मानव धर्म की अवहेलना का ही यह प्रभाव है कि आज मानवता सिसक रही है

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जीवन समस्या और संघर्ष का केन्द्र रहा है। डार्बिन ने ठीक ही लिखा था कि जो संघर्ष में विजयी रहता है, वही जीवित रह पाता है। जितना संघर्ष और समस्याएँ इस भौतिकवादी युग को झेलनी पड़ रही हैं, उतनी शायद पहले कभी नहीं रही होंगी। आज राष्ट्र विकसित हो या विकासशील, समस्याएँ तो सभी जगह है। जहाँ समस्याएँ है, वहाँ संघर्ष भी अवश्यंभावी होगा। समस्याएँ आवश्यकताओं के साथ जुड़ी हुई हैं। भारत की स्थिति तो हम जान ही रहे हैं कि यह विभिन्न धर्म-संस्कृतियों का केन्द्र है। यहाँ पर धर्म के साथ-साथ भाषा, जाति एवं सम्प्रदायों की समस्या है जोकि मानव ने स्वयं ही पैदा की हैं। इन समस्याओं के साथ-साथ प्राकृतिक समस्याओं के कष्ट भी इस देश की जनता झेल रही है। यहाँ यदि पूर्व का भाग बाढ़ से पीड़ित है तो वहीं पश्चिम सूखे की चपेट में है।हिमाचल प्रदेश,उत्तरकाशी,जम्मू कश्मीर आदि क्षेत्रो में बादल फटने औऱ भूस्खलन की घटनाएं मानवीय जीवन को संकट में डाल दिया।सैकड़ो लोग अकाल मृत्यु के आगोश में समा गई।होनी को कौन टाल सकता है।
 
आज भारत में लोकतंत्र है। 78 वर्ष पहले के भारत में और आज के भारत में जमीन-आसमान का अन्तर हो गया है। देश में सैकड़ों दल बन चुके हैं। सभी दल जनता के भले की बात कहते हैं। कथनी और करनी के भेद ने ही भारत को समस्याओं का केन्द्र बना दिया है। व्यक्तिगत स्वार्थ ने इस दलगत राजनीति को इतना बल दिया कि देश आज भयंकर दलदल में फैंस चुका है। देश में कहीं भी शांति नहीं है। आज शान्ति के लिए विश्व के राजनेता आपस में मुलाकात करते हैं। गोष्ठियाँ होती हैं, मगर शान्ति का स्वर दिनोंदिन मंद पड़ता जा रहा है।
 
 विचार कीजिए। जिस बात का श्रीगणेश ही संघर्ष से ही, वहाँ भला शांति कैसे हो सकती है? आज भाई, भाई को पड़ोसी, पड़ोसी को और राष्ट्र अन्य राष्ट्र को शंका की दृष्टि से देख रहे हैं। एक-दूसरे के प्रति विश्वास खो चुका है। साध्य हमारा शान्ति का है, मंगर साधन सभी अशान्ति के उत्पन्न किए जा रहे हैं। एक देश दूसरे देश की उन्नति में बाधाएँ खड़ी कर रहा है। हत्या और आतंक के साये में कोई शान्ति स्थापित नहीं हो सकती। एक-दूसरे पर बल प्रयोग आज सामान्य बात हो चुकी है। हिंसक गतिविधियों का बाजार गरम है। दूसरों का लहू बहाने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि लहू के छींटे उसके कपड़ों पर भी गिरते हैं। विश्व शान्ति के मूल मार्ग से भटका हुआ यह युग शान्ति के लक्ष्य तक कैसे पहुँच पायेगा ?
 
शान्तिप्रद जीवन जीना है तो महावीर का मार्ग ही चुनना होगा। अहिंसा, प्रेम और करुणा को जीवन का उद्देश्य बनाना होगा। जब तक प्रत्येक राष्ट्र का नागरिक अहिंसा को नहीं समझ लेता, शान्ति के लिए किये गये सभी प्रयास थोथे सिद्ध होंगे। भारतभूमि तो अहिंसा की भूमि है। आज हम यहाँ शान्तिपूर्वक, निर्भय होकर धर्म-लाभ ले रहे है, इसका कारण यहाँ का अहिंसामय वातावरण ही है। यहाँ किसी को भी किसी से भय नहीं है, क्योंकि अभय की स्थिति में ही शांति की प्रस्थापना हो सकती है।
 
ग्राम या शहर के एक भाग में लगी हुई आग को दूसरे भाग के लोग देखकर तत्काल उसे बुझाने को तत्पर हो उठते हैं। वे जानते हैं कि यदि इसमें प्रमाद हुआ तो अगले ही पल ये लपटें हमारे घरों को भी भस्मीभूत कर देंगी। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के कड़वे घूँट बीसवीं सदी पी चुकी है। क्या यह विष अगली सदी को भी पीना पड़ेगा ? युद्ध कोई नहीं चाहता, क्योंकि उसका अन्त दोनों ही पक्षों की बरबादी का कारण बनता है। पश्चिमी देशों में छिड़े युद्ध से वो परेशान है,लेकिन उसका विपरीत प्रभाव भारत पर तो पड़ रहा है।माल का आयात और निर्यात दोनो घटक प्रभावित हो रहे है।आर्थिक संकट बढ़ गया है।
 
