भारतीय गणितीय मेधा का संघर्ष और उनका विश्वव्यापी प्रभाव

जहाँ केवल शुद्ध तर्क और सूत्र विद्यमान थे

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महेन्द्र तिवारी 
 
भारत की पावन धरा अनादि काल से ही ज्ञान और विज्ञान की जननी रही है। इस भूमि ने समय समय पर ऐसी महान विभूतियों को जन्म दिया है जिन्होंने अपनी विलक्षण प्रतिभा से न केवल राष्ट्र को गौरवान्वित किया बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त किया। इन्हीं दैदीप्यमान नक्षत्रों में से एक नाम है श्रीनिवास रामानुजन का। वे एक ऐसे गणितज्ञ थे जिनकी मेधा ने आधुनिक काल में पूरे विश्व को विस्मय में डाल दिया। उनका जीवन इस शाश्वत सत्य का जीवंत उदाहरण है कि यदि मनुष्य के भीतर अटूट लगन, अदम्य साहस और तीव्र जिज्ञासा हो तो वह अभावों के अंधकार को चीरकर सफलता के सूर्य तक पहुँच सकता है।
 
रामानुजन ने अपनी अल्पायु में ही गणित के क्षेत्र में जो कीर्तिमान स्थापित किए वे आज भी शोधार्थियों के लिए पहेली और प्रेरणा बने हुए हैं। उनका जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के इरोड नामक एक छोटे से स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम के. श्रीनिवास अयंगार था जो एक साधारण मुनीम के रूप में कार्य करते थे और माता का नाम कोमलतम्मल था। उनका परिवार अत्यंत सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंध रखता था जिसके कारण बचपन से ही उन्हें भौतिक सुख सुविधाओं की कमी खलती रही पर उनकी मानसिक संपदा इतनी धनी थी कि बाहरी बाधाएँ उन्हें अधिक समय तक रोक न सकीं।
 
रामानुजन का प्रारंभिक जीवन कुंभकोणम की गलियों में बीता जहाँ उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। बचपन से ही उनके व्यवहार में एक विशेष प्रकार की गंभीरता और एकाग्रता देखी जा सकती थी। जब उनके आयु के अन्य बालक खेलकूद में व्यस्त रहते थे तब रामानुजन संख्याओं के रहस्यों को सुलझाने में लीन रहते थे। उनका मन विद्यालयी पाठ्यक्रम की सीमाओं को लांघकर गणित की उस अनंत गहराइयों में उतरने के लिए व्याकुल रहता था जहाँ केवल शुद्ध तर्क और सूत्र विद्यमान थे।
 
कहा जाता है कि मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होंने उच्च गणित के उन सिद्धांतों को समझ लिया था जिन्हें सामान्यतः स्नातक स्तर के विद्यार्थी भी कठिन मानते हैं। उनकी रुचि इतनी गहरी और एकाग्र थी कि वे अन्य विषयों की ओर ध्यान ही नहीं दे पाते थे। यही कारण था कि उनकी औपचारिक शिक्षा में व्यवधान उत्पन्न हुआ। वे गणित की परीक्षा में तो शत प्रतिशत अंक प्राप्त करते थे परंतु इतिहास, भूगोल और अंग्रेजी जैसे विषयों में उनकी रुचि न होने के कारण वे असफल हो जाते थे। इस कारण उनकी छात्रवृत्ति भी रुक गई और उन्हें कई बार महाविद्यालय छोड़ना पड़ा। यह उनके जीवन का एक कठिन दौर था जहाँ समाज उन्हें एक असफल विद्यार्थी के रूप में देख रहा था परंतु उनके भीतर के गणितज्ञ को स्वयं पर पूर्ण विश्वास था।
 
