बीमारी ही नहीं, बल्कि कारण का भी इलाज करती है होम्योपैथिक : डॉ.एलआर सिंह
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शंकरगढ़(प्रयागराज)। त्वरित राहत और बहु-दवा पद्धति के इस दौर में जहां अधिकांश लोग तुरंत असर दिखाने वाले उपचार की ओर आकर्षित हो रहे हैं, वहीं होम्योपैथी जैसी सूक्ष्म, गहन और व्यक्ति-केंद्रित चिकित्सा पद्धति आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है । यह चिकित्सा प्रणाली बीमारी को केवल शारीरिक लक्षणों तक सीमित नहीं मानती, बल्कि व्यक्ति के स्वभाव, मानसिक अवस्था और भावनात्मक संतुलन से जोड़कर देखती है । उक्त बातें लाइनपार पटहट रोड़ स्थित संजीवनी क्लिनिक के प्रबंधक डॉ. एलआर सिंह ने कही , ।
उन्होंने कहा कि होम्योपैथी एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है जिसमें अधिकांश बीमारियों का उपचार संभव है, बशर्ते रोगी अपनी समस्या को स्पष्ट और ईमानदारी से बताए । हर बीमारी कहीं न कहीं व्यक्ति की भावनात्मक अवस्था से जुड़ी होती है । बिना भावना के कोई कार्य नहीं होता और बिना भावनात्मक कारण के बीमारी भी नहीं आती । जब तक व्यक्ति का मन समस्या को स्वीकार नहीं करता, तब तक बीमारी का वास्तविक स्वरूप सामने नहीं आता । हम रोग को केवल लक्षण के स्तर पर नहीं, बल्कि उसके भावनात्मक कारण यानी जड़ से पकड़ने का प्रयास करते हैं । डॉ. एलआर सिंह ने कहा कि कैंसर के उपचार में उसकी अवस्था सबसे अहम होती है । प्रथम और द्वितीय अवस्था में कैंसर का उपचार संभव है, लेकिन तृतीय अवस्था में स्थिति अत्यंत जटिल हो जाती है । दुर्भाग्यवश अधिकतर रोगी बहुत देर से होम्योपैथी की ओर आते हैं । जब तक वे आते हैं, तब तक शरीर और मन दोनों काफी कमजोर हो चुके होते हैं ।
यदि प्रारंभिक अवस्था में ही रोगी होम्योपैथिक उपचार ले, तो बेहतर और सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं । और मधुमेह आज एक गंभीर और व्यापक समस्या बन चुकी है । यदि यह रोग 40 वर्ष की आयु से पहले होता है, तो होम्योपैथी में इसका उपचार और नियंत्रण संभव है । होम्योपैथिक औषधियों से रक्त शर्करा को संतुलित किया जा सकता है । समस्या तब आती है जब मरीज पहले लंबे समय तक अन्य पद्धतियों पर निर्भर रहता है और बाद में होम्योपैथी की ओर आता है । ऐसे मामलों में सुधार कठिन हो जाता है ।
लेकिन जिन रोगियों को मधुमेह का पता चलते ही वे होम्योपैथी में उपचार शुरू करते हैं, उनमें परिणाम काफी बेहतर और शीघ्र मिलते हैं । यदि रोगी चिकित्सक की सलाह का ईमानदारी से पालन करे, उचित परहेज रखे और अनुशासित दिनचर्या अपनाए, तो मधुमेह में एक महीने के भीतर सकारात्मक परिणाम दिखने लगते हैं । नियमित सुबह की सैर, संतुलित खानपान और समय पर औषधि सेवन से शरीर की प्रतिक्रिया बेहतर होती है । होम्योपैथी में त्वरित नहीं बल्कि स्थाई सुधार पर काम किया जाता है, इसलिए धैर्य और अनुशासन ही उपचार की सबसे बड़ी सफलता का आधार है ।
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