दुनिया के लिए मुसीबत बन रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप 

दुनिया के लिए मुसीबत बन रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप 

डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद अमेरिकी जनता से यूक्रेन युद्ध रुकवाने का वादा किया था. लेकिन नया साल शुरू होते ही उनके कदम दुनिया में शांति के बजाय तनाव और टकराव को बढ़ाते नजर आ रहे हैं. यूक्रेन युद्ध अभी खत्म भी नहीं हुआ कि मिडिल ईस्ट में आग भड़क चुकी है. इस बीच अब अमेरिका-रूस के बीच सीधा टकराव वैश्विक चिंता का कारण बन गया है. सवाल उठने लगा है कि क्या ट्रंप दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की तरफ धकेल रहे हैं?हाल ही में अमेरिका ने उत्तरी अटलांटिक महासागर में रूसी झंडे वाले तेल टैंकर ‘मरीनेरा’ को जब्त कर लिया है. यह कार्रवाई अमेरिकी कोस्ट गार्ड और सेना के संयुक्त ऑपरेशन में की गई. अमेरिकी दावा है कि यह टैंकर प्रतिबंधों का उल्लंघन कर अवैध रूप से वेनेजुएला का तेल ले जा रहा था. यह वही टैंकर है जिसका पुराना नाम ‘बेला-1’ था और जिस पर 2024 में अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए थे. बाद में इसका नाम बदलकर मरीनेरा कर दिया गया. 
 
आपको बता दें अमेरिकी साम्राज्यवाद, जिसे अक्सर सैन्य विस्तार, आर्थिक प्रभुत्व और सांस्कृतिक प्रभाव के मिश्रण के रूप में समझा जाता है, आज प्रत्यक्ष उपनिवेशवाद की जगह नीतिगत दबाव, वैश्विक संस्थानों, तकनीकी व वित्तीय ताकत के जरिए संचालित होता है। भारत के संदर्भ में यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि भारत एक ओर उभरती महाशक्ति है, तो दूसरी और अपने ऐतिहासिक गुटनिरपेक्ष रुख और रणनीतिक स्वायत्तता पर गर्व करता है। बहरहाल, भारत और अमेरिका के रिश्ते इस वक्त ऐसी ढलान पर हैं जहां तनाव हर बीतते दिन के साथ गहराता जा रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत के खिलाफ तीखी बयानबाजी और टेरिफ बढ़ाने की धमकियां अब सिर्फ जुबानी नहीं रही। बात अब अमेरिकी संसद तक पहुंच गई। दरअसल अमेरिकी सीनेट में एक ऐसा कानून आने वाला है जो भारत के लिए काफी भारी पड़ सकता है।
 
वो ऐसे कि अमेरिकी सीनेट में रूस पर प्रतिबंध अधिनियम 2025 लाने की तैयारी है। यह बिल अमेरिका के दो सीनेटरों- लिंसे ग्राहम और रिचर्ड लुमथन ने मिलकर तैयार किया है। जिसे व्हाइट हाउस की हरी झंडी मिल चुकी है। मकसद साफ है रूस की आर्थिक नसों को काटना। लेकिन इसकी चपेट में भारत भी आता दिखाई दे रहा है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने रूस से जमकर सस्ता कच्चा तेल खरीदा है। लेकिन अब अमेरिका इसे बर्दाश्त करने के मूड में नहीं। इस नए बिल के तहत एक बेहद खतरनाक प्रावधान जोड़ा गया है। अगर रूस शांति वार्ता के लिए नहीं झुकता तो रूस से तेल, गैस या यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर अमेरिका 500 प्रतिशत तक का टेरिफ लगा सकता है।
 
भारत पर अमेरिका ने पहले ही रूसी तेल को लेकर अतिरिक्त टेरिफ लगाए हैं। दूसरी ओर, लंबे समय से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता और व्यापारिक तनाव के बावजूद, ट्रंप प्रशासन ने चीन के साथ व्यवहार में सावधानी बरती है। इसका एक प्रमुख कारण दुर्लभ खनिजों, इलेक्ट्रिक वाहनों में प्रयुक्त महत्वपूर्ण घटकों, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरणों और नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों पर बीजिंग का प्रभुत्व है। भले ही चीन रूसी तेल का दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है, लेकिन उस पर अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाए गए हैं। इसके बजाय, राष्ट्रपति ट्रंप ने चीनी आयात पर नए शुल्क को स्थगित कर दिया, जिससे शुल्क 30 प्रतिशत पर बना रहा, जो भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए शुल्क से काफी कम है। इसके विपरीत, भारत के पास चीन जैसी रणनीतिक ताकत नहीं है।
 