शिक्षा अधूरी रहने के बाद भी रामानुजन ने अपने शोध कार्य को कभी थमने नहीं दिया। वे निरंतर अपनी पुस्तिकाओं में नए नए सूत्रों को अंकित करते रहते थे। उनके पास अध्ययन के लिए न तो कोई श्रेष्ठ पुस्तकालय था और न ही कोई अनुभवी मार्गदर्शक। वे स्वयं ही अपने शिक्षक थे और स्वयं ही शिष्य। उनके पास लिखने के लिए कागज की भी कमी रहती थी इसलिए वे एक स्लेट पर अपनी गणनाएं करते और अंतिम परिणाम को अपनी पुस्तिका में लिख लेते थे। यही वे पुस्तिकाएं थीं जो बाद में चलकर गणितीय जगत की सबसे बड़ी निधि बनीं।
 
आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में एक साधारण लिपिक की नौकरी कर ली ताकि परिवार का भरण पोषण हो सके। इसी दौरान उनके अधिकारियों ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें प्रोत्साहित किया। रामानुजन के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने इंग्लैंड के विख्यात गणितज्ञ जी. एच. हार्डी को पत्र लिखा। उस पत्र में उन्होंने अपने द्वारा खोजे गए लगभग 120 जटिल सूत्र और प्रमेय संकलित किए थे। हार्डी उन सूत्रों को देखकर स्तब्ध रह गए क्योंकि उनमें से कई सूत्र ऐसे थे जिनकी कल्पना भी उस समय के श्रेष्ठ यूरोपीय गणितज्ञों ने नहीं की थी। हार्डी ने तुरंत पहचान लिया कि यह किसी साधारण व्यक्ति का कार्य नहीं है बल्कि एक दुर्लभ प्रतिभा का प्रमाण है।
 
हार्डी के निमंत्रण पर 1914 में रामानुजन इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पहुँचे। वहां का वातावरण, संस्कृति और खानपान उनके लिए पूर्णतः भिन्न था। एक शाकाहारी और धार्मिक व्यक्ति होने के नाते उन्हें वहां कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा परंतु उनका लक्ष्य अटल था। उन्होंने हार्डी के साथ मिलकर शोध कार्य प्रारंभ किया। वहां उनकी प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह पहचान मिली जिसके वे वास्तविक हकदार थे। उन्होंने संख्या सिद्धांत, अनंत श्रेणियों, विभाजन सिद्धांत और निरंतर भिन्नों के क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य किए। उनकी कार्यशैली बहुत अद्भुत थी। वे अक्सर बिना किसी लंबी प्रक्रिया के सीधे परिणाम प्रस्तुत कर देते थे।
 
जब उनसे पूछा जाता कि ये सूत्र उनके मन में कैसे आते हैं तो वे बड़ी विनम्रता से कहते थे कि उनकी कुलदेवी उन्हें स्वप्न में ये सूत्र प्रदान करती हैं। यह उनकी श्रद्धा और मानसिक एकाग्रता का चरमोत्कर्ष था। उनकी खोजें इतनी सूक्ष्म थीं कि उन्हें सिद्ध करने में अन्य विद्वानों को दशकों का समय लग गया। 1918 में उन्हें रॉयल सोसाइटी का सदस्य निर्वाचित किया गया जो उस समय किसी भी भारतीय के लिए अपूर्व सम्मान था। इसी वर्ष उन्हें ट्रिनिटी महाविद्यालय के अधिछात्र के रूप में भी चुना गया।
 
इंग्लैंड की विषम जलवायु और द्वितीय विश्व युद्ध के समय उपलब्ध भोजन की सीमाओं ने उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला। वे शाकाहारी थे और स्वयं खाना बनाकर खाते थे पर कार्य की अधिकता के कारण वे स्वास्थ्य की उपेक्षा करते रहे। उन्हें तपेदिक जैसी गंभीर बीमारी ने घेर लिया। अस्वस्थता की स्थिति में भी उनका मस्तिष्क निरंतर संख्याओं के बीच विचरण करता रहता था। उनके जीवन की एक बहुत ही प्रसिद्ध घटना उनके और हार्डी के बीच की बातचीत है जिसे आज 1729 की संख्या के रूप में जाना जाता है।
 
