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देशभक्ति की आवाज थे माखनलाल चतुर्वेदी
जहाँ शब्द केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं थे, बल्कि वे शत्रु के विरुद्ध एक सशक्त अस्त्र बनकर उभरे
महेन्द्र तिवारी
भारतीय साहित्य के आकाश में माखनलाल चतुर्वेदी एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी आभा ने न केवल हिंदी काव्य जगत को आलोकित किया, बल्कि स्वाधीनता संग्राम की वेदी पर अपनी लेखनी को समिधा बनाकर अर्पित कर दिया। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व राष्ट्रीयता, त्याग और अदम्य साहस का एक अनूठा संगम है, जिसने गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत की सोई हुई चेतना को झकझोरने का ऐतिहासिक कार्य किया। 4 अप्रैल 1889 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बाबई गाँव में जन्मे माखनलाल जी का जीवन संघर्षों की एक ऐसी गाथा है, जहाँ शब्द केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं थे, बल्कि वे शत्रु के विरुद्ध एक सशक्त अस्त्र बनकर उभरे।
उनके भीतर देशभक्ति की लौ बचपन से ही प्रज्वलित थी, जो समय के साथ एक प्रचंड अग्नि में परिवर्तित हो गई। मात्र सोलह वर्ष की कोमल आयु में उन्होंने शिक्षक के रूप में अपनी जीविका प्रारंभ की, किंतु उनके भीतर का क्रांतिकारी मन कक्षाओं की चारदीवारी में अधिक समय तक नहीं टिक सका। उनके समय का भारत पराधीनता के काले बादलों से घिरा था और एक संवेदनशील कवि हृदय के लिए यह असह्य था कि वह केवल श्रृंगारिक या पारंपरिक कविताएँ लिखकर संतुष्ट हो जाए। यही वह समय था जब उन्होंने पत्रकारिता को अपने विचारों का वाहक बनाया और ‘प्रभा’, ‘प्रताप’ तथा विशेष रूप से ‘कर्मवीर’ के माध्यम से ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दीं।
माखनलाल चतुर्वेदी जी को 'एक भारतीय आत्मा' के उपनाम से जाना जाता है और यह संज्ञा उनके व्यक्तित्व पर पूर्णतः खरी उतरती है क्योंकि उनके काव्य का कण-कण भारतीय मिट्टी की सोंधी सुगंध और यहाँ के जन-मानस की पीड़ा से ओतप्रोत है। उनकी पत्रकारिता कोई साधारण पेशा नहीं थी, बल्कि वह एक 'मिशन' था। उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे महान क्रांतिकारियों के सानिध्य में अपनी लेखनी को पैना किया। जब उन्होंने 'कर्मवीर' का संपादन संभाला, तो उनके संपादकीय लेख अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों पर तीखे प्रहार करते थे। इसी का परिणाम था कि उन्हें अनेक बार जेल की कालकोठरी में दिन बिताने पड़े, परंतु जेल की उन सीलन भरी दीवारों ने उनके उत्साह को कम करने के बजाय और अधिक प्रखर बना दिया।
जेल में बिताए गए उन कठिन क्षणों ने ही हिंदी साहित्य को वह अमर कृतियाँ दीं जो आज भी हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक हैं। उनकी एक अत्यंत प्रसिद्ध रचना 'कैदी और कोकिला' उस समय की जेल की यंत्रणाओं और स्वाधीनता की तड़प का सजीव चित्रण करती है। उन्होंने कोयल को संबोधित करते हुए लिखा था कि "क्या देख न सकती जंजीरों का गहना? हथकड़ियाँ क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना, कोल्हू का चर्रक चूँ— जीवन की तान, गिट्टी पर अंगुलियों ने लिखे गान!" ये पंक्तियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि एक सच्चे देशभक्त के लिए बेड़ियाँ भी आभूषण के समान होती हैं यदि वे मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए पहनी गई हों।
चतुर्वेदी जी की कविताओं में छायावाद की सूक्ष्मता और रहस्यवाद की गहराई तो है ही, किंतु उनका मूल स्वर सदैव ओज और राष्ट्रप्रेम का रहा। उनकी सबसे कालजयी और लोकप्रिय रचना 'पुष्प की अभिलाषा' को माना जाता है, जो आज भी भारत के हर विद्यालय और सैन्य छावनी में प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। इस कविता में उन्होंने एक तुच्छ फूल के माध्यम से आत्मोत्सर्ग की जो भावना व्यक्त की, वह अद्वितीय है। फूल किसी वनमाली से कहता है कि
"चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ।
मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक।"
इन पंक्तियों में निहित त्याग की पराकाष्ठा पाठक के भीतर एक बिजली जैसी कौंध उत्पन्न कर देती है। यहाँ फूल न तो सुंदरता का प्रतीक है और न ही विलासिता का, बल्कि वह देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले गुमनाम शहीदों के सम्मान में स्वयं को समर्पित करने की कामना करता है। यह कविता उस कालखंड में भारतीय युवाओं के लिए मंत्र बन गई थी।
माखनलाल जी का राष्ट्रप्रेम केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि वे एक ऐसे समाज का स्वप्न देखते थे जहाँ मानवता सर्वोपरि हो। उनकी कविताओं में प्रकृति का मानवीकरण बहुत सुंदर ढंग से मिलता है। वे पहाड़ों, नदियों और बादलों को भी देशभक्ति के प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत करते थे। उनकी एक और महत्वपूर्ण कृति 'हिम तरंगिणी' है, जिस पर उन्हें 1955 में हिंदी साहित्य का पहला साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। उनकी काव्य शैली में शब्दों का चयन अत्यंत प्रभावशाली होता था, जहाँ 'ओज' और 'करुणा' का ऐसा संगम मिलता है जो विरल है। वे मानते थे कि साहित्यकार का धर्म केवल कला की साधना नहीं, बल्कि युग की पुकार को सुनना और उसे वाणी देना है। इसी कारण उन्हें 'युग चारण' भी कहा गया। उन्होंने अपनी रचना 'जवानी' में युवाओं का आह्वान करते हुए लिखा था कि
" द्वार बलि का खोल
चल, भूडोल कर दें,
एक हिम-गिरि एक सिर
का मोल कर दें
मसल कर, अपने
इरादों-सी, उठा कर,
दो हथेली हैं कि
पृथ्वी गोल कर दें?
