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जनता पर आए न तपिश सरकार की बड़ी कोशिश और जनकल्याण की दिशा में मजबूत कदम
उसकी प्राथमिकता जनता को राहत देना है न कि बोझ बढ़ाना
पश्चिम एशिया में जारी महासंग्राम ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने अनेक देशों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। अमेरिका से लेकर यूरोप तक आम नागरिक महंगे पेट्रोल डीजल का बोझ झेलने को मजबूर हैं। कई देशों में कीमतों में भारी वृद्धि के कारण महंगाई चरम पर पहुंच चुकी है और लोगों के दैनिक जीवन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा है। ऐसे कठिन समय में भारत सरकार ने एक ऐसा निर्णय लिया है जिसने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसकी प्राथमिकता जनता को राहत देना है न कि बोझ बढ़ाना।
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार ने उत्पाद कर में प्रति लीटर दस रुपये की कटौती का बड़ा फैसला किया है। यह कदम केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं बल्कि एक संवेदनशील शासन दृष्टिकोण का प्रतीक है। जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें सत्तर डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर एक सौ बाईस डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं तब इस तरह की राहत देना आसान नहीं होता। इसके बावजूद सरकार ने यह जोखिम उठाया ताकि आम आदमी पर महंगाई की मार न पड़े।
यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि सरकार का अभिगम पूरी तरह जनतालक्षी है। सरकार यह समझती है कि ईंधन की कीमतों का सीधा असर हर वस्तु और सेवा पर पड़ता है। यदि पेट्रोल डीजल महंगा होगा तो परिवहन लागत बढ़ेगी और उसके साथ ही खाद्यान्न से लेकर दैनिक उपयोग की वस्तुएं भी महंगी हो जाएंगी। इस स्थिति से बचाने के लिए सरकार ने अपने राजस्व में कटौती सहने का रास्ता चुना। अनुमान है कि इस फैसले से सरकार को हर पंद्रह दिनों में हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार उठाना पड़ेगा। इसके बावजूद यह निर्णय लिया गया क्योंकि प्राथमिकता जनता की राहत है।
सरकार ने केवल कर में कटौती ही नहीं की बल्कि ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखने के लिए भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। वाणिज्यिक एलपीजी की आपूर्ति को बढ़ाकर सत्तर प्रतिशत तक करने का निर्णय इसका एक बड़ा उदाहरण है। इससे उद्योगों को आवश्यक ऊर्जा उपलब्ध होगी और उत्पादन पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। विशेष रूप से स्टील ऑटोमोबाइल और टेक्सटाइल जैसे श्रम आधारित उद्योगों को इसका लाभ मिलेगा। इससे रोजगार के अवसर सुरक्षित रहेंगे और आर्थिक गतिविधियां सुचारु रूप से चलती रहेंगी।
आज जब दुनिया के कई देश ईंधन की कमी से जूझ रहे हैं तब भारत में पर्याप्त भंडार बनाए रखना भी सरकार की दूरदर्शिता को दर्शाता है। देश के पास साठ दिनों से अधिक का पेट्रोलियम भंडार उपलब्ध है। यह स्थिति आम नागरिकों में विश्वास पैदा करती है और घबराहट को रोकती है। सरकार ने बार बार यह स्पष्ट किया है कि देश में पेट्रोल डीजल या एलपीजी की कोई कमी नहीं है और लोगों को अनावश्यक रूप से भंडारण करने की आवश्यकता नहीं है।
इस पूरे परिदृश्य में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है और वह है अफवाहों पर नियंत्रण। संकट के समय अफवाहें स्थिति को और बिगाड़ सकती हैं। कुछ स्थानों पर पेट्रोल पंपों पर भीड़ देखी गई लेकिन सरकार ने तुरंत स्पष्ट किया कि यह घबराहट बेबुनियाद है। ऊर्जा आपूर्ति पूरी तरह सामान्य है और किसी भी प्रकार का लॉकडाउन या प्रतिबंध लागू करने की कोई योजना नहीं है। इस तरह के स्पष्ट संदेश से जनता में विश्वास कायम हुआ है।
सरकार के इस दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उसने केवल वर्तमान संकट को संभालने पर ही ध्यान नहीं दिया बल्कि भविष्य की संभावित चुनौतियों के लिए भी तैयारी की है। निर्यात पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का निर्णय इसी दिशा में एक कदम है। इससे देश के भीतर पेट्रोलियम उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित होगी और घरेलू बाजार में स्थिरता बनी रहेगी। यह निर्णय उद्योग और उपभोक्ता दोनों के हितों को संतुलित करने का प्रयास है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार ने इस संकट को एक अवसर के रूप में लिया है जिसमें वह अपनी नीतियों के माध्यम से जनता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को साबित कर सके। जब पूरी दुनिया महंगाई और अस्थिरता से जूझ रही है तब भारत ने एक अलग उदाहरण प्रस्तुत किया है। यहां सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि आम नागरिक को कम से कम परेशानी हो और आर्थिक गतिविधियां भी बाधित न हों।
इस नीति का सामाजिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। जब जनता को यह महसूस होता है कि सरकार उनके साथ खड़ी है तब समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। लोग अधिक जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करते हैं और संकट का सामना करने में सहयोग करते हैं। यही कारण है कि सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे केवल अपनी जरूरत के अनुसार ही ईंधन खरीदें और अनावश्यक घबराहट से बचें।
अंततः यह स्पष्ट होता है कि यह निर्णय केवल आर्थिक गणना का परिणाम नहीं है बल्कि एक व्यापक सोच का हिस्सा है जिसमें जनता की भलाई सर्वोपरि है। सरकार ने यह दिखाया है कि कठिन परिस्थितियों में भी जनहित को प्राथमिकता दी जा सकती है। भले ही इससे सरकारी खजाने पर दबाव पड़े लेकिन यदि इससे करोड़ों लोगों को राहत मिलती है तो यह एक सार्थक और न्यायसंगत निर्णय है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह संदेश दिया है कि मजबूत नेतृत्व और संवेदनशील नीति निर्माण के माध्यम से किसी भी वैश्विक संकट का प्रभाव कम किया जा सकता है। भारत ने यह साबित किया है कि वह न केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा और सुविधा का ध्यान रखता है बल्कि वैश्विक अस्थिरता के बीच भी स्थिरता का उदाहरण बन सकता है। जनता पर आए न तपिश यह केवल एक नारा नहीं बल्कि एक सशक्त संकल्प है जिसे सरकार अपने निर्णयों के माध्यम से साकार कर रही है।
कांतिलाल मांडोत
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