नक्सलवाद के अंत की ओर बढ़ता भारत सुरक्षा विकास और विश्वास की नई विजयगाथा

यह केवल सैन्य सफलता नहीं बल्कि सामाजिक पुनर्वास का भी उदाहरण है।

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भारत ने लंबे समय तक जिस आंतरिक चुनौती का सामना किया वह नक्सलवाद के रूप में देश के अनेक हिस्सों में फैली रही। यह समस्या केवल कानून व्यवस्था तक सीमित नहीं थी बल्कि इसने सामाजिक आर्थिक और मानवीय जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया। दशकों तक आदिवासी क्षेत्रों में भय असुरक्षा और पिछड़ापन बना रहा। गांवों में विकास की रफ्तार थम गई और लोगों का भरोसा व्यवस्था से डगमगाने लगा। आज जब देश नक्सलवाद के अंत की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा चुका है तब यह आवश्यक हो जाता है कि इस परिवर्तन के पीछे की नीति संकल्प और प्रयासों को समझा जाए।
 
गृह मंत्रालय के नेतृत्व में बीते वर्षों में जो रणनीति अपनाई गई वह बहुआयामी रही। केवल सुरक्षा बलों की तैनाती तक सीमित न रहकर सरकार ने विकास और विश्वास दोनों को साथ लेकर चलने का प्रयास किया। यही कारण है कि जिन क्षेत्रों में कभी बंदूक की आवाज गूंजती थी वहां आज स्कूल खुल रहे हैं सड़कें बन रही हैं और जीवन सामान्य हो रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं आया बल्कि इसके पीछे वर्षों की योजनाबद्ध मेहनत और स्पष्ट नीति रही है।
 
नक्सलवाद की जड़ें अक्सर गरीबी और पिछड़ेपन से जोड़कर देखी जाती रही हैं। लेकिन वास्तविकता इससे अधिक जटिल रही है। कई ऐसे क्षेत्र भी थे जहां आर्थिक स्थिति कमजोर थी फिर भी वहां नक्सलवाद नहीं पनपा। इसका अर्थ यह है कि नक्सलवाद केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि एक वैचारिक और रणनीतिक चुनौती भी था। वामपंथी उग्रवाद ने आदिवासी समाज को अपने प्रभाव में लेकर उन्हें मुख्यधारा से दूर करने का प्रयास किया। स्कूलों को जलाना विकास कार्यों को रोकना और भय का वातावरण बनाना इस रणनीति का हिस्सा रहा।
 
गृह मंत्रालय ने इस सच्चाई को समझते हुए अपनी नीति तैयार की। सुरक्षा बलों को आधुनिक संसाधनों से लैस किया गया। खुफिया तंत्र को मजबूत बनाया गया और स्थानीय पुलिस को सशक्त किया गया। इसके साथ ही आत्मसमर्पण की नीति को प्रभावी ढंग से लागू किया गया जिससे बड़ी संख्या में नक्सली मुख्यधारा में लौटे। यह केवल सैन्य सफलता नहीं बल्कि सामाजिक पुनर्वास का भी उदाहरण है।
 
बस्तर जैसे क्षेत्रों में जो परिवर्तन देखने को मिला वह इस नीति की सफलता का प्रमाण है। जहां कभी प्रशासन की पहुंच सीमित थी वहां आज सरकारी योजनाएं प्रभावी ढंग से लागू हो रही हैं। राशन की दुकानों से लेकर स्वास्थ्य केंद्र तक लोगों को सुविधाएं मिल रही हैं। आधार और राशन कार्ड के माध्यम से लाभ सीधे लोगों तक पहुंच रहा है। इससे लोगों का विश्वास बढ़ा है और वे हिंसा से दूर होकर विकास की राह पर चलने लगे हैं।
 
इसके विपरीत यदि पिछले दशकों की स्थिति पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि लंबे समय तक इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया गया। पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना रहा। सड़कें नहीं बनीं स्कूल नहीं खुले और स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंचीं। इस शून्य का लाभ उठाकर उग्रवादी संगठनों ने अपनी पकड़ मजबूत की। लोगों को यह विश्वास दिलाया गया कि व्यवस्था उनके खिलाफ है और हथियार उठाना ही एकमात्र रास्ता है।
 
यह भी देखा गया कि उस समय नक्सलवाद के खिलाफ स्पष्ट और कठोर नीति का अभाव था। कई बार राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर दिखाई दी और समस्या को टालने का प्रयास किया गया। इससे नक्सलवाद का विस्तार हुआ और वह कई राज्यों तक फैल गया। देश के एक बड़े भूभाग में इसका प्रभाव देखा गया जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरा उत्पन्न हुआ।
 
वर्तमान समय में स्थिति बदल चुकी है। गृह मंत्रालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि हिंसा का रास्ता अपनाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि जो लोग भटक गए हैं उन्हें वापस लाने का अवसर मिले। इस संतुलित दृष्टिकोण ने सकारात्मक परिणाम दिए हैं। बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है और हिंसा की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब आदिवासी समाज स्वयं इस बदलाव का भागीदार बन रहा है। वे समझ चुके हैं कि विकास और शांति ही उनके भविष्य का आधार है। सरकार द्वारा चलाए जा रहे शिक्षा स्वास्थ्य और रोजगार के कार्यक्रमों ने उन्हें नई दिशा दी है। युवा पीढ़ी अब हथियार नहीं बल्कि शिक्षा और रोजगार को अपना लक्ष्य बना रही है।
 
नक्सलवाद के अंत की यह यात्रा केवल सरकार की उपलब्धि नहीं बल्कि पूरे समाज की जीत है। इसमें सुरक्षा बलों का साहस प्रशासन की प्रतिबद्धता और आम नागरिकों का सहयोग सभी शामिल हैं। यह उदाहरण दर्शाता है कि यदि सही नीति और दृढ़ संकल्प के साथ कार्य किया जाए तो सबसे जटिल समस्याओं का समाधान भी संभव है।आज जब देश इस चुनौती से लगभग मुक्त होने की ओर बढ़ रहा है तब यह आवश्यक है कि इस उपलब्धि को बनाए रखा जाए। विकास की गति को निरंतर बनाए रखना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी क्षेत्र फिर से पिछड़ापन और असुरक्षा का शिकार न बने। यही सच्चे अर्थों में नक्सलवाद के अंत की स्थायी गारंटी होगी।
 
अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत ने एक लंबी और कठिन लड़ाई में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। गृह मंत्रालय के नेतृत्व में अपनाई गई रणनीति ने यह सिद्ध कर दिया है कि सुरक्षा और विकास साथ साथ चल सकते हैं। यह केवल एक समस्या का समाधान नहीं बल्कि नए भारत की दिशा का संकेत है जहां हर नागरिक को समान अवसर और सुरक्षित जीवन का अधिकार प्राप्त है।
 
कांतिलाल मांडोत

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