मप्र नौकरशाही के भगवाकरण का श्रीगणेश

Swatantra Prabhat Desk Picture
Published On

मध्य्प्रदेश में जो अब तक नहीं हुआ था,वो अब हो रहा है।  मध्य्प्रदेश में 2003  से अभी तक भाजपा की सरकार है। 19  महीने की कांग्रेस सरकार एक अपवाद थी। इस लंबे कार्यकाल में भाजपा ने प्रदेश में बहुत से नवाचार किये लेकिन पहली बार प्रदेश की नौकरशाही का भगवाकरण शुरू हुआ है वो भी सामंतों के शहर ग्वालियर से। ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका सिंह और निगमायुक्त संघप्रिय ने भाजपा द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में न सिर्फ भाग लिया बल्कि भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाईं और गले में भगवा दुपट्टे डलवाये।

मेरे पांच दशक की  पत्रकारिता के अनुभव में ऐसे दृश्य पहले कभी देखने को नहीं मिले ,इसलिए मै चौंका भी और मुझे कुछ अटपटा भी लगा।सवाल ये है कि क्या भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों को किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम में शामिल होने का संवैधानिक अधिकार है ? या लोकसेवकों की कोई आचार संहिता भी है जो उन्हें राजनीतिक दलों की गतिविधियों में शामिल होने से रोकती भी है।  सवाल ये नहीं है कि  प्रशासनिक अधिकारी सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रम में शामिल हुए,सवाल ये है कि  क्या ऐसा कर उन्होंने कोई नजीर पैदा की है ? सवाल ये भी है कि  लोकसेवकों के इस आचारण का आम जनता पर,और प्रशासनिक कामकाज पर भी कोई असर पडेगा या नहीं ?

जहाँ तक मेरा ज्ञान है कि  लोक सेवा अधिनियम, 2007 (संशोधन, 2009) में जिन नैतिक मूल्यों पर बल दिया गया है, उन्हें नीति संहिता माना जा सकता है।इस नीति संहिता के मुताबिक लोकसेवक को संविधान की प्रस्तावना में आदर्शों के प्रति निष्ठा रखना।तटस्थता, निष्पक्षता बनाए रखना।

किसी राजनीतिक दल के प्रति सार्वजनिक निष्ठा न रखना। यदि किसी दल से लगाव हो तो भी अपने कार्यों पर प्रभाव न पड़ने देना।देश की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए वंचित समूहों (लिंग, जाति, वर्ग या अन्य कारणों से) के प्रति करुणा का भाव रखते हुए  निर्णयन प्रक्रिया में उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता के साथ-साथ उच्चतम सत्यनिष्ठा को बनाए रखना चाहिए।

इजराइल-अमेरिका-ईरान संघर्ष और भारत के सामने नई चुनौतियाँ Read More इजराइल-अमेरिका-ईरान संघर्ष और भारत के सामने नई चुनौतियाँ

मेरे सम्पर्क में ऐसे बहुत से लोकसेवक रहे हैं जिनकी अपनी राजनीतिक निष्ठाएं थीं लेकिन वे कभी खुलकर किसी राजनीतिक दल के किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। एक आईपीएस थे अयोध्यानाथ पाठक ,वे तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के अंधभक्त थे ।  उन्होंने 1983  में महाराज बाड़ा पर एक संगठन की आमसभा में आरएसएस के खिलाफ खुलकर भाषण दिए थे। उनकी इस कार्रवाई पर विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ था और पाठक जी को सफाई देना पड़ी थी।पाठक जी प्रदेश कि पुलिस महानिदेशक बनर सेवनिवृर्त  हुए लेकिन किसी दल में शामिल नहीं हो पाए।  

रंगों का उत्सव ‘होली’ : परंपरा, प्रेम और पौराणिक संदेश Read More रंगों का उत्सव ‘होली’ : परंपरा, प्रेम और पौराणिक संदेश

एक आईएएस अफसर थे एसके मिश्रा वे बुधनी उपचुनाव के समय  भाजपा की एक चुनाव सभा में कलेक्टर की हैसियत से तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के सामने घुटनों के बल बैठे देखे गए तो उनके खिलाफ फौरन कार्रवाई की गयी। एक थीं शशि कर्णावत वे तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के आगे-पीछे घूमती ही नहीं थीं बल्कि शासकीय कार्यक्रमों में भी कांग्रेस की बात करतीं थीं,आज उनका आता-पता नहीं है।
ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका सिंह और संघप्रिय भी इसी तरह राजनीतिक निष्ठाओं से बंधे लोकसेवक के रूप में चिन्हित किये गए हैं।

