खालिस्तानी आतंक के मुहाने पर लौटता पंजाब!
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हाल ही में एक के बाद एक ऐसी वारदातों की पुनरावृत्ति हो रही है जिनसे पंजाब की अमन-चैन को खतरा पैदा करने के लिए साजिश का पर्दाफाश हो रहा है। हाल ही में पंजाब के उपमुख्यमंत्री और शिरोमणी अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल पर स्वर्ण मंदिर के बाहर हुआ हमला यह साबित करता है कि पंजाब में फिर से कट्टरपंथी सर उठा रहे हैं और उनको कुचलने के लिए शख्त कदम उठाने की जरूरत है। जिस प्रकार से बादल पर हमला हुआ, साफ है कि वाहे गुरु की उन पर कृप्या थी, नहीं तो ऐसे हमलों में बचना नामुमकिन ही होता है। शूटर बादल से कुछ फीट की दूरी पर था, लेकिन सुरक्षा में लगे एएसआई जसबीर सिंह और बंदूकधारी को काबू करने में मदद करने वाले एक सेवादार (स्वयंसेवक) के समय पर सतर्कता ने एक प्रासदी को टाल दिया।
लेकिन इस हमले ने बढ़ती खालिस्तानी आतंक की धमक का ऐहसास जरूर करा दिया है। बादल पर हमला करने वाले आरोपी की पहचान नारायाण सिंह चौरा के रूप में हुई है, जो आतंकवादी समूह खालिस्तान लिबरेशन आर्मी (अब निष्क्रिय) का सदस्य रह चुका है। वह जेल से फरार होने में सजा काट चुका है। जानकारी के अनुसार वह 1984 में पाकिस्तान जा चुका है और वहां वह पंजाब में हथियारों और विस्फोटकों की बड़ी खेप की तस्करी में मदद करता था। पाकिस्तान में रहते हुए वह कथित तौर पर गुरिल्य युद्ध और देशद्रोही साहित्य पर एक किताब भी लिख चुका है। वह बुड़ैल जेलब्रेक मामले में भी भी आरोपी है।
नारायण इससे पहले पंजाब की जेल में सजा काट चुका है। साल 2004 में जेल तोड़कर चार खालिस्तानी आतंकी फरार हो गए थे। आरोप है कि उसने इस कांड में आकियों की मदद की थी और चारों कैदी 94 फुट लंबी सुरंग खोदकर जेल से भाग निकले थे। हालांकि इस मामले में कोर्ट ने आरोपियों को बरी कर दिया था। माना जा रहा है कि यह हमला बदले की भावना के तहत सोची समझी रणनीति का हिस्सा था। यह सनसनीखेज हत्या की कोशिश लगभग दो दशकों से पंजाब में पनप रहे असंतोष और धार्मिक उग्रवाद की अभिव्यक्ति थी। हालांकि यह सिर्फ कयास है, क्योंकि हमला उसने क्यों किया यह तो जांच के बाद ही पता चल सकता है।
मगर इसमें कोई दो मत नहीं है कि हमलावर अतीत में हत्या, हत्या का प्रयास, हथियार और विस्फोटक रखने तथा उग्रवाद जैसे गंभीर अपराधों में शामिल रहा है। इसके साथ ही पाकिस्तान स्थित सिखा आतंकवादी संगठनों के नेतृत्व के साथ लगातार संपर्क में था। दरअसल पाकिस्तान ने न केवल पिछले कई वर्षों से बब्बर खालसा इंटरनेशनल और खालिस्तान टाइगर फोर्स जैसे प्रमुख खालिस्तान समर्थक संगठनों के नेतृत्व को पनाह दी, बल्कि सिख फॉर जस्टिस के 'खालिस्तान रेफरेंडम 2020' जैसी परियोजनाओं के माध्यम से खालिस्तान समर्थक विचारधारा को बढ़ावा देना जारी रखा। सिख प्रवासी समुदाय, जिसमें चरमपंथियों का बोलबाला है। ये खालिस्तान समर्थक तत्वों को धन और संसाधन मुहैया कराते हैं।
वहीं, पाकिस्तान समर्थित तत्व सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा देते हैं। ये हथियारों की निरंतर सप्लाई सुनिश्चित करते हैं। यूएपीए जैसे कानून भी चौरा जैसे आतंकवादियों को लंबे समय तक रोक नहीं पाए। इससे उसे अदालतों से राहत मिल गई और वह फिर से चरमपंथी गतिविधियों में लग गया। इससे कट्टरपंथियों की तरफ से किसी भी उदारवादी आवाज को कुचलने का खतरा और भी वास्तविक हो गया। दरअसल पंजाब ने 1980 के दशक के मध्य से 1990 के दशक के मध्य तक खालिस्तान नामक एक अलग सिख राज्य की मांग के लिए सक्रिय उग्रवाद देखा है। सशस्त्र अलगाववादी आंदोलन को बड़े पैमाने पर पंजाब पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा निपटाया गया था, जिसमें सेना का कभी-कभी इस्तेमाल हुआ।
