राजनीति ने युवाओं को किया निराश

राजनीति ने युवाओं को किया निराश

अरुण कुमार दीक्षित      
 
राजनीति में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है । युवा अपने विचारों से सभी क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं । वे जिस विचार की ओर अग्रसर होते हैं समाज में उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता । दुनिया में सबसे अधिक मांग युवाओं की ही रहती है। युवाओं की तपिश से बड़ी से बड़ी समस्याओं का हल होता देखा गया है । भारत की राजनीति में सबसे अधिक मांग युवा विचारों के साथ युवाओं की ही रहती है । भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को युवाओं ने ही धार दी |
 
युवाओं का आकर्षण का केंद्र राजनीति है । राजनीति उन्हें आकर्षित करती है, मगर राजनीति ही उन्हें अपमानित करती है। भारत की राजनीति ने युवा मन को निराश किया । राजनीति युवाओं में विराट लक्ष्य नहीं देखती । राजनीतिक दलों से जुड़े युवा कभी इस दल का कभी उस दल के हाईकमान का जिंदाबाद बोलते हैं । स्वयं का नुकसान करते हैं । सत्तावादी राजनीति ने युवाओं का भारी नुकसान किया। हो भी रहा है । युवाओं में प्रतिस्पर्धा है | प्रतिस्पर्धा ठीक होती है । युवा सपने देखते हैं सफल होते हैं । असफल भी होते हैं। टूटते हैं । आज युवा बेरोजगारी से टकरा रहे हैं । युवाओं पर पढ़ाई के साथ परिवार वालों का भी दबाव होता है कि कुछ कर दिखाना है ।
 
अनेक युवा भारतीय राजनीति में आए उन्होंने लगातार समाज के वंचितों के लिए काम किया । समाचार पत्र निकाले । समाज राष्ट्र की समस्याओं को मिशन बनाया । बड़े राजनेता बने । पत्रकार बने । अधिकारी बने सेवा में गए। ऐसे युवाओं की बड़ी संख्या है कि वह पहले प्रशासनिक अधिकारी बने । बाद में सीधे राजनीति में कूदे । कुछ को सरकारों ने ही पुरस्कृत किया । कुछ आजीवन संघर्षरत रहे।
 
     सरकारों ने युवा नीति को लेकर अब तक क्या किया | यह भी समझना आवश्यक है | भारत मे पहली बार युवानीति सन् 1988 मे दोनों सदनों मे रखी गयी | युवा मामलो और खेल विभाग को इस क्रियान्वयन कि जिम्मेदारी सौपी गयी | उददेश्य था कि उनके व्यक्तित्व कार्य क्षमता को मजबूत बनाये | साथ ही आर्थिक रूप से उत्पादक के साथ अधिक से अधिक सामाजिक ताना बाना मजबूत हो | वर्ष 2003 मे फिर युवा राष्ट्रनीति पर चर्चा हुई | 2003 मे 13 से 35 वर्ष के आयु के व्यक्ति को युवा रूप मे परिभाषित किया गया | वर्ष 14 मे भाजपा सरकार ने युवाओ के समग्र विकास के लिए वचनबद्धता दोहराई | वर्ष 2023 मे केंद्र सरकार ने युवाओ को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा की आवश्यकता बताई | कहा यह शिक्षा व्यावसायिक कौशल सिखाती है | समग्र विकास मे सहायक है | कहा कि इस नीति का उददेश्य युवाओ मे आत्मविश्वास से मजबूत आर्थिक व्यवस्था के साथ मानसिक शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाना है | इसका उददेश्य युवाओ के विकास के लिए कार्यवाही करना है | युवा नेत‌‍ृत्व एवं विकास स्वास्थ्य, फिटनेस और खेल आदि के विषय वर्ष 2023 से 2032 का मसौदा है, और यह मसौदा वर्तमान मे युवा मामले और खेल मंत्रालय के अधीन विचाराधीन है | केंद्र सरकार ने मसौदा नीति पर सुझाव मांगे हैं | विचाराधीन है |
 
     संयुक्त राष्ट्र संघ कि दृष्टि मे युवावस्था को सामान्यतः परिवर्तन के तौर पर माना जाता है | युवा वयस्कता की सामाजिक कसौटियो, रोजगार, परिवार और एक उत्पादक नागरिक के रूप मे जो प्रयास कर रहे है | युवा परिवर्तन के प्रतिनिधि है | युवा शब्द अंग्रेजी के जियोंग का है | इसका अर्थ युवा, युवक नया है | वहीं संस्कृत शब्द युवान है | इसका अर्थ युवा युवक है | ऑक्सफोर्ड के अंग्रेजी शब्दकोष मे युवा का अर्थ कम आयु किशोर से है | किशोरावस्था, युवा और वयस्कता के बीच अंतर बताया है | क़ानूनी प्रक्रिया मे 18 वर्ष से कम आयु के युवाओ के लिए किशोर शब्द है | यह लैटिन शब्द (जुवेनिस) से बना है | जिसका अर्थ युवा या युवा व्यक्ति होता है | इसी से जुवेनाइल बना | भारत मे किशोर न्यायालय ही जुवेनाइल कहे जाते है |
 
