लोकतंत्र का आधार: सशक्त ग्राम पंचायतें
इस व्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक और प्रभावशाली बनाने के लिए अपने महत्वपूर्ण परामर्श दिए
महेन्द्र तिवारी
भारत जैसे विशाल और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राष्ट्र की आत्मा उसके गाँवों में बसती है। यदि हम भारतीय लोकतंत्र के वृक्ष की कल्पना करें, तो इसकी जड़ें उन छोटी छोटी बस्तियों और गाँवों में हैं, जहाँ सदियों से लोग अपनी समस्याओं का समाधान सामूहिक चर्चा और आपसी सहमति से करते आ रहे हैं। राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस, जो प्रतिवर्ष 24 अप्रैल को मनाया जाता है, वास्तव में उसी प्राचीन परंपरा को आधुनिक संवैधानिक ढांचे में स्वीकार करने का एक उत्सव है। यह केवल एक तिथि नहीं है, बल्कि उस संकल्प की पुनरावृत्ति है जो सत्ता को बड़े नगरों की अट्टालिकाओं से निकालकर खेत खलिहानों तक पहुँचाने के लिए लिया गया था। भारतीय शासन व्यवस्था का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी स्थानीय शासन को महत्व दिया गया, समाज में सुख, समृद्धि और न्याय का संचार हुआ।
ऋग्वेद जैसे प्राचीन ग्रंथों में सभा और समिति का वर्णन मिलता है, जो इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में जनभागीदारी हमारे संस्कारों में समाहित है। चोल साम्राज्य के शासनकाल में भी स्थानीय स्वशासन के ऐसे उत्कृष्ट उदाहरण मिलते हैं, जिन्हें आज भी प्रशासनिक विज्ञान के विद्वान अध्ययन का विषय मानते हैं। मध्यकाल और विशेष रूप से औपनिवेशिक काल के दौरान यद्यपि इन संस्थाओं को आघात पहुँचा, परंतु इनकी मूल चेतना कभी समाप्त नहीं हुई। स्वतंत्रता के पश्चात राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बार बार इस बात पर बल दिया कि वास्तविक स्वतंत्रता तभी आएगी जब भारत का प्रत्येक गाँव एक आत्मनिर्भर गणराज्य होगा। उनके अनुसार, दिल्ली में बैठकर लिया गया निर्णय पूरे देश की नियति नहीं बदल सकता, जब तक कि गाँवों के लोग स्वयं अपने विकास के मार्गदर्शक न बनें।
संविधान सभा में इस विषय पर गहन वैचारिक विमर्श हुआ और अंततः अनुच्छेद 40 के अंतर्गत राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में पंचायतों के गठन का प्रावधान किया गया। प्रारंभ में यह केवल राज्यों की इच्छा पर निर्भर था, परंतु समय की माँग को देखते हुए इसमें व्यापक सुधारों की आवश्यकता अनुभव की गई। 1957 में बलवंत राय मेहता समिति ने त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का सुझाव दिया, जिसे सर्वप्रथम 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में लागू किया गया। इसके उपरांत अशोक मेहता समिति, 1977, जी.वी.के. राव समिति, 1985 और एल.एम. सिंघवी समिति, 1986 जैसी विभिन्न समितियों ने इस व्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक और प्रभावशाली बनाने के लिए अपने महत्वपूर्ण परामर्श दिए।
सिंघवी समिति की सिफारिशों का ही परिणाम था कि पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने की मांग दृढ़ता से उठाई गई। अंततः वर्ष 1992 में भारतीय संसद द्वारा 73वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया, जो 24 अप्रैल 1993 से पूर्णतः प्रभावी हुआ। इस ऐतिहासिक कदम ने भारतीय प्रजातंत्र के स्वरूप को मौलिक रूप से बदल दिया। अब पंचायतें केवल प्रशासनिक इकाइयाँ नहीं रह गईं, बल्कि वे संवैधानिक शक्ति से संपन्न स्वायत्त संस्थाएं बन गईं। संविधान के भाग 9 में अनुच्छेद 243 से 243-ण तक के प्रावधान जोड़े गए और 11वीं अनुसूची के माध्यम से पंचायतों को 29 महत्वपूर्ण विषयों पर कार्य करने का पूर्ण अधिकार दिया गया। इनमें कृषि, भूमि सुधार, लघु सिंचाई, पशुपालन, मत्स्य पालन, ग्रामीण आवास, पेयजल, सड़कें, पुल, ग्रामीण विद्युतीकरण, शिक्षा, सांस्कृतिक गतिविधियाँ और स्वास्थ्य जैसे विषय सम्मिलित हैं, जो ग्रामीण जीवन के विकास के मुख्य स्तंभ हैं।
