स्वामी विवेकानंद केविचारों की वह अग्नि जो भारत को अतीत से भविष्य तक जोड़ती है

स्वामी विवेकानंद केविचारों की वह अग्नि जो भारत को अतीत से भविष्य तक जोड़ती है

भारत की आत्मा को यदि किसी एक व्यक्तित्व में समझना हो, तो स्वामी विवेकानंद का नाम सबसे पहले सामने आता है। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह कथन कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए केवल प्रशंसा नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक सत्य है। वहीं रोमां रोलां ने उन्हें ऐसा व्यक्तित्व बताया, जिनका  द्वितीय होना असंभव है। इन दोनों महान चिंतकों की यह धारणा यूं ही नहीं बनी। स्वामी विवेकानंद ने न केवल भारत की आध्यात्मिक चेतना को विश्व पटल पर प्रतिष्ठित किया, बल्कि गुलामी से जूझ रहे भारत को आत्मविश्वास, स्वाभिमान और कर्मशीलता का नया दर्शन दिया।
 
स्वामी विवेकानंद केवल एक संन्यासी नहीं थे। वे एक ऐसे विचारक थे जिनमें संत की करुणा, योद्धा का साहस, दार्शनिक की गहराई और राष्ट्रनिर्माता की दूरदृष्टि एक साथ विद्यमान थी। उनका जीवन स्वयं एक संदेश था कि आध्यात्मिकता पलायन नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान का सबसे सशक्त माध्यम हो सकती है। उन्होंने भारत को उसकी जड़ों से जोड़ा और साथ ही उसे आधुनिक विश्व से संवाद करने का साहस दिया।
 
नरेन्द्रनाथ दत्त के जीवन में आए संघर्षों ने उनके विचारों को और भी धार दी। पिता की असमय मृत्यु के बाद आर्थिक संकट ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उसी दौर में रामकृष्ण परमहंस से उनका मिलन हुआ, जो उनके जीवन की दिशा तय करने वाला क्षण बना। मां काली से धन की याचना करने के बजाय ज्ञान और भक्ति की आकांक्षा ने यह स्पष्ट कर दिया कि नरेन्द्र का मार्ग सामान्य नहीं होगा। यहीं से सांसारिक मोह से ऊपर उठकर मानवता की सेवा का बीज उनके भीतर अंकुरित हुआ।
 
रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य में उन्हें यह बोध हुआ कि ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि भूखे, पीड़ित और शोषित मनुष्य में बसता है। यही विचार आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के सामाजिक दर्शन की आधारशिला बना। गुरु के महाप्रयाण के बाद उनका भारत भ्रमण केवल यात्रा नहीं, बल्कि राष्ट्र की नब्ज़ टटोलने की प्रक्रिया थी। देश में फैली गरीबी, अज्ञान और सामाजिक विषमता ने उन्हें विचलित किया, लेकिन निराश नहीं। उन्होंने समझ लिया कि भारत की समस्या का समाधान भी भारत की आत्मा में ही छिपा है।
 
कन्याकुमारी के सागर तट पर ध्यान के दौरान उन्हें यह स्पष्ट हुआ कि नए भारत का निर्माण आत्मगौरव, शिक्षा और सेवा के बिना संभव नहीं है। यही चेतना उन्हें शिकागो की विश्व धर्म संसद तक ले गई। मात्र तीस वर्ष की आयु में दिए गए उनके भाषण ने पूरी दुनिया को चकित कर दिया। सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका के संबोधन के साथ जो तालियां बजीं, वे केवल एक वक्ता के लिए नहीं, बल्कि भारत की आत्मा के सम्मान में थीं। उस भाषण ने यह स्थापित कर दिया कि भारत भले ही आर्थिक रूप से पिछड़ा हो, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से वह विश्व का मार्गदर्शक रहा है।
 
