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एक नया भारत, जहां हर नन्हीं सांस सुरक्षित कल की नींव रखती है
नन्हीं सांसों का सुरक्षित देश — नई पहचान भारत की, अब बचपन किस्मत के भरोसे नहीं, मजबूत व्यवस्था के सहारे है
भारत ने इतिहास रच दिया है—और इस बार यह उपलब्धि किसी युद्ध, अर्थव्यवस्था या तकनीक की नहीं, बल्कि मानवता की सबसे कोमल धरोहर, हमारे बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी है। वह देश, जहां कभी हर हजार में सैकड़ों बच्चे पांच साल की उम्र तक पहुंचने से पहले ही जिंदगी हार जाते थे, आज उसी भारत में बचपन पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित और आश्वस्त नजर आता है। लगभग तीन दशकों में बाल मृत्यु दर में 79 प्रतिशत की ऐतिहासिक गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की आंखों में लौटी मुस्कान और अनगिनत सपनों की नई शुरुआत है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट ने इस परिवर्तन को न केवल स्वीकारा है, बल्कि भारत की खुले दिल से सराहना करते हुए इसे वैश्विक उदाहरण बताया है। यह वह क्षण है जब हर भारतीय को गर्व से भर जाना चाहिए।
बीते तीन दशकों में भारत ने जो बदलाव देखा है, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। 1990 में जहां हर 1000 में से 127 बच्चों की मौत पांच साल से पहले हो जाती थी, वहीं 2024 तक यह आंकड़ा घटकर सिर्फ 27 रह गया है। नवजात शिशुओं की मृत्यु दर भी 57 से घटकर 17 प्रति 1000 हो गई है। ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि उन असंख्य जीवनों की कहानी हैं जिन्हें समय रहते बचाया गया। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट इन तथ्यों की पुष्टि करती है, जिससे यह उपलब्धि और भी विश्वसनीय और महत्वपूर्ण बनती है। यह परिवर्तन दिखाता है कि मजबूत इच्छाशक्ति और सटीक नीतियों के साथ असंभव भी संभव हो सकता है।
भारत की प्रगति को 2025 की यूएन आईजीएमई रिपोर्ट ने प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया है। इसके अनुसार, अंडर-5 मृत्यु दर में 79 प्रतिशत और नवजात मृत्यु दर में लगभग 70 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। दक्षिण एशिया में भी भारत ने अग्रणी भूमिका निभाते हुए कुल कमी में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वैश्विक स्तर पर जहां कई देशों की प्रगति धीमी पड़ रही है, वहीं भारत ने निरंतर सुधार बनाए रखते हुए खुद को ‘एक्जेम्पलर’ यानी आदर्श के रूप में स्थापित किया है। इतनी बड़ी और विविध आबादी के बावजूद यह उपलब्धि दिखाती है कि सही रणनीति और समर्पण से बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।
इन बदलावों के पीछे भारत सरकार की योजनाओं और नीतियों का मजबूत तंत्र सक्रिय रहा है। जननी सुरक्षा योजना और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम ने संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देकर प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं को कम किया। यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम के जरिए बच्चों को समय पर टीकाकरण मिला, जिससे कई घातक बीमारियों पर नियंत्रण संभव हुआ। स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट्स और टेली-एसएनसीयू जैसी पहलों ने दूरदराज क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाईं। साथ ही आईएमएनसीआई जैसी योजनाओं ने बच्चों के बीमार होने पर त्वरित और प्रभावी इलाज सुनिश्चित किया। यही समन्वित प्रयास आंकड़ों को वास्तविक उपलब्धियों में बदलने का आधार बना।
क्षेत्रीय संदर्भ में देखें तो दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका बेहद अहम रही है। वर्ष 2000 में जहां इस क्षेत्र की बाल मृत्यु दर 92 प्रति 1000 थी, वह 2024 तक घटकर 32 रह गई—जिसमें भारत का योगदान सबसे अधिक है। वैश्विक स्तर पर भी भारत ने अपनी हिस्सेदारी में उल्लेखनीय कमी दर्ज की है। 1990 में अंडर-5 मौतों में भारत की बड़ी भागीदारी थी, जो अब काफी घट चुकी है (दक्षिण एशिया कुल वैश्विक मौतों का लगभग 25% है, जिसमें भारत प्रमुख रहा है)। नवजात मौतों में भी भारत ने उल्लेखनीय गिरावट हासिल की है। जहां उप-सहारा अफ्रीका अभी भी उच्च मृत्यु दर से जूझ रहा है, वहीं भारत ने दिखाया है कि विकासशील देश भी ठोस रणनीति और निरंतर प्रयासों से तेज सुधार कर सकते हैं।
जमीनी स्तर पर इन उपलब्धियों का प्रभाव सबसे स्पष्ट रूप से नजर आता है। अब गांवों और कस्बों में भी माता-पिता अपने बच्चों के स्वस्थ जीवन को लेकर पहले से अधिक आश्वस्त हैं। संस्थागत प्रसव बढ़ने से जन्म के समय जोखिम घटे हैं, वहीं टीकाकरण अभियानों ने पोलियो, खसरा जैसी बीमारियों को लगभग समाप्ति तक पहुंचा दिया है। विशेष नवजात देखभाल इकाइयों ने समय से पहले जन्मे या कम वजन वाले बच्चों को बचाने में अहम भूमिका निभाई है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि अधिकांश बाल मृत्यु रोकी जा सकती थीं—और भारत ने इन्हें रोककर नई उम्मीद की नींव रखी है। यह बदलाव केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास का भी प्रतीक है।
सफलता के इस मुकाम पर भी चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं। 2024 में वैश्विक स्तर पर 49 लाख बच्चों की मौत हुई, जिनमें 23 लाख नवजात शामिल हैं—यह स्थिति की गंभीरता दिखाता है। भारत में भी कुछ क्षेत्रों में असमानताएं बनी हैं, जहां स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता सुधार की मांग करती है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि सतत विकास लक्ष्यों के लिए प्रयासों की गति बढ़ानी होगी। स्टिलबर्थ सर्विलांस गाइडलाइंस जैसे कदम बताते हैं कि भारत भविष्य की चुनौतियों के प्रति भी सजग है। यही दूरदृष्टि आगे का रास्ता सुरक्षित करेगी।
भारत की यह कहानी केवल उपलब्धि नहीं, बल्कि प्रेरणा है—एक ऐसा उदाहरण जो दुनिया को सिखाता है कि जनसंख्या, संसाधन या भौगोलिक चुनौतियां सफलता में बाधा नहीं बनतीं, यदि नीतियां समावेशी और लक्ष्य स्पष्ट हों। आज जरूरत है कि इस प्रगति को बनाए रखा जाए और इसे और आगे बढ़ाया जाए। हर बच्चे को सुरक्षित, स्वस्थ और खुशहाल बचपन देना केवल सरकार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। यदि यह प्रयास निरंतर जारी रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत न केवल आर्थिक महाशक्ति बनेगा, बल्कि मानवीय विकास का भी सर्वोत्तम उदाहरण होगा—जहां हर बचपन सूरज की तरह उज्ज्वल, सुरक्षित और उम्मीदों से भरा होगा।


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