संविधान और लोकतंत्र: खतरा या भ्रम?
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हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति और सार्वजनिक विमर्श में एक वाक्य बार-बार दोहराया जा रहा है “संविधान और लोकतंत्र खतरे में हैं”। विपक्षी दलों द्वारा इसे सरकार पर प्रहार का सबसे प्रभावी औज़ार बनाया गया है। किंतु लोकतंत्र में किसी भी आरोप का मूल्यांकन उसकी आवृत्ति से नहीं, बल्कि तथ्यों और संवैधानिक यथार्थ से किया जाता है। इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यह खतरा वास्तविक है या केवल एक राजनीतिक भ्रम?
यह सत्य है कि भारतीय संविधान विश्व के सबसे विस्तृत, सुदृढ़ और संतुलित संविधानों में से एक माना जाता है। यह केवल शासन चलाने का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रणाली है, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन स्थापित करती है। पिछले 75 वर्षों में भारत ने युद्ध, आंतरिक अशांति, आर्थिक संकट, आतंकवाद, सामाजिक आंदोलनों, सत्ता परिवर्तन और यहाँ तक कि आपातकाल जैसे कठिन दौर भी देखे हैं। इसके बावजूद संविधान की मूल आत्मा और लोकतांत्रिक ढाँचा सुरक्षित बना रहा। यह तथ्य स्वयं इस कथन को कमजोर करता है कि भारतीय लोकतंत्र किसी गंभीर संकट में है।
यदि वास्तव में संविधान और लोकतंत्र खतरे में होते, तो उसके स्पष्ट संकेत दिखाई देते, जैसे समय पर चुनाव कराने से बचा जाता,स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव बाधित होते, सत्ता हस्तांतरण शांति पूर्ण न होता,न्यायपालिका सरकार के विरुद्ध निर्णय देने में असमर्थ होती, संसद में विपक्ष को अपनी बात रखने नहीं दी जाती, विपक्ष को संसद और संसद के बाहर सरकार की आलोचना करने, रैली निकालने, धरना प्रदर्शन से रोका जाता, मीडिया पर पूर्ण नियंत्रण होता, टीवी चैनलों में बहस करते समय सरकार और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की आलोचना करना आसान न होता और नागरिकों की अभिव्यक्ति व आंदोलन की स्वतंत्रता सीमित हो जाती। किंतु भारत का वर्तमान यथार्थ इससे भिन्न है। यहाँ चुनाव नियमित रूप से हो रहे हैं, न्यायपालिका सक्रिय रूप से संवैधानिक समीक्षा कर रही है, मीडिया सरकार की समय-समय खुली आलोचना करता है और नागरिक और राजनीतिक दल अपनी असहमति सड़कों से लेकर न्यायालय तक व्यक्त कर रहे हैं। ये सभी तथ्य लोकतंत्र की सक्रियता को प्रमाणित करते हैं।
यह भी सत्य है कि लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव स्वाभाविक है। विपक्ष का दायित्व है कि वह सरकार से प्रश्न पूछे, नीतियों की आलोचना करे और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए सजग रहे। किंतु जब हर निर्णय और हर प्रशासनिक कदम को बिना ठोस संवैधानिक आधार के “लोकतंत्र पर हमला” कह दिया जाता है, तब यह स्वस्थ आलोचना नहीं, बल्कि राजनीतिक अतिशयोक्ति बन जाती है।
वास्तविक खतरा लोकतंत्र को तब उत्पन्न होता है, जब संवैधानिक संस्थाओं जैसे संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग और मीडिया पर जनता का विश्वास जानबूझकर कमजोर किया जाए। निरंतर संकट का नैरेटिव नागरिकों में भय और अविश्वास पैदा करता है। लोकतंत्र भय या भ्रम से नहीं, बल्कि संविधान सम्मत आचरण, संवाद, असहमति और उत्तरदायित्व से चलता है।
भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में लोकतंत्र का टिके रहना उसकी आंतरिक शक्ति का प्रमाण है। आपातकाल जैसे अनुभव के बाद भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का पुनर्स्थापन यह दर्शाता है कि भारतीय लोकतंत्र आत्म-सुधार की क्षमता रखता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि नागरिक चुनौती और संकट के अंतर को समझें। चुनौती लोकतंत्र को परिपक्व बनाती है, जबकि कृत्रिम संकट का प्रचार उसे कमजोर दिखाने का प्रयास करता है।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि “संविधान और लोकतंत्र खतरे में हैं” कथन तथ्यों से अधिक राजनीतिक आरोपों और भ्रम पर आधारित प्रतीत होता है। सच तो यह है कि भारत का लोकतंत्र किसी विध्वंसक संकट में नहीं, बल्कि परिवर्तनशील दौर से गुजर रहा है। इसकी वास्तविक सुरक्षा नागरिक विवेक, जिम्मेदार विपक्ष और संविधान के प्रति निष्ठा में निहित है।
प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश
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