पंचायती राज व्यवस्था की संरचना अत्यंत वैज्ञानिक है। इसके सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायत होती है, जहाँ ग्राम सभा की भूमिका अत्यंत निर्णायक होती है। ग्राम सभा लोकतंत्र का सबसे जीवंत रूप है, जहाँ गाँव का प्रत्येक मतदाता प्रत्यक्ष रूप से अपनी राय रख सकता है। मध्यवर्ती स्तर पर क्षेत्र पंचायत या पंचायत समिति होती है, जो विभिन्न ग्राम पंचायतों के मध्य समन्वय स्थापित करती है। शीर्ष स्तर पर जिला परिषद होती है, जो जिले के समग्र विकास की रूपरेखा तैयार करती है और प्रशासनिक सहायता प्रदान करती है। इस त्रि-स्तरीय व्यवस्था ने शासन को जवाबदेह और पारदर्शी बनाने का कार्य किया है।
इस प्रणाली की एक और क्रांतिकारी विशेषता सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करना है। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की व्यवस्था की गई है। सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था, जिसे अब भारत के 21 राज्यों ने बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है। आज देश के 30 लाख से अधिक निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों में से लगभग 14 लाख महिलाएं हैं। यह सामाजिक सशक्तिकरण का ऐसा अनुपम उदाहरण है जिसने ग्रामीण भारत की आधी आबादी को नेतृत्व के अवसर प्रदान किए हैं। अब गाँव की महिलाएं केवल घरेलू कार्यों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे विद्यालय निर्माण, स्वच्छता अभियान और जल संरक्षण जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं का सफल संचालन कर रही हैं।
विकास के दृष्टिकोण से देखें तो पंचायतों ने ग्रामीण बुनियादी ढांचे के सुधार में अभूतपूर्व भूमिका निभाई है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम जैसी विशाल योजनाओं का क्रियान्वयन पंचायतों के माध्यम से ही संभव हो सका है। स्थानीय स्तर पर संसाधनों का उचित प्रबंधन और लाभार्थियों की सही पहचान करने में पंचायतें जितनी सक्षम हैं, उतनी कोई और संस्था नहीं हो सकती। पेयजल के लिए 'हर घर जल' अभियान हो या खुले में शौच से मुक्ति का संकल्प, पंचायतों ने इन राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी है।
वर्तमान में सूचना और संचार के आधुनिक युग में पंचायतों को तकनीकी रूप से भी सुदृढ़ किया जा रहा है। ई-ग्राम स्वराज जैसे मंचों के माध्यम से पंचायतों के लेखा जोखा और विकास कार्यों को सार्वजनिक किया जा रहा है, जिससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है और जनता का विश्वास इन संस्थाओं के प्रति बढ़ा है। पंचायतों को मिलने वाले केंद्रीय और राज्य वित्त आयोग के अनुदानों ने उन्हें आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर बनाया है, यद्यपि अभी भी स्वयं के राजस्व स्रोत विकसित करने की चुनौती बनी हुई है।
परंतु इस यात्रा में अनेक बाधाएं और चुनौतियां भी विद्यमान हैं। आज भी कई स्थानों पर निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके परिवार के पुरुषों का हस्तक्षेप देखा जाता है, जिसे 'सरपंच पति' संस्कृति कहा जाता है। इसे दूर करने के लिए निरंतर प्रशिक्षण और जागरूकता की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, कई राज्यों में अभी भी पंचायतों को वे सभी 29 विषय और शक्तियाँ हस्तांतरित नहीं की गई हैं, जिनका वर्णन संविधान की 11वीं अनुसूची में है। पंचायतों के पास अपने कर्मचारी और तकनीकी विशेषज्ञों की कमी भी एक बड़ी समस्या है।
