नागरिक के लिए सत्य और असत्य के बीच की धुंधली रेखा को पहचानना कठिन हो जाता है, जिससे समाज में अविश्वास का माहौल पनपता है।
 
अतः  सरकार का दायित्व हो जाता है कि वह ऊर्जा आपूर्ति, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता और विदेश नीति पर निरंतर पारदर्शिता  और जनता से संवाद बना कर रखे। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय तथा सभी राजनीतिक दलों के साथ संवाद इस दिशा में एक सकारात्मक कदम हो सकता है, जैसा कि हाल ही में केन्द्र सरकार द्वारा इस तरह के प्रयास किए गए हैं। इसी दिशा में सभी राजनीतिक दलों की बैठक आयोजित की गई, राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक आयोजित कर विचार विमर्श किया गया तथा वस्तु स्थिति पर राज्य सरकारों की आगामी रणनीति कैसी होनी चाहिए  पर विचार किया गया । सब का विश्वास अर्जित करने की दिशा में इसे अच्छा प्रयास कहा जा सकता है।
 
विपरीत स्थितियों में विपक्षी दलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना विपक्ष का अधिकार है, किंतु राष्ट्रीय सुरक्षा या वैश्विक संकट के समय विपक्ष को राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना चाहिए। उन्हें ऐसे वक्तव्यों से बचना चाहिए जो जनता में भ्रम और असुरक्षा की भावना पैदा करते हैं। रचनात्मक सुझाव देना और संकट के समय सरकार के साथ खड़े होकर जनता का मनोबल बढ़ाना ही एक परिपक्व विपक्ष की पहचान है। नीतियों का विरोध वैचारिक हो सकता है, लेकिन वह राष्ट्र के मनोबल को कमजोर करने वाला कदापि नहीं होना चाहिए।हर विपक्ष दलों के नेताओं को अपने गिरेबान में झांक कर एक बार देखने की आवश्यकता है कि उनके द्वारा संकट की इस घड़ी में दिया गया वक्तव्य क्या देश हित में उचित है?
मैं तो इस समय यही कहना चाहूंगा कि  वैश्विक संकट की घड़ी में सरकार, विपक्ष और जनता की आवाज़ एक होनी चाहिए। जब देश के भीतर एकता होती है, तो बाहरी चुनौतियों का सामना करना सरल हो जाता है। समाज को भी यह समझना होगा कि बिना पुष्टि के किसी भी जानकारी पर विश्वास करना और  साझा करना अफ़वाह को बढ़ावा देना है। आधिकारिक स्रोतों पर भरोसा करना और 'फैक्ट-चेक' की संस्कृति विकसित करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। मीडिया को भी सनसनीखेज खबरों के बजाय तथ्यपरक पत्रकारिता पर ध्यान देना चाहिए।अफ़वाहों का संक्रमण तभी रुकेगा जब सरकार पारदर्शी हो, विपक्ष उत्तरदायी हो और समाज जागरूक हो। हमें डर और भ्रम से नहीं, बल्कि तथ्य और संयम के साथ आगे बढ़ना होगा ।

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