तेल, तनाव और विकास दर: ‘युद्ध-भय’ का भारतीय परिदृश्य Read More तेल, तनाव और विकास दर: ‘युद्ध-भय’ का भारतीय परिदृश्य

इन दोनों के समाने विकल्प था कि  ये दोनों भाजपा के होली मिलन समारोह में शामिल होने से इंकार कर सकते थे ,लेकिन इन दोनों ने ऐसानहीं किया। क्योंकि इन्हें लगा कि  वे कुछ गलत नहीं कर रहे है।  एक तरह से ये गलत है भी नहीं।  किन्तु एक लोकसेवक के नाते इन दोनों का आचरण सवालों के घेरे में तो आता ही है।  मुमकिन है कि  इन दोनों ने सोचा हो की जब केंद्र सरकार ने शासकीय कर्मचारियों को आरएसएस के कार्यक्रमों में शामिल होने की छूट दे दी है तो फिर भाजपा के कार्यकक्रमों में शामिल होने से क्या हर्ज है ?

मुझे लगता है कि  भाजपा की प्रदेश सरकार ग्वालियर के इन दोनों दुस्साहसी लिकसेवकों के आचरण के लिए इन्हें दण्डित करने के बजाय पुरस्कृत करेगी। इन दोनों ने पूरे प्रदेश की नौकरशाही के लिए एक नजीर पेश की है। अब मुमकिन है कि  हर जिले में आपको प्रशासनिक अफसर सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रमों में भगवा दुपट्टा डाले नजर आने लगें। शैक्षणिक संस्थानों में तो भवकरण अब पुरानी बात हो गयी है ,केवल एक प्रशासन इससे बचा था जो इस होली पर खुद भगवा हो गया।

वर्तमान समय में सिविल सेवकों के लिए आचार मानकों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद-309 के तह्ठत सिविल सर्विस (कंडक्ट) रूल्स में उल्लिख़ित आचरण नियमों के आधार पर किया जाता है। इस पर एक कानून की आवश्यकता को समझकर ही भारत सरकार द्वारा सिविल सर्विस स्टैंडर्ड्स, परफॉरमेन्स एंड अकाउंटिबिलिटी बिल,2010 को लाया गया, जिसमें सिविल सेवकों को बहुआयामी ढंग से कार्यकुशल बनाने के लिए प्रावधान किए गए हैं।लेकिन अब ये तमाम प्रावधान मुझे निरर्थक होते दिखाई दे रहे हैं।

मै ग्वालियर जिले  की कलेक्टर और ग्वालियर नगर निगम के आयुक्त को बधाई तो नहीं दूंगा किन्तु उनके दुस्साहस को सलाम जरूर करूंगा ।  मुझे प्रतीक्षा रहेगी प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन के भावी व्यवहार और निर्णय की किए  वे अपने मातहतों के भगवाकरण को लेकर संज्ञान लेते हैं या इसकी अनदेखी करते हैं ? वैसे मुख्य सचिव को अभी तक तो किसी ने मैदान में विचरते देखा नहीं है।

मेरा अनुभव है कि  तमाम लोकसेवकों के मन में एक अतृप्त कामना होती है नेतागिरी करने की ।  वे अनपढ़ नेताओं के सामने जब अपने  आपको निरीह अवस्था में पाते हैं ,तब उन्हें लगता है कि  क्या ही अच्छा होकि वे खुद राजनीती में आ जाएँ।  जो दुस्साहसी हैं वे नौकरी छोड़कर राजनीती में आ ही जाते हैं और जो संकोची हैं वे सेवानिवृत्ति का इंतजार करते हैं।  मप्र के एक पूर्व मंत्री पटवारी थे,नौकरी छोड़कर राजनीति में आये थे ।

 डॉ भगीरथ प्रसाद ,सरदार सिंह डंगस  जैसे अनेक आईएएस अफसरों ने बाद में राजनीति की ही शरण ली ही और विधानसभाओं तथा संसद तक में पहुंचे। श्रीमती रुचिका सिंह और संघप्रिय ने भी सरकार के सामने अपनी रूचि का प्रदर्शन कर दिया है। अब आपको ,सबको इंतजार करना पड़ेगा इन दोनों को राजनेता के रूप में ढलते देखने का।  हमारी शुभकामनायें।

About The Author

Post Comments

Comments

नवीनतम समाचार