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 वैश्विक शक्ति का विकेंद्रीकरण और उभरते नए आयाम

- महेन्द्र तिवारी        इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक परिदृश्य एक ऐसे परिवर्तनकारी मोड़ पर खड़ा है जहाँ पुरानी व्यवस्थाओं की दीवारें ढह रही हैं और नई शक्तियों का उदय हो रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें...
संपादकीय  स्वतंत्र विचार