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से नई दिल्ली रियायती दरों पर रूसी तेल का एक प्रमुख खरीदार बन गया है, लेकिन महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं पर चीन की तरह उसका कोई दबदबा नहीं है। ट्रंप ने भारत की व्यापार नीतियों पर बार-बार असंतोष जताया है और नई दिल्ली पर अमेरिकी वस्तुओं पर उच्च शुल्क और बाधाएं बनाए रखने का आरोप लगाया है। कुल 50 प्रतिशत के ये शुल्क भारत द्वारा रूसी तेल की भारी मात्रा में खरीद के कारण लगाए गए हैं, जिसे अमेरिका यूक्रेन संघर्ष के बीच रूस की अर्थव्यवस्था को समर्थन देने वाला मानता है। इससे पहले, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि रूस से तेल खरीदने पर भारत पर लगाए गए उच्च शुल्क को लेकर प्रधानमंत्री मोदी नाखुश हैं।
 
हाउस ऑफ रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों की बैठक में ट्रंप ने कहा कि हालांकि संबंध सौहार्दपूर्ण बने हुए हैं, लेकिन शुल्क के मुद्दे ने तनाव पैदा कर दिया है। कहना न होगा कि अमेरिकी साम्राज्यवाद का स्वरूप अक्सर 'नियम-निर्माण' के माध्यम से दिखाई देता है, जिनमें व्यापार शर्तें, बौद्धिक संपदा अधिकार, डिजिटल शासन, और वित्तीय संस्थानों में प्रभाव शामिल हैं। भारत पर कभी-कभी व्यापार घाटे, डेटा स्थानीयकरण, दवा पेटेंट या मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर दबाव देखा गया है। प्रतिबंधों की राजनीति और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था भी विकासशील देशों की नीतिगत स्वतंत्रता को सीमित कर सकती है। सांस्कृतिक स्तर पर भी अमेरिकी प्रभाव, हॉलीवुड, उपभोक्तावाद, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म-भारतीय समाज में आकांक्षाओं और जीवनशैली को प्रभावित करता है।
 
यह प्रभाव अपने साथ अवसर और जोखिम दोनों लाता है- नवाचार, अभिव्यक्ति और वैश्विक जुड़ाव के अवसर, पर साथ ही स्थानीय भाषाओं, कलाओं और श्रम-संरचनाओं पर दबाव भी। ऐसे में, भारत की चुनौती यहां संतुलन साधने की है। एक ओर चीन जैसी आक्रामक शक्ति के बीच अमेरिका के साथ रणनीतिक सहयोग भारत की सुरक्षा चिंताओं के लिए उपयोगी है। दूसरी ओर, किसी एक शक्ति ध्रुव पर अत्यधिक निर्भरता भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को कमजोर कर सकती है। इसलिए भारत बहुध्रुवीय विश्व का समर्थक रहा है, जहां अमेरिका, यूरोप, रूस, एशिया और वैश्विक दक्षिण सभी की भूमिका हो। नीति-निर्माण में आत्मनिर्भरता, विनिर्माण क्षमता, तकनीकी नवाचार और दक्षिण-दक्षिण सहयोग जैसे कदम अमेरिकी प्रभुत्व के संभावित नकारात्मक प्रभावों को संतुलित कर सकते हैं। साथ ही, लोकतांत्रिक मूल्यों, कानून के शासन और मानवाधिकारों पर भारत का अपना दृष्टिकोण होना चाहिए। बदलते वैश्विक माहौल में अमेरिका खुद दुनिया के सामने मुसीबत के बीज बो रहा है और डोनाल्ड ट्रम्प इस सारे विवाद को जन्म दे रहे हैं। 

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