पंचायती राज दिवस

साधारण जन से असाधारण शासन तक: पंचायती राज की नई परिभाषा

जब गाँव की धूल भरी पगडंडी पर बैठा किसान निडर होकर अपनी बात रखता है और उसी स्वर से विकास की दिशा आकार लेने लगती है, तब लोकतंत्र अपनी सबसे जीवंत और वास्तविक पहचान में सामने आता है। 24...
संपादकीय  स्वतंत्र विचार 

लोकतंत्र का आधार: सशक्त ग्राम पंचायतें

महेन्द्र तिवारी     भारत जैसे विशाल और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राष्ट्र की आत्मा उसके गाँवों में बसती है। यदि हम भारतीय लोकतंत्र के वृक्ष की कल्पना करें, तो इसकी जड़ें उन छोटी छोटी बस्तियों और गाँवों में हैं, जहाँ सदियों...
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