रक्त है? या है नसों में क्षुद्र पानी!
जाँच कर, तू सीस दे-देकर जवानी?"
यह पंक्तियाँ आज भी रक्त में उबाल पैदा करने की शक्ति रखती हैं।
स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात भी चतुर्वेदी जी की सक्रियता में कोई कमी नहीं आई, यद्यपि उनके सरोकार बदल गए थे। वे तत्कालीन राजनीति की विसंगतियों और पद-लोलुपता से काफी दूर रहे। उन्हें कई उच्च सरकारी पदों और राज्यसभा की सदस्यता के प्रस्ताव मिले, किंतु उन्होंने अत्यंत विनम्रता और दृढ़ता के साथ उन्हें अस्वीकार कर दिया। उनका मानना था कि एक कवि का स्थान सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि जनता के हृदय में और सत्य की पक्षधरता में होना चाहिए। उन्होंने आजीवन अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासकों का चले जाना नहीं था, बल्कि गरीबी, अज्ञानता और सामाजिक असमानता से मुक्ति भी था। वे गांधीवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे और जीवन भर सादगी और शुचिता का पालन किया। उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति के प्रति अगाध श्रद्धा और भविष्य के भारत के लिए एक स्पष्ट विजन दिखाई देता है।
उनकी एक अन्य प्रसिद्ध रचना “दीप से दीप जले” में भी प्रेरणा और जागरण का स्वर मिलता है—
“दीप से दीप जले, तो जग में उजियारा हो जाए,
मन का अंधकार मिटे, हर घर में उजियारा छा जाए।”
यह कविता केवल प्रकाश का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह संदेश देती है कि एक व्यक्ति का जागरण पूरे समाज को प्रकाशित कर सकता है। इसी प्रकार उनकी अन्य कविताएँ जैसे “वेणु लो गूँजे धरा” और “अग्निपथ” भी राष्ट्रप्रेम और संघर्ष की प्रेरणा से ओतप्रोत हैं।
माखनलाल चतुर्वेदी की लेखनी में एक अद्भुत आग थी जो पढ़ने वाले के हृदय में धधकने लगती थी। उनकी कविताएँ केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि जीवंत अनुभव थे। 'हिमालय' शीर्षक वाली उनकी कविता में वे भारत की गरिमा का गान करते हुए कहते हैं कि हिमालय केवल पत्थर का पहाड़ नहीं, बल्कि भारत की अडिग प्रतिज्ञा का प्रतीक है। उनके कृतित्व का फलक बहुत विस्तृत है, जिसमें 'युग चरण', 'वेणु लो गूँजे धरा', 'मरण ज्वार' और 'साहित्य देवता' जैसी अमर कृतियाँ शामिल हैं। 'साहित्य देवता' में उनके गद्य काव्य का वह रूप निखर कर आया है जहाँ दर्शन और काव्य आपस में मिल जाते हैं। उन्होंने भाषा को केवल संवाद का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे भावनाओं के अनुसार ढाला। उनकी भाषा में कहीं-कहीं बुंदेलखंडी का पुट भी मिलता है जो उसे और अधिक मिट्टी से जोड़ता है।
अंतिम वर्षों में भी वे निरंतर लिखते रहे और समाज को दिशा देते रहे। 30 जनवरी 1968 को जब इस 'भारतीय आत्मा' ने पार्थिव देह का त्याग किया, तो हिंदी साहित्य का एक स्वर्णिम युग समाप्त हो गया, किंतु उनकी विरासत आज भी जीवित है। उनकी कविताएँ आज के संक्रमण काल में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कि ब्रिटिश शासन के दौरान थीं। वे हमें सिखाती हैं कि राष्ट्र केवल मानचित्र की रेखाओं से नहीं बनता, बल्कि वह उन नागरिकों के चरित्र और बलिदान की भावना से बनता है जो अपनी सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हैं। उनकी पंक्तियाँ "क्या लेकर तू आया था, क्या लेकर तू जाएगा" जैसे दार्शनिक भावों से लेकर "बलिपंथ के यात्री" जैसे साहसी आह्वानों तक फैली हुई हैं।
माखनलाल चतुर्वेदी एक ऐसे युगदृष्टा थे जिन्होंने अपनी कलम से इतिहास लिखा और अपने जीवन से एक आदर्श स्थापित किया। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके द्वारा जलाए गए देशभक्ति के दीप को बुझने न दें और उनके साहित्य में निहित मानवतावादी मूल्यों को अपने जीवन में उतारें। उनका नाम सदैव भारतीय साहित्य और स्वाधीनता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा, क्योंकि उन्होंने अपनी लेखनी से वह गौरव गान गाया जो अमर है और जो पीढ़ियों तक भारतीयों के मन में अपनी मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम और स्वाभिमान की ज्योति जलाता रहेगा। उनकी स्मृतियाँ हमें सदैव याद दिलाती रहेंगी कि कलम में तलवार से अधिक शक्ति होती है यदि उसे चलाने वाला हाथ निष्काम और हृदय राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत हो।


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