असम के नाथ-योगी समुदाय को राजनीतिक उपेक्षा के खिलाफ आवाज

आगामी चुनाव में प्रेस विज्ञप्ति के जरिए टिकट की मांग

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असम धेमाजी। असम के सबसे प्राचीन मूल निवासियों में से एक, नाथ-योगी समुदाय, राजनीतिक रूप से सबसे उपेक्षित समूह बनकर उभरा है। भारत की स्वतंत्रता के पिछले 78 वर्षों में, असम विधानसभा के लिए इस समुदाय से अब तक केवल 7 विधायक ही चुने गए हैं। इनमें से 5 विधायक बराक घाटी से थे और केवल 2 ब्रह्मपुत्र घाटी से। ब्रह्मपुत्र घाटी के इन दो विधायकों में पहले 1956 में तत्कालीन गोलपाड़ा निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित स्वर्गीय खगेंद्रनाथ नाथ थे और दूसरे 1972 में रहा विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित स्वर्गीय गुणेंद्र नाथ पंडित थे।
 
असम प्रादेशिक योगी सम्मेलनी के अध्यक्ष धीरेंद्र नाथ ने राजनीतिक क्षेत्र में इस शून्यता को समुदाय के पिछड़ेपन का मुख्य कारण बताया है। आज समाचार पत्रों को जारी एक बयान में उन्होंने कहा कि असम की बराक और ब्रह्मपुत्र दोनों घाटियों में, सदिया से धुबरी तक और कोकराझार से करीमगंज तक, लगभग 45 लाख स्वदेशी नाथ-योगी समुदाय के लोग बिखरे हुए हैं। इसके अलावा नगांव, मरिगांव, दरंग, शोणितपुर, गोलपाड़ा, बोंगाईगांव और होजाई जैसे जिलों में हजारों नाथ-योगी युगों से रह रहे हैं। इन जिलों के साथ-साथ धुबरी, बिलासीपारा, कोकराझार, उदलगुरी, लखीमपुर, माजुली, धेमाजी, शिवसागर, जोरहाट और गोलाघाट सहित असम के लगभग हर जिले में यह समुदाय प्राचीन निवासी है। विशेष रूप से मरिगांव, बोरचला और सिपाझार जैसे महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्रों में नाथ-योगियों के 40,000 से अधिक वोट हैं।
 
अध्यक्ष ने आगे कहा कि नाथ-योगियों को अलग रखकर असम का इतिहास अधूरा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर असम के विदेशी बहिष्कार आंदोलन तक, देश के लिए सैकड़ों नाथ-योगियों ने अपने रक्त का बलिदान दिया है। चर्यापद (प्रथम लिखित असमिया साहित्य) के रचयिता नाथ सिद्धों के समय से लेकर वर्तमान में असम की समृद्ध लोक संस्कृति और बेशकीमती पाट-मुगा रेशम उद्योग के संरक्षण और प्रचार में अग्रणी होने के बावजूद, आज यह समुदाय सबसे उपेक्षित है।
 
उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि छह साल के विदेशी बहिष्कार आंदोलन में 140 नाथ-योगी शहीद हुए, जिसके परिणामस्वरूप असम में क्षेत्रीयतावादी सरकार बनी, लेकिन एक भी नाथ-योगी विधायक नहीं बन सका। सनातन धर्म के अनुयायी होने के नाते, समुदाय के 95% से अधिक लोग वर्तमान भाजपा सरकार के कट्टर समर्थक हैं, फिर भी उस दल से एक भी नाथ-योगी को टिकट नहीं मिलता। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार में भागीदारी के बिना कोई समुदाय अपनी समस्याओं का समाधान कैसे कर सकता है? राजनीतिक दलों की इस निरंतर उपेक्षा ने समुदाय में आक्रोश पैदा किया है, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास कम हो रहा है।
 
उम्मीदवारों की सूची और चेतावनी: सम्मेलनी के अनुसार, आगामी विधानसभा चुनाव के लिए नाथ-योगी समुदाय के 14 से अधिक उम्मीदवारों ने भाजपा और कांग्रेस से टिकट के लिए आवेदन किया है। प्रमुख नाम इस प्रकार हैं: भाजपा (BJP) से दावेदार:  बेनुधर नाथ (कमलपुर), उत्पल नाथ (मरिगांव),मनोज सहरिया और श्री निपन नाथ (सिपाझार), राकेश नाथ (बोरचला), गुणराम नाथ (तिताबोर), बिश्वजीत सहरिया और जोनमोनी देवी (टंगला), रॉबिन नाथ (पलाशबाड़ी), अंजन नाथ (हैलाकांडी),किशोर नाथ (बरखला) और आशीष नाथ (करीमगंज)।कांग्रेस (INC) से दावेदार: श्री बेनुधर नाथ (ढेकियाजुली और बोरचला), श्री करुणाकांत मेधी (सिपाझार)।
 
अध्यक्ष धीरेंद्र नाथ ने दोनों प्रमुख दलों से इन उम्मीदवारों को टिकट देने की पुरजोर मांग की है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि '2026 की विधानसभा' नाथ-योगी विधायकों से शून्य नहीं रहनी चाहिए। यदि राजनीतिक दलों ने इस बार भी उन्हें नजरअंदाज किया, तो समुदाय आगामी चुनावों में कड़ा निर्णय लेने के लिए बाध्य होगा। प्रेस विज्ञप्ति के जरिए असम प्रदेश नाथ योगी सम्मेलन के प्रदेश अध्यक्ष धीरेन नाथ ने ऐलान किया।

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