जब हार्डी उनसे मिलने चिकित्सालय पहुँचे तो उन्होंने उल्लेख किया कि जिस वाहन से वे आए उसका अंक 1729 था जो कि एक अत्यंत ही निरर्थक और साधारण सा अंक प्रतीत होता है। रामानुजन ने तुरंत उत्तर दिया कि यह संख्या साधारण नहीं है बल्कि बहुत ही विशेष है क्योंकि यह सबसे छोटी ऐसी संख्या है जिसे दो अलग अलग तरीकों से दो घनों के योग के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। उनके अनुसार 1729 को 1 के घन और 12 के घन के योग के रूप में भी देखा जा सकता है और 9 के घन तथा 10 के घन के योग के रूप में भी। इस घटना ने विश्व को बताया कि उनके लिए संख्याएं केवल प्रतीक नहीं थीं बल्कि वे उनके सजीव मित्रों के समान थीं।
 
स्वास्थ्य में सुधार न होने के कारण वे 1919 में भारत लौट आए। भारत आने पर उनका भव्य स्वागत हुआ परंतु उनकी शारीरिक स्थिति निरंतर बिगड़ती जा रही थी। वे अपने अंतिम समय तक भी बिस्तरे पर लेटे लेटे गणित के नए सूत्र लिखते रहे। अंततः 26 अप्रैल 1920 को मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में इस महान आत्मा ने पार्थिव शरीर त्याग दिया। रामानुजन का जीवन भले ही छोटा रहा हो लेकिन उनकी उपलब्धियां सदियों तक जीवित रहेंगी।
 
उन्होंने आधुनिक गणित को जो दिशा दी उसका उपयोग आज कंप्यूटर विज्ञान, भौतिकी और यहाँ तक कि अंतरिक्ष विज्ञान में भी किया जा रहा है। उनके द्वारा छोड़ी गई अप्रकाशित पुस्तिकाओं पर आज भी विश्व भर के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में शोध कार्य चल रहा है। भारत सरकार ने उनके अद्वितीय योगदान को सम्मान देते हुए उनके जन्मदिवस 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में घोषित किया है ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके जीवन से प्रेरणा ले सकें।
 
रामानुजन की कहानी केवल गणित की सफलता की कहानी नहीं है बल्कि यह मनुष्य की जिजीविषा और तपस्या की गाथा है। उन्होंने सिद्ध किया कि ज्ञान की साधना के लिए सुख सुविधाओं का होना अनिवार्य नहीं है बल्कि आंतरिक प्रकाश ही सबसे बड़ा मार्गदर्शक होता है। उनके जीवन के संघर्ष यह संदेश देते हैं कि असफलताएं केवल एक विराम हैं अंत नहीं। यदि वे अपनी परीक्षा की विफलताओं से हार मान लेते तो आज विश्व उनके महान सिद्धांतों से वंचित रह जाता। उनकी विनम्रता, सरलता और अपनी संस्कृति के प्रति प्रेम उन्हें एक पूर्ण मानव बनाते हैं।
 
आज जब हम आधुनिक युग की नई तकनीकी प्रगति को देखते हैं तो हमें उस महान गणितज्ञ का स्मरण अवश्य करना चाहिए जिसने अपनी कल्पना की शक्ति से शून्य से अनंत की यात्रा पूर्ण की। उनकी स्मृति हमारे हृदय में सदैव बनी रहेगी और उनकी प्रतिभा का आलोक पीढ़ियों को गणित की गूढ़ता को समझने के लिए प्रेरित करता रहेगा। उनका जीवन सदैव यह सिखाता रहेगा कि सच्ची लगन से असंभव को संभव बनाया जा सकता है। भारत की इस महान विभूति को शत शत नमन है जिनके कार्यों ने देश का मस्तक पूरे विश्व में गर्व से ऊंचा कर दिया।

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