जरा विचार करें, हमारे घर-परिवार में कोई व्यक्ति अस्वस्थ हो जाता है तो हम चिन्तित हो उठते हैं। उस समय आप चाहे दुकान पर हों या कार्यालय, बस में हों या हवाई जहाज में, आपका मन उद्विग्न हो उठता है। देश को नेतृत्व देने वालों को तो पूरे राष्ट्र पर निगाहें रखनी पड़ती हैं। हम से ही प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सेनाध्यक्ष बनते हैं। हम से ही संत, ऋषि-मुनि बनते हैं। डॉक्टर, इंजीनियर बनते हैं। तब देश की समस्याएँ हमारे लिए व्यक्तिगत हो जाती हैं, जबकि हमारा चिन्तन व्यक्तिगत न होकर सार्वजनीन बन जाता है।
 
 हमने सार्वजनीन चिन्तन का त्याग कर दिया है। क्षुद्र स्वार्थों ने हमें बाँध दिया है। मानव-धर्म की अवहेलना का ही यह प्रभाव है कि आज मानवता सिसक रही है। आज आपसी विश्वास में कमी आ गई है। भारत में सम्राट् चन्द्रगुप्त के समय लोग अपने घरों पर ताले नहीं लगाते थे। आज तो घरों में देखो कमरे तीन हैं मगर ताले आठ मिल जायेंगे। कमरे के अन्दर ताला है, बाहर ताला है। ऐसा क्यों? परिवार में एक-दूसरे का विश्वास उठ गया है। पश्चिमी राष्ट्रों में स्थिति कुछ अलग हो गई है। बेल्जियम में अखबार बेचने के लिए कोई बैठा नहीं रहता। अखबार वाला अखबार और डिब्बा पास-पास रखकर अपने काम पर चला जाता है।
 
शाम को लौटते हुए डिब्बा और शेष बचे अखबार ले जाता है। उसके हिसाब में कोई त्रुटि नहीं होती। सहारनपुर के एक विद्यालय में यही प्रयोग किया गया। प्रयोग से पूर्व बालकों में नैतिक शिक्षा को आचरण में ढालने की बात कही गई। उसके पश्चात् विद्यालय के एक कक्ष में पुस्तकें, पैन, कापियाँ मूल्य सूची लगा दी गई। एक सप्ताह बाद जाँच की गई तो सब कुछ सही पाया गया।
 
क्या यह शिक्षा हम देश के प्रत्येक नागरिक को नहीं दे सकते ? क्या उनमें विश्वास नहीं जगा सकते ? आज हर ओर अविश्वास का वातावरण है। इसे हटाने की आवश्यकता है। याद रखिए, विश्वास पर ही दुनियाँ कायम है। वर्तमान युग की दुर्दशा पर किसी चार लाइन याद आ गई। बेटे को अपने बाप पर विश्वास नहीं है। नास्तिक को प्रभु के जाप पर विश्वास नहीं है। होता है मुझे आश्चर्य इस बात पर कि-आदमी को अपने आप पर विश्वास नहीं है।
 
विश्वास तो जगाना ही होगा। पहले अपने आप में विश्वास पैदा करें, अर्थात् यह आत्म-विश्वास जगायें कि हम जो चाहेंगे, उसे करके दिखा देंगे। अपना सोच सदैव सकारात्मक रखना है। नई पीढ़ी में अच्छे संस्कार पैदा करने हैं। अच्छे कार्य के लिए संकल्प के साथ जुटने की जरूरत है। मनुष्य मन में अच्छे भाव जगायेगा तो उसे हर ओर प्रशंसा ही मिलेगी।
 
 महिला का कंगन कहीं गिर गया। वह कंगन एक जमादारिन को मिला। कंगन का मूल्य वह देखते ही जान गई। वह सोचने लगी कि इसके मिलने पर जो खुशी मुझे हो रही है, इसके विपरीत जिसका कंगन खोया है, वह कितनी उदास हो रही होगी। उसने तत्काल पता लगाकर कंगन को उसके मालिक के पास पहुँचा दिया। कंगन को पाकर उसकी हकदार को अत्यन्त प्रसन्नता हुई। उसने महिला को पारितोषिक देना चाहा, मगर वह बोली- "बहन जी,  मुझमें दया. अहिंसा, ईमानदारी एवं कर्त्तव्यनिष्ठा की भावना है। फिर कर्त्तव्य-पालन के लिए पारितोषिक कैसा?" उसकी गुरु-भक्ति एवं शुभ भावना को देखकर सभी का हृदय गद्‌गद हो उठा। संसार में अभी सचाई और ईमानदारी जीवित है। बीज जब तक है, वृक्ष की परम्परा नष्ट नहीं होती। हमें इस बीज को नष्ट होने से बचाना है। प्रत्येक मानव में सचाई, ईमानदारी, अहिंसा के प्रति विश्वास जागृत करना है। सभी को यह बताना है कि यदि शान्ति का साम्राज्य लाना है तो अपने कर्त्तव्यों के प्रति जागृत रहकर एक-दूसरे के प्रति विश्वास को बनाये रखें।
 
लोग विश्वास पर अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं। देश के नेता आश्वासन देकर लोगों का विश्वास प्राप्त कर लेते हैं। चुनाव जीत जाते हैं। उसके पश्चात् जो स्थिति बनती है, वह किसी से छिपी नहीं है। आज के नेताओं ने जनता के विश्वास को तोड़ा है। इसीलिए 'नेता' शब्द अपने आप में अविश्वास और घृणा का प्रतीक बन गया है। यह 'नेता' शब्द मात्र सुभाषचन्द्र बोस के साथ जुड़कर ही शोभित होता है मानो उनके बाद कोई नेता हुआ ही नहीं। अब ऐसा नहीं होने देंगे। किसी के जीवन के साथ घिनौना खिलवाड़ नहीं होने देंगे। ऐसा संकल्प ही विश्वसनीय जीवन की आधारशिला है।

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