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उद्योगपतियों का बोल बाला हरियाली पर चल रही आरा
यह न केवल पर्यावरणीय आपदा है, बल्कि विकास के नाम पर हो रही व्यवस्थित लूट का प्रतीक भी है।
संपादक/लेखक: राजीव शुक्ला
भारत में हरियाली संरक्षण की बातें सरकारी योजनाओं, पौधारोपण अभियानों और जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों में खूब होती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी भिन्न है। देश के कई हिस्सों में उद्योगपतियों और लकड़ी माफिया के बोल बाले में आरा मशीनें (बैंड सॉ मिल या सॉइंग मशीनें) बेखौफ हरियाली पर आरी चला रही हैं। हरे-भरे पेड़—नीम, महुआ, शीशम या अन्य प्रजातियां—रातोंरात कटकर लकड़ी के ढेर में बदल जा रहे हैं, जबकि प्रशासन या तो आंखें मूंदे बैठा है या जांच की औपचारिकता पूरी कर मामला ठंडा कर देता है। यह न केवल पर्यावरणीय आपदा है, बल्कि विकास के नाम पर हो रही व्यवस्थित लूट का प्रतीक भी है।
विभिन्न राज्यों से लगातार खबरें आ रही हैं कि औद्योगिक कॉलोनियों, गांवों के किनारे या जंगलों के आसपास अवैध आरा मशीनें संचालित हो रही हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे क्षेत्रों में इन मशीनों पर सैकड़ों क्विंटल हरी लकड़ी रोजाना चीरी जा रही है। कई मामलों में बिना लाइसेंस या एनओसी के आरा मशीनें चल रही हैं और हरे पेड़ों की जड़ें तक उखाड़ी जा रही हैं, ताकि सबूत मिट जाएं।
वन विभाग की भूमिका अक्सर संदिग्ध नजर आती है। लकड़ी का स्रोत जांचे बिना आरा संचालकों को छूट मिल रही है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में कभी-कभी बुलडोजर कार्रवाई होती है, लेकिन ये प्रयास छिटपुट और अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। लकड़ी उद्योग की मांग ईंधन, फर्नीचर, पैकेजिंग और निर्माण के लिए लगातार बढ़ रही है, जिसका फायदा अक्सर शक्तिशाली उद्योगपतियों और उनके नेटवर्क को पहुंचता है।
इस संदर्भ में ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना एक चिंताजनक उदाहरण है। अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में प्रस्तावित इस ₹81,000 करोड़ की मेगा परियोजना में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ड्यूल-यूज एयरपोर्ट, पावर प्लांट और टाउनशिप का निर्माण शामिल है। परियोजना के तहत लगभग 130-166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित होगा, जिसमें प्राथमिक वर्षावन (rainforest) की बड़ी मात्रा शामिल है।
अनुमान है कि इससे करीब 10 लाख से अधिक पेड़ कट सकते हैं। परियोजना को रणनीतिक महत्व (भारतीय महासागर क्षेत्र में भारत की उपस्थिति मजबूत करने) का हवाला देकर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) ने हाल ही में पर्यावरणीय मंजूरी बरकरार रखी है, लेकिन पर्यावरणविद् चेतावनी दे रहे हैं कि इससे जैव विविधता, लेदरबैक कछुए के घोंसलों और शोम्पेन जनजाति के निवास पर अपूरणीय क्षति होगी। एक ओर हरियाली बचाने के दावे, दूसरी ओर ऐसे बड़े पैमाने पर वन क्षेत्रों का डायवर्शन विकास मॉडल की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है।
आईएसआरओ के उपग्रह डेटा पर आधारित वन सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) की भारत राज्य वन रिपोर्ट 2023 (ISFR 2023) में देश की हरियाली की तस्वीर मिश्रित है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का कुल वन और वृक्ष आवरण 8,27,357 वर्ग किलोमीटर है, जो देश के भौगोलिक क्षेत्र का 25.17% है। इसमें वन आवरण 7,15,343 वर्ग किलोमीटर (21.76%) और वृक्ष आवरण 1,12,014 वर्ग किलोमीटर (3.41%) शामिल है। 2021 की तुलना में कुल वन और वृक्ष आवरण में 1,445 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई है (वन आवरण में +156 वर्ग किलोमीटर और वृक्ष आवरण में +1,289 वर्ग किलोमीटर)। रिपोर्ट ISRO के Resourcesat-2 सैटेलाइट के LISS-III सेंसर (23.5 मीटर रिजोल्यूशन) से प्राप्त मध्यम रिजोल्यूशन वाले उपग्रह डेटा पर आधारित है।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह वृद्धि मुख्य रूप से प्लांटेशनों, एग्रोफॉरेस्ट्री और रिकॉर्डेड फॉरेस्ट क्षेत्रों के बाहर वृक्षों के विस्तार से आई है। घने प्राकृतिक वनों में गिरावट जारी है। पिछले दो दशकों में घने वनों की कुल हानि 24,651 वर्ग किलोमीटर से अधिक हो चुकी है। उत्तर-पूर्व, मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्र और पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील इलाकों में खनन, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और अवैध कटाई से वन क्षरण हो रहा है। अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्रों में मैंग्रोव आवरण हालांकि बढ़ा है, लेकिन बड़े विकास प्रोजेक्ट्स इससे खतरा पैदा कर रहे हैं।
ग्रेट निकोबार जैसी परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को और मजबूत तथा पारदर्शी बनाना होगा, ताकि रणनीतिक विकास और जैव विविधता संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे। आईएसआरओ के उपग्रह डेटा जैसी वैज्ञानिक निगरानी को और प्रभावी बनाकर वास्तविक वन क्षरण पर अंकुश लगाया जा सकता है।
हरियाली हमारी साझा विरासत है। यदि उद्योगपतियों का बोल बाला बिना रोक-टोक जारी रहा और बड़े प्रोजेक्ट्स में वन क्षेत्रों की बलि चढ़ती रही, तो भविष्य की पीढ़ियां केवल आरा मशीनों की गूंज और सूखे खेतों की कहानियां सुनेंगी। सरकार, प्रशासन और नागरिक समाज को मिलकर इस लूट को रोकना होगा। विकास और पर्यावरण के बीच सच्चा संतुलन बनाना संभव है, लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक सख्ती अनिवार्य है। अन्यथा, ‘हरियाली’ शब्द सिर्फ सरकारी फाइलों और भाषणों तक सीमित रह जाएगा।


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