पाषाण की उपासना धर्म की नही,बल्कि अन्ध विश्वास की है
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भारत की आत्मा सदा से तर्क, विवेक और करुणा की साधना में रमी रही है, किंतु विडंबना यह है कि इसी धरती पर अंध-विश्वास की जड़ें भी गहराई तक फैली हुई दिखाई देती हैं। भगवान महावीर का यह कथन कि धर्मतत्त्व में श्रद्धा अत्यंत दुर्लभ है, आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था। श्रद्धा का अर्थ आंख मूंदकर किसी बात को मान लेना नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण आस्था है, जो सत्य, करुणा और आत्मबोध पर आधारित हो। जब श्रद्धा विवेक से कट जाती है, तब वह अंध-विश्वास का रूप ले लेती है और यही अंध-विश्वास व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के लिए संकट का कारण बनता है।
आज हम देखते हैं कि समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसे विश्वासों में उलझा हुआ है जिनका न तो कोई तर्कसंगत आधार है और न ही नैतिक औचित्य। गांवों में ही नहीं, शहरों में भी यह प्रवृत्ति कम नहीं हुई है। शिक्षित और अशिक्षित का भेद भी यहां धुंधला पड़ जाता है। बिल्ली के रास्ता काटने पर यात्रा रोक देना, छींक को अपशकुन मान लेना, किसी पेड़ या पत्थर को देवता मानकर उससे मनौतियां मांगना, भूत-प्रेत के भय से जीवन के निर्णय लेना, ये सब उदाहरण बताते हैं कि अंध-विश्वास किस तरह हमारे दैनिक जीवन को संचालित करने लगा है। इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि मनुष्य अपने भीतर की शक्ति और विवेक को भूलकर बाहरी प्रतीकों और ढोंगियों पर निर्भर हो जाता है।
संत नामदेव का यह कथन कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अपना भय है, आज के संदर्भ में और भी सार्थक हो जाता है। भूत-प्रेत का भय हो या ग्रह-नक्षत्र का डर, इन सबका मूल मनुष्य का असंयमित और अशांत मन ही है। भय जब मन पर हावी हो जाता है, तब तांत्रिक, ओझा और पाखंडी लोग उसका लाभ उठाते हैं। इच्छाओं और वासनाओं में उलझा हुआ व्यक्ति त्वरित समाधान की तलाश में विवेक त्याग देता है और ऐसे रास्तों पर चल पड़ता है जो अंततः विनाश की ओर ले जाते हैं। इतिहास और वर्तमान, दोनों ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं जहां अंध-विश्वास ने अपराध, हिंसा और मानसिक विकृति को जन्म दिया है।
धर्म का वास्तविक स्वरूप आत्मशुद्धि और नैतिक उत्थान से जुड़ा है, किंतु अंध-विश्वास ने धर्म को भी विकृत कर दिया है। जब धर्म कर्मकांड, डर और दिखावे तक सीमित हो जाता है, तब वह समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने लगता है। भगवान महावीर ने अपने समय में इसी विकृति के विरुद्ध आवाज उठाई थी। उन्होंने आत्मदेव की आराधना पर बल दिया, न कि जड़ वस्तुओं की पूजा पर। महर्षि दयानंद और महात्मा कबीर जैसे चिंतकों ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा कि जड़ की पूजा से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती, बल्कि आत्मा की शुद्धि और सत्याचरण से ही परम तत्व का साक्षात्कार संभव है।
अंध-विश्वास का सबसे खतरनाक पक्ष यह है कि यह मनुष्य को सत्य से दूर ले जाकर असत्य के दलदल में फंसा देता है। जब व्यक्ति अपने कर्मों की जिम्मेदारी लेने के बजाय हर घटना का कारण किसी अदृश्य शक्ति को मान लेता है, तब वह आत्मविकास की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाता। समाज में फैलते अंध-विश्वास का सीधा संबंध कमजोर आध्यात्मिक चिंतन से है। जहां विवेक और नैतिक शिक्षा का अभाव होता है, वहां डर और भ्रम आसानी से जगह बना लेते हैं। परिणामस्वरूप, लोग पुण्यकर्म छोड़कर पापकर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं और इसे भी किसी दैवी इच्छा का नाम दे देते हैं।
विज्ञान के इस युग में अंध-विश्वास की पकड़ और भी चिंताजनक लगती है। विज्ञान हमें प्रश्न करना सिखाता है, प्रमाण मांगना सिखाता है और हर बात को तर्क की कसौटी पर परखने की प्रेरणा देता है। इसके बावजूद यदि हम अंध-विश्वास के सहारे जीवन जीते हैं, तो यह हमारी बौद्धिक आलस्य का प्रमाण है। विज्ञान और धर्म विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों का लक्ष्य सत्य की खोज है। अंतर केवल पद्धति का है। जब धर्म विवेक से जुड़ता है, तब वह मानवता का मार्गदर्शक बनता है, और जब उससे कट जाता है, तब वह अंध-विश्वास का रूप ले लेता है।हम देख रहे है कि समाज मे अंध विश्वास और ठोंगी बाबाओं के चंगुल में फंसकर अपने परिवार की हत्या तक कर दी जाती है।यह एक पाखंड और अधोपतन का मार्ग है।
श्रद्धा और संदेह के बीच संतुलन अत्यंत आवश्यक है। संदेह का अर्थ नकारात्मकता नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण जांच है। जहां संदेह पूरी तरह हावी हो जाता है, वहां आस्था कमजोर पड़ जाती है, किंतु जहां अंधी आस्था होती है, वहां विनाश निश्चित हो जाता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम श्रद्धा को विवेक के साथ जोड़ें। नवकार महामंत्र या किसी भी आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य बाहरी चमत्कार नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और नैतिक बल प्रदान करना है। जो मन से मजबूत और संकल्पवान होता है, उसे बाहरी शक्तियां कभी परास्त नहीं कर सकतीं।
अंध-विश्वास केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है, यह सामाजिक समस्या है। इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ता है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं। यदि उन्हें डर, भ्रम और अविवेक का वातावरण मिलेगा, तो वे भी उसी रास्ते पर चलेंगे। इसके विपरीत यदि उन्हें तर्क, करुणा और आत्मविश्वास का संस्कार मिलेगा, तो वे एक स्वस्थ और प्रगतिशील समाज की नींव रखेंगे। इसलिए शिक्षा व्यवस्था, परिवार और सामाजिक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा दें।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि ईश्वर, धर्म या आध्यात्म किसी बाहरी जड़ वस्तु में नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना में निहित है। अपनी आत्मा की उपेक्षा करके बाहर ईश्वर को खोजने का प्रयास करना स्वयं को धोखा देना है। जब मनुष्य भीतर की शक्ति को पहचान लेता है, तब अंध-विश्वास स्वतः समाप्त होने लगते हैं, जैसे वर्षा होने पर धूल बैठ जाती है। जीवन में स्पष्टता, साहस और आनंद का संचार होता है।
अंध-विश्वास छोड़ना केवल किसी परंपरा को त्यागना नहीं, बल्कि चेतना का विस्तार करना है। यह एक साहसिक कदम है, जो व्यक्ति को भय से मुक्त करता है और उसे अपने जीवन का कर्ता बनाता है। जब समाज इस दिशा में आगे बढ़ेगा, तब न केवल व्यक्तिगत जीवन में सुख-शांति आएगी, बल्कि राष्ट्र भी बौद्धिक और नैतिक रूप से सशक्त होगा। यही भगवान महावीर, कबीर और दयानंद का संदेश है और यही आज के भारत की आवश्यकता भी है।
कांतिलाल मांडोत
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