अम्बेडकरनगर में सरकारी योजना हाइजैक, किसान बेबस
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अम्बेडकरनगर। जनपद में धान खरीद योजना ध्वस्त नहीं हुई है, बल्कि सुनियोजित तरीके से हाइजैक कर ली गई है। जिला अधिकारी के निर्देश, बैठकों और चेतावनियों के बावजूद खाद्य विभाग के खरीद केन्द्रों पर केन्द्र प्रभारी–आढ़ती–मिलर गठजोड़ पूरी व्यवस्था को नियंत्रित कर रहा है। नतीजा यह है कि सरकारी खरीद काग़ज़ों में पूरी दिखाई जा रही है, जबकि ज़मीन पर किसान लुट रहा है।
भीटी प्रथम और द्वितीय सेंटर पर यह घोटाला सबसे संगठित रूप में सामने आया है। खाद्य विभाग के सेनपुर तकिया कला सेंटर 01 और 02 पर सिंगल कांटे से 1200 कुंतल तौल कर रहे हैं और तौल के नाम पर किसानों से 150 से 250 रुपये प्रति कुंतल तक मनमानी वसूली की जा रही है। कई किसानों को अंगूठा लगाने के लिए हफ्तों तक दौड़ाया जा रहा है, जिससे वे डर और असमंजस में रहें। भय के कारण किसान कैमरे के सामने भी आने से बच रहा है, क्योंकि उसे आशंका है कि कहीं अंगूठा न लगवाकर उसकी पूरी उपज ही हड़प न ली जाए।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ज़मीनी अव्यवस्था और तौल न होने के बावजूद सरकारी रिपोर्ट में रोज़ाना चमत्कारिक आंकड़े दर्ज किए जा रहे हैं। काग़ज़ों में एक केन्द्र से 600 कुंतल और दो केन्द्रों से 1200 कुंतल प्रतिदिन की खरीद दिखाई जा रही है। स्पष्ट है कि यहां धान की नहीं, बल्कि आंकड़ों की तौल हो रही है।
सूत्रों का दावा है कि असली खेल केन्द्रों के बाहर खेला जा रहा है। किसान का धान केन्द्र पर पहुँचने से पहले ही आढ़तियों के माध्यम से सीधे मिलरों को लगभग 1800 से 2000 रुपये प्रति कुंतल की दर से बेच दिया जाता है। इसके बाद केन्द्र प्रभारी किसानों को बुलाकर सिर्फ अंगूठा लगवाते हैं, ताकि सरकारी रजिस्टर पूरे हो जाएं। धान मिलर के गोदाम में रहता है, एंट्री सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज होती है और किसान खाली हाथ घर लौटता है।
खरीद केन्द्रों पर किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। सुबह से शाम तक लाइन में खड़े रहने के बाद कभी “कांटा खराब”, कभी “स्टाफ नहीं”, तो कभी “आज तौल बंद” कहकर उन्हें लौटा दिया जाता है। थक–हारकर किसान वही करता है, जो यह सिस्टम चाहता है—वह मजबूरी में आढ़तियों के आगे झुक जाता है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिन खरीद केन्द्रों का भौतिक अस्तित्व तक संदिग्ध बताया जा रहा है, वहां रोज़ाना सैकड़ों कुंतल धान की खरीद किस आधार पर दर्शाई जा रही है। क्या यह सब बिना उच्च स्तर के संरक्षण के संभव है, या फिर जिम्मेदार अधिकारी केवल काग़ज़ी रिपोर्ट देखकर संतुष्ट हो रहे हैं।
यदि तत्काल सभी खरीद केन्द्रों का भौतिक सत्यापन, तौल प्रक्रिया की सीसीटीवी व जीपीएस आधारित निगरानी, और केन्द्र प्रभारियों की विधिवत जांच कर कड़ी कार्यवाही नहीं की जाती है तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि धान खरीद योजना किसानों के हित में नहीं, बल्कि माफिया के लाभ के लिए चलाई जा रही है।
यह अब प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित आर्थिक लूट का मामला है। अब सवाल सिर्फ एक है— क्या प्रशासन आंख मूंदे रहेगा, या इस धान खरीद महाघोटाले पर सख्त कार्रवाई होगी?
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