     भारतीय राजनीति को महात्मा गांधी, डॉ राम मनोहर लोहिया और अंबेडकर तीनों नेताओं ने सबसे अधिक प्रभावित किया है। तीनों महापुरुषों की भिन्न-भिन्न विचारधाराए चली। युवा गांधी दक्षिण अफ्रीका में प्रिटोरिया से डरबन जाते समय रेल में रंगभेद का शिकार हुए । गांधी ने दक्षिण अफ्रीका मे इंडियन ओपिनियन अखबार निकाला । भारतीयों की ज्वलंत समस्याओं को उठाया । पूरी दुनिया में रंगभेद के विरुद्ध वातावरण बनाने में जुटे रहे । गांधी भारत आए । भारत में अंग्रेजी सत्ता की गुलामी के विरुद्ध बिगुल फूँका । लाखों नौजवान उनके साथ खड़े हो गए । लड़ाई बढ़ गई । फिर आंदोलन का दौर चला। गांधी के आवाहन पर जिस तरह भारतीय नौजवान छात्र जुटे ऐसा विश्व इतिहास में परतंत्र भारत में पहली बार था। गांधी बैरिस्टर से महात्मा होने की यात्रा में चल पड़े । नमक आंदोलन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, दांडी मार्च, जैसे बड़े आन्दोलन खड़े कर दिखाये। इस सब के पीछे युवा शक्ति थी । वह युवा शक्ति अपने राष्ट्र के लिए जागृत हो चुकी थी ।
 
आज कोई कुछ भी कहे मगर बैरिस्टर से गांधी महात्मा की यात्रा युवाओं के कारण अद्भुत अकल्पनीय बनी । वह युवाओं के साथ दुनिया के प्रेरणास्रोत रहेंगे।   डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने पहले भारत में पढ़ाई की । विदेश से पढ़ाई पूरी कर लौटे तो उन्हें भारतीय समाज में ऊँच नीच की सड़ी गली व्यवस्था ने झकझोर दिया । वह बचपन में अपने गांव से लेकर पूरे भारत में जातियों से बंटे समाज को निहार रहे थे । वह इस व्यवस्था से जूझ गए । तभी कहा शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो यह मंत्र किसी समाज के लिए शुभ दायक ही है । डॉ आंबेडकर के विचार प्रतिपल छात्रों युवाओं को प्रभावित करने वाले हैं। स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा का गठन हुआ| संविधान सभा की मसौदा समिति के अध्यक्ष बने।
    स्वामी विवेकानंद भी युवा थे । नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद की यात्रा रामकृष्ण परमहंस के मिलन से आरंभ हुई । वह भारत की संस्कृति को विश्व में स्थापित करने का स्वप्न लेकर अमेरिका गए। साथ ही अनेक देशों की यात्राएं इसी उद्देश्य से की। वहाँ अपनी भारत की वैदिक सांस्कृतिक अनुभूति को पूरे विश्व के सामने रखा । अरविन्द घोष भी ज्वलंत युवा थे | उन्होंने भी भारतीय स्वाधीनता, योग और संस्कृति के लिए आद्वतीय काम किया | सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, खुदीराम बोस, गणेश शंकर विद्यार्थी, राजगुरु, युवा ही थे । स्वतंत्रता के लिए इन्हीं सबसे प्रेरित ज्वलंत युवाओं ने अपने देश के लिए बलिदान किया।
 
    भारत के हजारों युवा विदेश यात्राओं में रहते हैं मगर वह नौकरी के लिए ही विदेश जाते हैं । कुछ युवा पर्यटन और मस्ती के लिए जाते हैं। भारतीय युवाओं का विदेश नौकरी करने जाने का कारण है राष्ट्र का कृषि प्रधान और संयुक्त परिवार वाला ढांचा का दरक जाना। या टूट ही चुका है। प्रत्येक युवा को धन कमाना है। रोटी कपड़ा मकान बनाना है। भारत में बाजारवाद युवाओ को यह समझाने में सफल रहा कि मकान, कार, आधुनिक सामग्री व्यक्ति को श्रेष्ठ बड़ा बनाते हैं। कहीं तक बात ठीक भी है। दूसरी तरफ परंपराएं हैं। वह क्षीण हो रही है। वह अब बासी हो चुकी हैं। परंपराएं युवाओं को अब नहीं रोक पा रही है। पहले भी तर्क थे। एक पीढ़ी से दूसरी के बीच के समय अंतराल के । आधुनिकता के नाम पर सारे बंधन युवा तोड़ रहे हैं। आधुनिकता के सामने परंपराओं की दृष्टि चौंधिया गई है। संस्कृति और परम्परा दोनों अलग-अलग होते है | जीवन प्रतिमान बदल गए हैं। अब बाजार ही हमारी जीवन शैली का अधिकांश भाग तय करती है। संस्कृति वादी निंदा करके अपना काम चला रहे हैं । आधुनिकता सभी क्षेत्रों में आई पहले वस्त्रों के पहनने में आई फिर वस्त्रों को कम करने में आई । अब वस्त्रों को उतार फेंकने में ही आधुनिकता है | पूरी दुनिया मे आधुनिकता के नाम पर अखाद्य वस्तुओ को खाने का फैशन बढ़ा है | शिक्षा में आई आधुनिकता ने अंग्रेजी थोप दी। बाजार ने रुपया के बदले वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाकर बड़े नगरों से गांव तक अपना साम्राज्य बढ़ाया । युवा बाजार की चपेट मे है |
 
आज युवा क्या कर रहा है ? राजनीतिक भागीदारी कितनी है ? युवा प्रश्न नही उठा रहा ? जिन राष्ट्र समाजो के युवा प्रश्नों से विरत हैं उनका नेतत्व कैसा होगा ? वे अपनी जायज मांगों को लेकर आंदोलन की भी क्षमता भी नही रखते। आज का युवा फेसबुक में फ़ोटो सरकाने में आनंदित होता है। वहीं युवा सरकारों के सामने नतमस्तक है | यह खतरनाक है | युवा और भारतीय संस्कृति दोनों के लिए युवाओ को ही आगे आना होगा | तभी राष्ट्र समाज का कल्याण होगा | 
 
                                                                         :- लेखक मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं

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