मुंबई में बदला सत्ता का इतिहास,मुम्बई में ठाकरे बंधुओ का किला ढहाया

महाराष्ट्र के नगर निगम चुनाव 

मुंबई में बदला सत्ता का इतिहास,मुम्बई में ठाकरे बंधुओ का किला ढहाया

महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों के नतीजों ने राज्य की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। वर्षों से चली आ रही परंपराओं और स्थापित सियासी वर्चस्व को तोड़ते हुए भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। 29 में से 25 महानगर पालिकाओं में जीत दर्ज कर महायुति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य की शहरी राजनीति में अब निर्णायक नेतृत्व उसी के हाथों में है। सबसे बड़ा और सबसे प्रतीकात्मक परिणाम मुंबई का रहा जहां बृहन्मुंबई महानगरपालिका में दशकों से कायम ठाकरे परिवार के प्रभाव का अंत हुआ और भाजपा पहली बार सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी।
 
मुंबई की राजनीति केवल एक नगर निगम की राजनीति नहीं है। यह शहर महाराष्ट्र की आर्थिक धड़कन है और देश की वित्तीय राजधानी भी है। बीएमसी का बजट कई राज्यों के बजट से बड़ा माना जाता है। ऐसे में यहां सत्ता परिवर्तन का अर्थ केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी है। भाजपा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने मिलकर जिस तरह से बहुमत का आंकड़ा पार किया उसने यह दिखा दिया कि मतदाताओं ने स्थिरता और विकास के एजेंडे को प्राथमिकता दी है।
 
इस चुनाव में भाजपा ने भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन और ट्रिपल इंजन सरकार का नारा दिया। केंद्र राज्य और नगर निगम में एक ही गठबंधन की सरकार होने से विकास कार्यों में तेजी आएगी यह संदेश शहरी मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंचा। परिणामस्वरूप मुंबई ही नहीं बल्कि पुणे नागपुर ठाणे नासिक और पिंपरी चिंचवड़ जैसे प्रमुख शहरों में भी महायुति को निर्णायक बढ़त मिली। यह जीत केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है बल्कि राजनीतिक मनोविज्ञान में आए बदलाव को भी दर्शाती है।
 
ठाकरे परिवार का मुंबई में वर्चस्व लगभग तीन दशक तक अडिग माना जाता रहा। बालासाहेब ठाकरे के दौर से लेकर उद्धव ठाकरे तक शिवसेना ने मुंबई की राजनीति पर गहरी पकड़ बनाए रखी। मराठी अस्मिता और हिंदुत्व के मिश्रण ने शिवसेना को यहां मजबूत आधार दिया था। लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलीं। पार्टी में विभाजन हुआ और सत्ता संघर्ष ने संगठन को कमजोर किया। उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे के बीच हुआ विभाजन इस चुनाव में निर्णायक साबित हुआ। मतदाताओं ने बंटी हुई राजनीति के बजाय स्पष्ट नेतृत्व को चुना।
 
राज ठाकरे की मनसे के साथ गठबंधन कर उद्धव ठाकरे ने एक बार फिर पुराने प्रभाव को दोहराने की कोशिश की थी। ठाकरे बंधु करीब दो दशक बाद एक साथ आए और इससे राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हुई। लेकिन यह प्रयोग मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सका। जनता ने भावनात्मक अपील से अधिक ठोस प्रशासनिक विकल्प को तरजीह दी। इसका परिणाम यह रहा कि ठाकरे परिवार की संयुक्त रणनीति भी भाजपा शिंदे गठबंधन की आक्रामक और संगठित चुनावी मशीनरी के सामने टिक नहीं पाई।
 
भाजपा के लिए यह जीत ऐतिहासिक है। पार्टी ने अपने गठन के करीब 45 साल बाद मुंबई में मेयर बनाने की स्थिति हासिल की है। यह उपलब्धि केवल एक पद तक सीमित नहीं है बल्कि उस यात्रा का प्रतीक है जिसमें भाजपा ने धीरे धीरे शहरी महाराष्ट्र में अपनी जड़ें मजबूत कीं। पहले यह पार्टी सहयोगी की भूमिका में रहती थी लेकिन अब वह नेतृत्वकर्ता बनकर उभरी है। यह बदलाव भाजपा के संगठनात्मक विस्तार और रणनीतिक धैर्य का परिणाम है।
 
देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे की जोड़ी ने इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाई। फडणवीस ने विकास और सुशासन को केंद्र में रखकर अभियान चलाया जबकि शिंदे ने शिवसेना के पारंपरिक मतदाताओं को महायुति के पक्ष में बनाए रखा। दोनों नेताओं ने यह संदेश दिया कि हिंदुत्व और विकास एक दूसरे के पूरक हैं न कि विरोधी। इस संयुक्त रणनीति ने शहरी मतदाताओं के बीच भरोसा पैदा किया।
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का प्रभाव भी इस चुनाव में साफ दिखाई दिया। भाजपा ने केंद्र सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को स्थानीय विकास से जोड़ा। मतदाताओं को यह भरोसा दिलाया गया कि मजबूत केंद्र और मजबूत राज्य सरकार के साथ नगर निगम भी यदि उसी धारा में चलेगा तो शहरों का विकास तेज होगा। यह संदेश विशेष रूप से मध्यम वर्ग और युवा मतदाताओं के बीच असरदार साबित हुआ।
 
कांग्रेस के लिए यह चुनाव मिश्रित परिणाम लेकर आया। कुछ शहरों में पार्टी ने जीत दर्ज की लेकिन समग्र रूप से वह महायुति के सामने कमजोर नजर आई। शहरी राजनीति में कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी एक बार फिर उजागर हुई। हालांकि लातूर और चंद्रपुर जैसे क्षेत्रों में जीत यह संकेत देती है कि पार्टी के पास अभी भी कुछ मजबूत आधार हैं लेकिन उन्हें राज्यव्यापी रणनीति में बदलना बड़ी चुनौती होगी।
 
इन चुनाव परिणामों का असर केवल नगर निगमों तक सीमित नहीं रहेगा। यह राज्य की राजनीति और आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए दिशा संकेत भी हैं। भाजपा के लिए यह जीत आत्मविश्वास बढ़ाने वाली है और विपक्ष के लिए आत्ममंथन का अवसर। खासकर उन दलों के लिए जो राजनीति को पारिवारिक विरासत के रूप में देखते रहे हैं यह परिणाम एक चेतावनी की तरह है। मतदाता अब नाम और विरासत से अधिक काम और स्पष्ट नेतृत्व को महत्व दे रहे हैं।
 
मुंबई में सत्ता परिवर्तन के साथ ही प्रशासनिक अपेक्षाएं भी बढ़ गई हैं। बीएमसी के सामने बुनियादी ढांचे स्वास्थ्य परिवहन और आवास जैसी कई चुनौतियां हैं। जनता ने जिस भरोसे के साथ भाजपा शिंदे गठबंधन को चुना है उस भरोसे को बनाए रखना अब नई सरकार की जिम्मेदारी है। पारदर्शिता और समयबद्ध विकास ही इस जीत को स्थायी राजनीतिक पूंजी में बदल सकता है।
 
यह चुनाव यह भी दर्शाता है कि शहरी मतदाता अब अधिक जागरूक और अपेक्षाशील हो चुका है। भावनात्मक नारों के साथ साथ वह ठोस योजनाओं और परिणामों की मांग करता है। भाजपा ने इस बदलाव को समझा और अपने अभियान को उसी अनुरूप ढाला। विपक्ष यदि भविष्य में वापसी चाहता है तो उसे भी इसी स्तर की तैयारी और स्पष्टता दिखानी होगी।
 
अंततः महाराष्ट्र के नगर निगम चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं हैं। यह लोकतंत्र में बदलती प्राथमिकताओं की कहानी है। यह कहानी बताती है कि मतदाता अब प्रदर्शन के आधार पर निर्णय ले रहा है। मुंबई में ठाकरे युग का अंत और भाजपा का उदय इसी परिवर्तन का प्रतीक है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह नई सत्ता व्यवस्था शहरों को किस दिशा में ले जाती है और क्या यह भरोसा विकास और सुशासन में बदल पाता है।
 
कांतिलाल मांडोत

About The Author

स्वतंत्र प्रभात मीडिया परिवार को आपके सहयोग की आवश्यकता है ।

राष्ट्रीय हिंदी दैनिक स्वतंत्र प्रभात ऑनलाइन अख़बार

Post Comment

Comment List

आपका शहर

अंतर्राष्ट्रीय

मैं ठीक हूं, आप टेंशन मत लेना… ईरान में पढ़ रही भारतीय छात्रा का परिवार को संदेश, वीडियो में बताई जमीनी हकीकत मैं ठीक हूं, आप टेंशन मत लेना… ईरान में पढ़ रही भारतीय छात्रा का परिवार को संदेश, वीडियो में बताई जमीनी हकीकत
नई दिल्ली। ईरान में जारी हिंसक प्रदर्शनों और इंटरनेट शटडाउन के बीच वहां पढ़ रहे भारतीय छात्रों की सुरक्षा को...

Online Channel