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अदालती उलझनों के चलते विशेषज्ञों की कमी से स्वास्थ्य सेवाएं बेहाल
हमारी शिक्षा और स्वास्थ्य पद्धति कितनी गौरवशाली थी और जिसका नाम पूरे विश्व में लिया जाता था
नई दुनिया के संपादकीय आलेख में मध्यप्रदेश में 24 घंटे सीजर डिलीवरी के लिए सौ अस्पताल भी नहीं होने की चिंताजनक स्थिति ने एक बार फिर प्रदेश की शासकीय स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई देश के सामने रख दी है। यह बताता है कि अदालती उलझनों के चलते राज्य सरकार के शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं में कई वर्षों से किए जा रहे भागीरथी प्रयासों के बावजूद भी वह अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है, जिनके लिए राज्य सरकार वास्तव में सम्मान की हकदार है । निस्संदेह मध्यप्रदेश में सीजर डिलीवरी के लिए सर्वसुविधायुक्त सौ से भी कम अस्पतालों का होना गंभीर चिंतन का विषय है।
सरकार हर ग्राम पंचायत स्तर पर आरोग्य केंद्रों के माध्यम से स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवाने का प्रयास कर रही है। सुदूर ग्रामीण अंचलों में भी शिक्षक, स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सरकार की योजनाओं को सक्रिय करते देखे जा सकते हैं। यह एक कड़वा सत्य है कि मध्यप्रदेश में पिछले कई वर्षों से पदोन्नति में आरक्षण से जुड़े मामलों के कारण पदोन्नतियां नहीं हो पाई हैं।
इसके चलते शिक्षा, स्वास्थ्य सहित कई विभागों में पद खाली पड़े हुए हैं, जिससे कार्य प्रभावित होना स्वाभाविक है। शासन के हर विभाग में पदोन्नति और सीधी भर्ती के अपने नियम होते हैं, जिनकी लक्ष्मण रेखा को वह लांघ नहीं सकता। आज न केवल स्वास्थ्य विभाग बल्कि शिक्षा सहित कई विभागों में पदोन्नति नहीं होने से प्रभारी बनाकर काम चलाया जा रहा है। कई विभागों की स्थिति तो उस गाड़ी के समान हो गई है जिसमें कुशल ड्राइवर के अभाव में क्लीनर को ही ड्राइवर की जिम्मेदारी देकर गाड़ी सौंप दी गई हो।
शिक्षा और स्वास्थ्य सरकार की दो ऐसी महत्वपूर्ण सेवाएं हैं जो सीधे मानव जीवन से जुड़ी होती हैं। इनके आधार पर ही एक सशक्त, समृद्ध और प्रगतिशील समाज का निर्माण होता है। शिक्षा मानव को ज्ञान और कौशल प्रदान करती है, जबकि स्वास्थ्य सेवाएं उसे शारीरिक और मानसिक ऊर्जा देती हैं। हजारों वर्ष पहले भारतीय शिक्षा पद्धति और प्राचीनकालीन चिकित्सा प्रणाली के उदाहरण हमारे सामने हैं, जो बताते हैं कि हमारी शिक्षा और स्वास्थ्य पद्धति कितनी गौरवशाली थी और जिसका नाम पूरे विश्व में लिया जाता था।
यह भी सत्य है कि कालांतर में भारत पर शासन करने आए आक्रमणकारियों ने सबसे पहले भारतीय शिक्षा पद्धति पर प्रहार किया, जिसके परिणामस्वरूप देश की गौरवशाली शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं आज अपने वैभवशाली अतीत की कहानी सुनाती प्रतीत होती हैं। किसी भी राष्ट्र के महान बनने में उसकी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की प्रमुख भूमिका होती है। मानवीय जीवन से जुड़ी इन सेवाओं में विशेषज्ञों का होना अत्यंत आवश्यक है।
आज यदि विश्व के कई देशों की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं, तो इसका मुख्य कारण यह है कि वहां की सरकारें इन दोनों सेवाओं के साथ कभी समझौता नहीं करतीं। दुनिया के कई विद्वानों का मानना है कि यदि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को राजनीति से मुक्त रखा जाए तो बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं। मध्यप्रदेश में भी स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना है तो विशेषज्ञों की कमी को दूर करना ही होगा।
अतः राज्य सरकार को चाहिए कि कानून के विद्वानों और माननीय न्यायालय के साथ मिलकर प्रदेश में वर्षों से लंबित पदोन्नति के मामलों पर कोई ऐसा जनहितकारी मार्ग निकाले, जिससे विशेषकर मानव जीवन से जुड़ी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं में विशेषज्ञों की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके। सीजर डिलीवरी के संदर्भ में भी यदि पदोन्नति से जुड़े दांव-पेच के मामलों पर जनहित को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेकर एनेस्थीसिया, स्त्री एवं प्रसूति रोग तथा शिशु रोग विशेषज्ञों की पदोन्नति की जाए, तो बहुत हद तक विशेषज्ञों की कमी दूर हो सकती है और प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर बन सकती हैं।
अरविंद रावल


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