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असम में सियासी रण और पहचान की राजनीति घुसपैठ यूसीसी और विकास के बीच चुनावी जंग तेज
असम की राजनीति एक बार फिर राष्ट्रीय मुद्दों और स्थानीय समीकरणों के संगम पर खड़ी दिखाई दे रही है।
असम की राजनीति एक बार फिर राष्ट्रीय मुद्दों और स्थानीय समीकरणों के संगम पर खड़ी दिखाई दे रही है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के हालिया बयान—जिसमें उन्होंने घुसपैठियों पर सख्ती और चुनाव के बाद समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कही और चुनावी बहस को और तीखा बना दिया है। इस बयान के साथ ही यह साफ हो गया है कि भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव को केवल विकास या स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे पहचान, सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता के बड़े नैरेटिव से जोड़कर देख रही है।
असम की राजनीति हमेशा से बहुस्तरीय रही है। यहां जातीय पहचान, भाषाई विविधता, धार्मिक संतुलन और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दे गहराई से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि चुनावी समीकरण भी सरल नहीं होते। राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 34 प्रतिशत के आसपास मानी जाती है, जो कई जिलों में निर्णायक भूमिका निभाती है। खासकर निचले असम और बराक वैली के क्षेत्रों में यह वोट बैंक चुनाव के नतीजों को प्रभावित करता है। दूसरी ओर, ऊपरी असम में असमिया हिंदू, आदिवासी और चाय बागान समुदायों का प्रभाव अधिक है।
भाजपा का चुनावी गणित इन विविध समूहों के बीच संतुलन साधने पर आधारित है। पार्टी की रणनीति साफ तौर पर तीन स्तंभों पर टिकती नजर आती है—घुसपैठ के खिलाफ सख्त रुख, विकास की राजनीति, और आदिवासी व स्थानीय समुदायों को सशक्त करने के वादे। नरेन्द्र मोदीऔर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की जोड़ी को भाजपा एक मजबूत नेतृत्व के रूप में पेश कर रही है। यह नेतृत्व कानून व्यवस्था, बुनियादी ढांचे और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए वोटरों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है।
घुसपैठ का मुद्दा असम में नया नहीं है, लेकिन इसे हर चुनाव में नए सिरे से उभारा जाता है। भाजपा इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय पहचान से जोड़कर पेश करती है। पार्टी का तर्क है कि अवैध प्रवासन ने राज्य की जनसंख्या संरचना को प्रभावित किया है और इससे संसाधनों पर दबाव बढ़ा है। इसी के साथ समान नागरिक संहिता का मुद्दा जोड़कर भाजपा एक व्यापक वैचारिक एजेंडा सामने रख रही है, जो उसके समर्थक वर्ग को एकजुट करता है।
हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि भाजपा ने आदिवासी समुदायों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखने की बात कहकर एक संतुलन बनाने की कोशिश की है। असम में बोडो, मिसिंग, कार्बी, राभा जैसी कई जनजातियां हैं, जिनकी अपनी अलग सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान है। इन समुदायों को आश्वस्त करना भाजपा के लिए जरूरी है, क्योंकि ये कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। एक-एक गाय या भैंस देने जैसे वादे प्रतीकात्मक रूप से आर्थिक सशक्तिकरण और ग्रामीण आजीविका से जुड़े हैं, जो सीधे तौर पर आदिवासी और ग्रामीण मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं।
जातिवाद का फैक्टर भी असम की राजनीति में कम महत्वपूर्ण नहीं है। हालांकि यहां उत्तर भारत की तरह परंपरागत जाति समीकरण उतने स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन समुदाय आधारित राजनीति बहुत मजबूत है। चाय बागान मजदूर समुदाय, जिसे अक्सर ‘टी ट्राइब्स’ कहा जाता है, लंबे समय से राजनीतिक दलों के लिए अहम वोट बैंक रहा है। भाजपा ने पिछले कुछ चुनावों में इस समुदाय में अपनी पकड़ मजबूत की है, जबकि कांग्रेस पारंपरिक रूप से यहां प्रभाव रखती रही है। इसी तरह बोडो और अन्य जनजातीय समूहों के बीच क्षेत्रीय दलों का भी प्रभाव है, जिससे चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय हो जाता है।
विकास का मुद्दा इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। भाजपा यह दावा कर रही है कि पिछले वर्षों में असम में सड़क, पुल, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। निवेश और उद्योग को बढ़ावा देने की कोशिशें भी दिखाई देती हैं। यदि मतदाता इन दावों को स्वीकार करते हैं, तो भाजपा को इसका सीधा लाभ मिल सकता है। खासकर युवा मतदाता, जो रोजगार और बेहतर जीवन स्तर की अपेक्षा रखते हैं, विकास के एजेंडे से प्रभावित हो सकते हैं।
दूसरी ओर, कांग्रेस भी अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश में है। राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक असंतोष जैसे मुद्दों को उठाकर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस का तर्क है कि भाजपा की नीतियां समाज में विभाजन पैदा करती हैं और वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाती हैं। अगर कोई मतदाता कांग्रेस को वोट देने का विचार करता है, तो उसके पीछे मुख्य कारण सामाजिक सद्भाव, धर्मनिरपेक्षता और आर्थिक असमानता के मुद्दे हो सकते हैं।
कांग्रेस का एक और मजबूत पक्ष उसका पारंपरिक समर्थन आधार है, जिसमें मुस्लिम मतदाता, कुछ आदिवासी समूह और ग्रामीण वर्ग शामिल हैं। यदि यह समर्थन एकजुट रहता है और क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल बनता है, तो कांग्रेस भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकती है। हालांकि, पिछले चुनावों में कांग्रेस को संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व के अभाव का सामना करना पड़ा है, जिसे दूर करना उसके लिए जरूरी है।
असम का चुनाव केवल दो दलों के बीच मुकाबला नहीं है, बल्कि यह कई स्तरों पर लड़ी जाने वाली लड़ाई है। यहां स्थानीय बनाम बाहरी, विकास बनाम पहचान, और परंपरा बनाम आधुनिकता जैसे कई विमर्श एक साथ चलते हैं। यही वजह है कि हर चुनाव में परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं।
अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि असम का मतदाता बेहद जागरूक और व्यावहारिक है। वह केवल भावनात्मक मुद्दों पर नहीं, बल्कि अपने हितों और भविष्य को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है। भाजपा के लिए चुनौती है कि वह अपने वादों को विश्वसनीय बनाए और सभी वर्गों का विश्वास जीत सके। वहीं कांग्रेस के लिए जरूरी है कि वह एक मजबूत वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करे।
इस चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता सुरक्षा और पहचान के मुद्दों को प्राथमिकता देता है या विकास और सामाजिक संतुलन को। असम की जनता का फैसला न केवल राज्य की राजनीति की दिशा तय करेगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।
*कांतिलाल मांडोत*
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