वित्तीय स्वायत्तता का अभाव उन्हें राज्य और केंद्र सरकार के अनुदानों पर निर्भर बनाए रखता है, जिससे उनके स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है। शिक्षा की कमी और स्थानीय स्तर पर जातिगत समीकरण भी कई बार विकास कार्यों के मार्ग में रोड़ा बनते हैं। इन विसंगतियों को दूर करने के लिए पंचायतों को सशक्त बनाना अनिवार्य है। उन्हें न केवल वित्तीय अधिकार दिए जाने चाहिए, बल्कि उनके प्रशासनिक ढांचे को भी आधुनिक और कुशल बनाना होगा।
राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के अवसर पर प्रतिवर्ष भारत सरकार द्वारा उत्कृष्ट कार्य करने वाली पंचायतों को दीनदयाल उपाध्याय पंचायत सतत विकास पुरस्कार और नानाजी देशमुख सर्वोत्तम पंचायत सतत विकास पुरस्कार जैसे सम्मानों से विभूषित किया जाता है। यह पुरस्कार पंचायतों के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म देते हैं और उन्हें बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करते हैं। पंचायतों के माध्यम से ही हम सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
जब तक हमारे गाँव गरीबी मुक्त, स्वस्थ, जल समृद्ध और स्वच्छ नहीं होंगे, तब तक विकसित भारत का सपना साकार नहीं हो सकता। गाँव का विकास ही राष्ट्र का विकास है, क्योंकि जब गाँव की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, तो उसका प्रभाव संपूर्ण देश के सकल घरेलू उत्पाद पर पड़ता है। ग्रामीण पर्यटन, स्थानीय हस्तशिल्प और कृषि आधारित लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर हम गाँवों से शहरों की ओर होने वाले पलायन को भी रोक सकते हैं।
निष्कर्षतः, पंचायती राज व्यवस्था भारतीय लोकतंत्र की धमनियों में बहने वाला वह रक्त है जो इसे जीवंत बनाए रखता है। यह केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि यह जनता के हाथों में अपने भाग्य के निर्माण की शक्ति है। 73वें संविधान संशोधन ने जो बीज बोया था, वह आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। यद्यपि अभी हमें एक लंबी दूरी तय करनी है, परंतु जिस दिशा में हम बढ़ रहे हैं, वह निश्चित रूप से ग्राम स्वराज्य की प्राप्ति की ओर ले जाती है। लोकतंत्र की सफलता इस बात में नहीं है कि संसद में कितनी चर्चा होती है, बल्कि इस बात में है कि एक छोटे से गाँव की ग्राम सभा में बैठा हुआ अंतिम व्यक्ति कितनी निर्भीकता से अपनी बात कह पाता है।
राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस हमें इसी उत्तरदायित्व की याद दिलाता है। हमें सामूहिक रूप से संकल्प लेना होगा कि हम अपनी पंचायतों को और अधिक पारदर्शी, सशक्त और साधन संपन्न बनाएंगे। यदि हमारी पंचायतें समर्थ होंगी, तो हमारा लोकतंत्र अभेद्य होगा और भारत पुनः विश्व के सामने एक आदर्श शासन व्यवस्था का उदाहरण प्रस्तुत कर सकेगा। गाँवों की आत्मनिर्भरता ही हमारे गौरवशाली भविष्य की आधारशिला है और इसी मार्ग पर चलकर हम उस भारत का निर्माण कर पाएंगे जहाँ न्याय, समता और बंधुत्व के मूल्य प्रत्येक नागरिक के जीवन में प्रतिबिंबित होंगे। 24 अप्रैल की यह पावन तिथि हमें अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने और ग्रामीण भारत के उत्थान के लिए निरंतर कार्य करने की प्रेरणा देती है। यही इस दिवस की सार्थकता है और यही हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों की विजय भी है।
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