डिजिटल क्रांति दुधारी तलवार, सोशल नेटवर्किंग जागरूकता से जनित मानसिक जटिलताएँ
सोशल नेटवर्किंग और डिजिटल क्रांति 21वीं सदी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जा रही है, क्योंकि इंटरनेट और वेब मीडिया के इस युग ने सूचना के आदान-प्रदान, जनमत निर्माण, विभिन्न क्षेत्रों, संस्कृतियों और समाजों को जोड़ने तथा उन्हें सहभागी बनाने में एक अभूतपूर्व भूमिका निभाई है, आ सोशल नेटवर्किंग केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि एक सामाजिक पहचान और स्टेटस सिंबल भी बन चुकी है, जितनी तेज़ी से इसने दुनिया को जोड़ा है उतनी ही गहराई से इसने मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं को जन्म भी दिया है, सोशल मीडिया ने वैश्विक स्तर पर एक ऐसे नए नागरिक को जन्म दिया है।
जो दुनिया भर के अरबों लोगों को पलक झपकते जोड़ देते हैं, इंटरनेट ने भौगोलिक दूरियों को लगभग समाप्त कर दिया है और वैश्विक समाज एक तरह से ‘आभासी राष्ट्र’ का नागरिक बन गया है, भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में सोशल मीडिया के उपयोगकर्ताओं की संख्या दुनिया में अग्रणी है और डिजिटल इंडिया के साथ यह संख्या लगातार बढ़ रही है, सोशल नेटवर्किंग का सकारात्मक पक्ष यह है कि इससे शिक्षा, व्यापार, पत्रकारिता, जन-जागरूकता, रोजगार, सामाजिक अभियानों और त्वरित सूचना प्रसार को नई गति मिली है, कोविड-19 महामारी के दौरान स्वास्थ्य संबंधी सूचनाओं, बचाव उपायों और सरकारी दिशानिर्देशों के प्रसार में सोशल मीडिया ने मानवीय सहायता का ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत किया, भारत जैसे देश में इतनी बड़ी आबादी के बावजूद महामारी पर नियंत्रण में सोशल मीडिया की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के पक्ष को रखने, सीमा संबंधी मुद्दों और वैश्विक जनमत को प्रभावित करने में भी सोशल मीडिया एक प्रभावी माध्यम बना, किंतु इसका नकारात्मक पक्ष उतना ही खतरनाक है।
क्योंकि अत्यधिक उपयोग मानव मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डालता है, अवसाद, अकेलापन, आक्रामकता, स्मरण शक्ति और चिंतन क्षमता में गिरावट जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं, सोशल मीडिया फर्जी समाचार, भड़काऊ भाषण, अफवाहों और साइबर अपराध का बड़ा मंच बन चुका है, भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में यह सामाजिक सौहार्द, राष्ट्रीय एकता और स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है, साइबर स्कैम, निजी डेटा की चोरी, धार्मिक भावनाओं और राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान तथा कानूनों का उल्लंघन इसके दुष्परिणाम हैं, अनियंत्रित सोशल मीडिया उपयोग से व्यक्ति-व्यक्ति के बीच वास्तविक संवाद और संवेदना की दूरी बढ़ती जा रही है।
इस प्रकार सोशल नेटवर्किंग ज्ञान, रोजगार, संचार और सामाजिक जागरूकता का सशक्त माध्यम होने के साथ-साथ मानसिक, सामाजिक और नैतिक संकटों का कारण भी बन रही है, इसलिए यह आवश्यक है कि सोशल मीडिया के उपयोग में संतुलन, विवेक और जिम्मेदारी विकसित की जाए, निजता के अधिकार की रक्षा करते हुए इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए नए कानूनी, सामाजिक और नैतिक विकल्पों की खोज की जाए, ताकि इसकी सकारात्मक शक्तियों को आत्मसात करते हुए आने वाली पीढ़ियों को इसके संभावित दुष्प्रभावों से बचाया जा सके।


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