अली लारिजानी की हत्या से अमेरिका इजरायल के बीच बिगड़ते कूटनीतिक समीकरण

यह युद्ध केवल क्षेत्रीय नहीं रहा, बल्कि वैश्विक संकट का रूप ले चुका है।

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इज़रायल द्वारा अली लारिजानी की कथित हत्या ने मध्य-पूर्व के भू-राजनीतिक परिदृश्य को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ पहले से सुलग रहा ईरान इजरायल संघर्ष अब खुली ज्वाला में परिवर्तित होता दिखाई दे रहा है। लगभग बीस दिनों से जारी इस संघर्ष ने अब केवल सैन्य सीमाओं को नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के संतुलन को भी बुरी तरह प्रभावित करना शुरू कर दिया है। ऊर्जा बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव, तेल और गैस की कीमतों में उछाल, और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की अनिश्चितता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह युद्ध केवल क्षेत्रीय नहीं रहा, बल्कि वैश्विक संकट का रूप ले चुका है।

अमेरिका का यह दावा है कि इज़रायल ने बिना पूर्व अनुमति के यह कार्रवाई की है, रणनीतिक साझेदारी में दरार का संकेत देता है, और यही दरार अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिकी दृष्टिकोण को यदि उनके दोनों कार्यकालों के संदर्भ में देखा जाए तो एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है।पहले कार्यकाल में ट्रम्प की नीति आक्रामक होते हुए भी नियंत्रित थी, जहाँ उन्होंने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए, ईरान न्यूक्लियर डील से बाहर निकलकर दबाव की राजनीति को अपनाया, लेकिन साथ ही प्रत्यक्ष बड़े युद्ध से बचने की रणनीति भी बनाए रखी, वे “अधिकतम दबाव” की नीति के माध्यम से ईरान को झुकाना चाहते थे, न कि सीधे सैन्य टकराव में उलझना।

इसके विपरीत दूसरे कार्यकाल में परिदृश्य अधिक जटिल और अनियंत्रित प्रतीत होता है, जहाँ सहयोगी देशों के बीच भी समन्वय की कमी सामने आ रही है, इज़रायल द्वारा बिना सूचना के की गई इस कार्रवाई ने यह दर्शा दिया है कि अब अमेरिका की पकड़ अपने सहयोगियों पर पहले जैसी नहीं रही, और निर्णय अधिक बिखरे हुए तथा आक्रामक हो गए हैं। अली लारीजानी को ईरान के भीतर एक संतुलित और संवाद समर्थक नेता माना जाता रहा है, उनकी अनुपस्थिति ने ईरान की राजनीति में कठोर रुख रखने वाले धड़ों को और अधिक प्रभावशाली बना दिया है, जिससे किसी भी प्रकार के युद्धविराम या समझौते की संभावना लगभग समाप्त हो गई है, वहीं इजरायल की रणनीति अब स्पष्ट रूप से निर्णायक सैन्य बढ़त हासिल करने की दिशा में बढ़ती दिख रही है, जिसमें कूटनीति के लिए बहुत कम स्थान बचा है। इस संघर्ष का विस्तार तब और स्पष्ट हो गया।

कतर में स्थित गैस और तेल भंडारों पर हमलों की खबरें सामने आईं, यह केवल सैन्य शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को नियंत्रित करने की रणनीतिक चाल भी है, जिसका प्रभाव यूरोप, एशिया और विशेषकर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर गहराई से पड़ रहा है। ट्रम्प के दोनों कार्यकालों की तुलना इस पूरे संकट को समझने में महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करती है।पहले कार्यकाल में उन्होंने शक्ति और कूटनीति के बीच एक संतुलन बनाए रखने की कोशिश की, जहाँ दबाव के साथ संवाद की संभावना जीवित रही, लेकिन दूसरे कार्यकाल में परिस्थितियाँ अधिक अस्थिर और अप्रत्याशित हो गई हैं, सहयोगी देशों की स्वतंत्र कार्रवाइयाँ, क्षेत्रीय शक्तियों की आक्रामकता, और कूटनीतिक संवाद का लगभग समाप्त हो जाना यह संकेत देता है कि अब वैश्विक व्यवस्था अधिक विखंडित हो चुकी है।

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आज की स्थिति में सबसे बड़ा संकट केवल युद्ध नहीं, बल्कि संवाद के सभी रास्तों का बंद हो जाना है, जब बातचीत की संभावनाएँ समाप्त होती हैं तो युद्ध ही एकमात्र भाषा बन जाती है, और यही भाषा अंततः मानवता के लिए सबसे अधिक विनाशकारी सिद्ध होती है, वर्तमान परिदृश्य यह चेतावनी दे रहा है कि यदि शीघ्र ही कोई संतुलित और दूरदर्शी कूटनीतिक पहल नहीं हुई, तो यह संघर्ष एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध से आगे बढ़कर वैश्विक संकट का रूप ले सकता है, जिसकी कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी।

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संजीव ठाकुर

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