शिकागो के मंच से स्वामी विवेकानंद ने वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को वैश्विक चेतना में रूपांतरित किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कट्टरता, संकीर्णता और हिंसा की आलोचना की और सहिष्णुता, संवाद तथा करुणा को मानवता का आधार बताया। यह वही भारत था, जिसे औपनिवेशिक ताकतें पिछड़ा और रहस्यमय बताती थीं, लेकिन विवेकानंद ने उसे ज्ञान, विवेक और सार्वभौमिकता का प्रतीक बना दिया।
 
धर्म संसद के बाद स्वामी विवेकानंद विश्व प्रसिद्ध हो गए, लेकिन उन्होंने इस प्रसिद्धि को कभी व्यक्तिगत गौरव नहीं बनने दिया। भारत लौटकर उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो उनके विचारों का संस्थागत रूप था। यह मिशन संन्यास और सेवा का अद्भुत संगम बना। अस्पताल, विद्यालय, महाविद्यालय और राहत कार्यों के माध्यम से मिशन ने यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिकता का वास्तविक अर्थ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना है। स्वामी विवेकानंद का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने भारतीय युवाओं को हीन भावना से बाहर निकाला। उनका आह्वान,उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत।
 
आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने युवाओं को बताया कि शक्ति, आत्मविश्वास और चरित्र निर्माण के बिना न तो व्यक्ति आगे बढ़ सकता है और न ही राष्ट्र। यही कारण है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गांधी, सुभाष, अरविंद जैसे नेताओं पर विवेकानंद के विचारों की स्पष्ट छाया दिखाई देती है।
 
यदि पुरानी और नई विचारधारा के अंतर को समझें, तो स्वामी विवेकानंद इस सेतु के रूप में दिखाई देते हैं। पुरानी विचारधारा में आध्यात्मिकता अक्सर संन्यास, वैराग्य और संसार-त्याग से जुड़ी थी। नई विचारधारा में भौतिक प्रगति, विज्ञान और व्यक्तिगत सफलता पर जोर है। विवेकानंद ने इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन को सशक्त बनाने का माध्यम है। वहीं आधुनिकता अंधी न हो, बल्कि मूल्यों से जुड़ी हो।
पुरानी सोच में जाति, रूढ़ि और कर्मकांड का बोलबाला था, जबकि नई सोच कई बार परंपरा से कट जाने का जोखिम उठाती है। विवेकानंद ने परंपरा की आत्मा को बचाते हुए रूढ़ियों को तोड़ा। उन्होंने कर्मकांड के बजाय कर्म को महत्व दिया और जाति के बजाय मानवता को। आज के उपभोक्तावादी युग में, जहां सफलता को केवल धन और पद से मापा जाता है, विवेकानंद हमें याद दिलाते हैं कि सच्ची सफलता चरित्र, सेवा और संवेदना में निहित है।
 
चार जुलाई 1902 को मात्र उन्तालीस वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानंद का देहावसान हो गया, लेकिन उनका विचारकाल अनंत है। उनका जीवन यह प्रमाण है कि अल्पायु में भी महाकालिक प्रभाव छोड़ा जा सकता है। वे केवल अपने समय के नहीं थे, बल्कि हर उस युग के हैं, जहां मनुष्य आत्मविश्वास खोता है और राष्ट्र दिशा भटकता है।
 
आज जब भारत विश्व मंच पर नई भूमिका निभा रहा है, तब विवेकानंद के विचार पहले से अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं। आत्मनिर्भरता, वैश्विक बंधुत्व और युवा शक्ति का जो सपना वे देख गए थे, वह आज भी हमारे सामने लक्ष्य की तरह खड़ा है। स्वामी विवेकानंद केवल इतिहास के पन्नों में कैद संत नहीं, बल्कि विचारों की वह ज्वाला हैं, जो भारत को अतीत की जड़ों से जोड़ते हुए भविष्य की ओर निरंतर अग्रसर करती रहती है।

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