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गुजरा एक और मजदूर दिवस : लेकिन समस्याओं से ग्रस्त ,खुशियों से दूर ,आज भी मजदूर
जो भी गरीब वही मजदूर या भिखारी, गरीबी शब्द ही मजदूर दिवस जैसे शब्द का सृजक
हर साल की तरह इस बार भी एक मई यानी मजदूर दिवस मनाया गया। रैलियां निकल गई। सभाएं हुई। समस्याओं के खिलाफ संघर्ष का ऐलान किया गया। ठीक सब कुछ वैसा ही जैसा मई यानी मजदूर दिवस पर हर साल किया जाता है। और शायद भविष्य में भी हमेशा ऐसा ही किया जाता रहेगा। इसके संदर्भ में यह भी मानना अनुचित नहीं होगा कि गरीबी शब्द ही मजदूर दिवस जैसे शब्द का सृजक है। और अगर गरीबी नहीं होती तो शायद मजदूर दिवस मनाया जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। एक हिसाबसे हम सभी मजदूर ही हैं बस अंतर इतना है। कोई अमीर मजदूर है तो कोई गरीब मजदूर है। - - और इनमें अमीर मजदूरों से ज्यादा है गरीब मजदूर।
यह मई दिवस उन्हें गरीब मजदूरों का है। और यह हमेशा यूं ही मनाया जाता रहेगा क्योंकि ऐसा नहीं लगता कि गरीब मजदूरों की संख्या अमीर मजदूरों से ज्यादा हो जाएगी। यहां अमीर मजदूर का मतलब उन सभी से है जो गरीब मजदूरों की तरह आज भी भूखे पेट नहीं सोते। जो आज भी बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं। जिन्हें आज भी अपनी बेटियों की शादी करने के लिए भीख मांगनी पड़ती है। गंभीर बीमारियों के इलाज के अभाव में पैसे की वजह से जो आज भी दम तोड़ देते हैं। ईद पत्थर ढोये बगैर ,रिक्शा चलाए बगैर, बोझ उठाये बगैर और फावड़ा या हल चलाएं बगैर भूखे पेट सोने या नंगे बदन रहने को मजबूत होते हैं।
संक्षेप में यह भी कहा जा सकता है कि, जिनके सपने रहते हमेशा चूर-चूर है, वो और कोई नहीं साहब, लोगों के शौक पूरे करने वाला एक मजदूर है। जैसा कि सर्व विदित है कि इन मजदूरों और श्रमिकों को सम्मान देने के उद्देश्य से हर साल दुनिया भर में मजदूर दिवस मनाया जाता है। मजदूरों के नाम समर्पित यह दिन 1 मई है। मजदूर दिवस को 'लेबर डे, श्रमिक दिवस या मई डे' के नाम से भी जाना जाता है। श्रमिकों के सम्मान के साथ ही मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाने के उद्देश्य से भी इस दिन को मनाते हैं, ताकि मजदूरों की स्थिति समाज में मजबूत हो सके।
मजदूर किसी भी देश के विकास के लिए अहम भूमिका में होते हैं। हर कार्य क्षेत्र मजदूरों के परिश्रम पर निर्भर करता है। मजदूर किसी भी क्षेत्र विशेष को बढ़ावा देने के लिए श्रम करते हैं। हर बार मजदूर दिवस की एक थीम होती है, जिसके आधार पर इन दिन को मनाया जाता है। इस वर्ष मजदूर दिवस 2024 की थीम 'जलवायु परिवर्तन के बीच काम की जगह पर श्रमिकों के स्वास्थय और सुरक्षा को सुनिश्चित करना।' लेकिन यहां कितना हो पाएगा या सब कुछ करने वालों की मंशा पर ही निर्भर करता है ।
अवगत कराते चलें कि पहली बार मजदूर दिवस 1889 में मनाने का फैसला लिया गया। इस दिन को मनाने की रूपरेखा अमेरिका के शिकागो शहर से बनने लगी थी, जब मजदूर एक होकर सड़क पर उतर आए थे। 1886 से पहले अमेरिका में आंदोलन की शुरुआत हुई थी। इस आंदोलन में अमेरिका के मजदूर सड़कों पर आ गए। अपने हक के लिए मजदूर हड़ताल पर बैठ गए। इस आंदोलन का कारण मजदूरों की कार्य अवधि थी। उस दौरान मजदूर एक दिन में 15-15 घंटे काम करते थे। आंदोलन के दौरान मजदूरों पर पुलिस ने गोली चला दी।
इस दौरान कई मजदूरों की जान चली गई। सैकड़ों श्रमिक घायल हो गए। इस घटना के तीन साल बाद 1889 में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन की बैठक हुई। इस बैठक में तय किया गया कि हर मजदूर से प्रतिदिन 8 घंटे ही काम लिया जाएगा। वहीं सम्मेलन के बाद 1 मई को मजदूर दिवस मनाने का फैसला लिया गया। इस दिन हर साल मजदूरों को छुट्टी देने का भी फैसला लिया गया। बाद में अमेरिका के मजदूरों की तरह अन्य कई देशों में भी 8 घंटे काम करने के नियम को लागू कर दिया गया।
अमेरिका में मजदूर दिवस मनाने का प्रस्ताव 1 मई 1889 को लागू हुआ, लेकिन भारत में इस दिन को मनाने की शुरुआत लगभग 34 साल बाद हुई। भारत में भी मजदूर अत्याचार और शोषण के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। मजदूरों का नेतृत्व वामपंथी कर रहे थे। उनके आंदोलन को देखते हुए 1 मई 1923 में पहली बार चेन्नई में मजदूर दिवस मनाया गया। लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान की अध्यक्षता में मजदूर दिवस मनाने की घोषणा की गई। कई संगठन और सोशल पार्टी ने इस फैसले का समर्थन किया। लेकिन आज के परिवेश में मजदूर दिवस मनाना न : : तएक खाना पूरी जैसा है क्योंकि मजदूर की वास्तविक परिभाषा में आने वाला व्यक्ति आज भी अपनी समस्याओं को लेकर हताश निराश और परेशान है।
सुनील बाजपेई
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