1992 के विधानसभा चुनावों में आतंकवाद की छाया में मतदान हुआ, जिसमें लगभग 24 प्रतिशत मतदान हुआ था। कुछ प्रभावी आतंकवाद विरोधी अभियानों के बाद आंदोलन कमजोर और फीका पड़ गया। लेकिन इस आंदोलन को विदेशी धरती से संचालित विभिन्न सिख संगठनों का समर्थन प्राप्त रहा और इसे पाकिस्तान की आईएसआई का समर्थन प्राप्त होता रहा है। इसलिए पंजाब अलगाववादी गतिविधियों के लिहाज से अब भी संवेनशील राज्य है। पिछले कुछ समय से कनाडा आदि देशों में रह रहे कुछ अलगाववादी सिख खालिस्तान की मांग उठाने लगे हैं। उसका कुछ असर पंजाब में भी देखा गया। हालांकि सरकार ने चुस्ती दिखाई और ऐसे तत्वों पर लगाम कसने में कामयाब हुई।
मगर पिछले कुछ समय से पंजाब में आपराधिक गतिविधियां बढ़ गई हैं, दिनदहाड़े और सरेआम किसी को गोली मार देने में भी अपराधियों को कोई हिचक नहीं होती। पिछले कुछ महीने में ही कई आपराधिक गतिविधियां हुई हैं। इससे साफ हो जाता है कि पंजाब में कट्टरपंथ एक बार फिर सिर उठा रहा है। विदेशी धन और संसाधनों द्वारा सहायता प्राप्त और उकसाया जाना, धीरे-धीरे और लगातार विरोधी ताकतें सामाजिक और धार्मिक विभाजन पैदा करने में सक्षम रही हैं। हाल के लोकसभा चुनावों में दो कट्टरपंथी निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत, अर्थात् अमृतपाल सिंह एक घोषित खालिस्तानी और वर्तमान में जेल में बंद और पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के हत्यारे के बेटे सरबजीत सिंह खालसा ने कट्टरपंथी तत्वों को अवश्य प्रोत्साहित किया होगा।
अकाल तख्त जत्थेदार द्वारा शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) से स्वर्ण मंदिर परिसर में खालिस्तान समर्थक आतंकवादियों के चित्र प्रदर्शित करने के लिए कहने का नवीनतम इनपुट वास्तव में परेशान करने वाला है। सबसे बड़ी बात यह है कि पंजाब पाकिस्तान से लगा हुआ है। यह भी छिपी बात नहीं है कि अलगाववादी तत्वों के तार पाकिस्तानी दहशतगदों से भी जुड़े हुए हैं, हो सकता है कि नारायण पाकिस्तान के इशारे पर काम कर रहा हो। पंजाब में बढ़ती आपराधिक गतिविधियों पर काबू न पा सकने की वजह से स्वाभाविक ही वहां की राज्य सरकार पर सवाल उठते रहे हैं। सुखबीर बादल पर हमले के बाद फिर से सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र पर अंगुलियां उठने लगी हैं।
हमला करने वाले की बादल पर गोली चलाने के पीछे मंशा चाहे जो रही हो, पर चिंता की बात है कि वह सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी का फायदा उठाने में कामयाब हो गया। आने वाले समय में पंजाब पुलिस के साथ ही खुफिया एजेंसियों को और भी ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। कनाड़ा जिस प्रकार से खालिस्तानी आंदोलन और आतंकियों को सह दे रहा है, उसी का नतीजा है कि पंजाब में कट्टरपंथियों का मनोबल बढ़ने लगा है।भविष्य में इनके मनसूबे कामयाब नहीं होने चाहिए लेकिन सतर्कता जरूरी है। सरकार को इस मामले में सजग होकर कार्रवाई करनी होगी क्योंकि अतीत में पंजाब दो दशक तक दहशतगर्दो की अराजकता और खून खराबा झेल चुका है। पूरे देश को खालिस्तानी आतंकवाद की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।
मनोज कुमार अग्रवाल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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