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भारत में कैंसर से त्राहिमाम हो रहा बचपन
खसरा, टीबी और एचआईवी एड्स जैसी बीमारियों से भी ज्यादा जान ले रही है
मनोज कुमार अग्रवाल
भारत में कैंसर से जीवन गंवाने वाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है इनमे भी बच्चों की तादाद सबसे ज्यादा है। तमाम कोशिश नाकाम बन रही है वहीं बच्चों के लिए कैंसर की बीमारी बेहद घातक बन रही है। दुनिया भर में बच्चों में कैंसर एक गंभीर और बढ़ती हुई चिंता बनता जा रहा है, लेकिन सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इसके ज्यादातर मामले और मौतें गरीब और मध्यम आय वाले देशों में हो रही हैं. द लैंसेट में पब्लिश ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज 2023 स्टडी ने इस असमानता को लेकर कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं. रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में दुनिया भर में बच्चों में कैंसर के लगभग 3.77 लाख नए मामले सामने आए, जबकि करीब 1.44 लाख बच्चों की मौत हो गई, यह बीमारी बच्चों में मौत के प्रमुख कारणों में शामिल हो चुकी है और खसरा, टीबी और एचआईवी एड्स जैसी बीमारियों से भी ज्यादा जान ले रही है।
आपको बता दें कि दुनिया कितनी भी तरक्की कर ले, लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं का अंतर आज भी मासूमों की जान ले रहा है। चिकित्सा जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका 'लैंसेट' की एक ताजा रिपोर्ट ने वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था की कलई खोल दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, बचपन में होने वाले कैंसर (कर्क रोग) के 85 प्रतिशत नए मामले कम और मध्यम आय वाले देशों में सामने आ रहे हैं, लेकिन डराने वाली बात यह है कि इन देशों में मौतों का आंकड़ा कुल वैश्विक मौतों का 94 प्रतिशत है। यानी संसाधनों के अभाव में गरीब देशों के बच्चे इलाज मिलने से पहले ही दम तोड़ रहे हैं।
दक्षिण एशिया इस संकट का बड़ा केंद्र बना हुआ है, जहां दुनिया के कुल चाइल्डहुड कैंसर से होने वाली मौतों का लगभग 20.5 प्रतिशत हिस्सा दर्ज किया गया. इसके अलावा, 1990 से 2023 के बीच इन मौतों में करीब 16.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी देखी गई है. हालांकि एक पॉजिटिव पहलू यह भी है कि वैश्विक स्तर पर मौतों में कुछ कमी आई है, लेकिन इसका लाभ सभी देशों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है. उच्च आय वाले देशों में इलाज बेहतर होने से बच्चों के बचने की संभावना ज्यादा है, जबकि गरीब देशों में समय पर जांच और इलाज की कमी बड़ी बाधा बन रही है.
इस स्टडी की प्रमुख लेखक लिसा फोर्स कहती हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं की असमानता के कारण ही यह अंतर पैदा हो रहा है. देर से डायग्नोसिस, जरूरी इलाज की कमी और स्वास्थ्य प्रणाली की कमजोरियां बच्चों की जान जोखिम में डाल रही हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चाइल्डहुड कैंसर के 85 प्रतिशत नए मामले और 94 प्रतिशत मौतें इन्हीं लो और मिडिल इनकम देशों में होती हैं. इसके अलावा डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर्स का भी 94 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं देशों में दर्ज किया गया, जो यह दिखाता है कि बीमारी का असर सिर्फ मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की जिंदगी की क्वालिटी पर भी पड़ता है.
हाल ही में आइ ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीजेज' रिपोर्ट के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि साल 2023 में दुनिया भर में बचपन में कैंसर के 3,77,000 नए मामले आए, जिनमें से 1,44,000 बच्चों की मौत हो गई। यह बीमारी आज वैश्विक स्तर पर बच्चों की जान लेने वाला आठवां सबसे बड़ा कारण बन चुकी है। आपको हैरत होगा कि मौतों के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है। 2023 में बच्चों की मौतों का वैश्विक आंकड़े के मुताबिक सबसे ज्यादा भारत 17,000 मौतें चीन 16,000 मौतें नाइजीरिया में 9,000 मौतेंपाकिस्तान मे 9,000 मौतें हुई है। अध्ययन में एक हैरान करने वाला तथ्य सामने आया है। 1990 के मुकाबले वैश्विक स्तर पर बच्चों में कैंसर से होने वाली मौतों में 27 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।इस वैश्विक रिपोर्ट में एक सकारात्मक पहलू भी है। 1990 में बचपन के कैंसर से लगभग 1.97 लाख मौतें हुई थीं।
तब से लेकर अब तक दुनिया भर में मौतों के इस आंकड़े में 27 प्रतिशत की कमी आई है, लेकिन एक बड़ी चिंता यह भी है कि जहां पूरी दुनिया में मौतों का ग्राफ नीचे गिरा है, वहीं अफ्रीका में इसमें 55.6 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विश्लेषण कहता है कि यह सुधार समान नहीं है। जहां विकसित देशों में बेहतर तकनीक से बच्चों को बचाया जा रहा है, वहीं अफ्रीका में संसाधनों की भारी कमी के चलते कैंसर से होने वाली मौतों में 55.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। संसाधनों की कमी वाले इलाकों में बचपन का कैंसर अब बच्चों की मौत का आठवां सबसे बड़ा कारण बन चुका है।
रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों में कैंसर से होने वाली मौतों के पीछे मुख्य रूप से तीन प्रकार के कैंसर जिम्मेदार पाए गए हैं। ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) यह सबसे घातक साबित हुआ, जिससे दुनिया भर में 45,900 बच्चों की मौत हुई।दूसरा मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र इस कैंसर की वजह से 23,200 मासूमों ने जान गंवाई।तीसरा नॉन हॉजकिन लिंफोमा लसीका तंत्र के इस कैंसर से 15,200 मौतें दर्ज की गईं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह रिपोर्ट केवल आंकड़े नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। भारत जैसे देशों में, जो निम्न-मध्यम आय वर्ग में आते हैं, कैंसर मौतों में बचपन के कैंसर का योगदान 11वें स्थान पर है। इसका सीधा मतलब है कि अगर इन देशों में समय पर जांच (अर्ली डायग्नोसिस) और बुनियादी उपचार की सुविधाएं सुधारी जाएं, तो हजारों बच्चों को मौत के मुंह से निकाला जा सकता है। फिलहाल, संसाधनों की सीमित उपलब्धता ही इन मासूमों के जीवन और मृत्यु के बीच की सबसे बड़ी दीवार बनी हुई है।
भारत में कैंसर के बढ़ते मामलों के पीछे जागरूकता और सख्त नियमन की कमी तथा हर स्तर पर बरती जा रही अनदेखी जिम्मेदार है। सामान्यत: एक भारतीय जो भोजन ग्रहण करता है, उसकी सटीक जांच की न तो कोई फिक्र है और न ही कोई ऐसी व्यवस्था उसके आसपास मौजूद है, जिससे वह आसानी से भोजन में छिपे जहर की पड़ताल कर सके।हाल में बंगलुरु स्थित ‘गट-हेल्थ स्टार्टअप माइक्रोबायोटीएक्स’ के कराए गए शोध में सामने आया है। देश के नौ राज्यों और 14 शहरों के 200 शहरी भारतीयों के रक्त नमूनों के विश्लेषण में पाया गया कि 78 फीसद लोग कीटनाशक अवशेषों के संपर्क में हैं।
इस अध्ययन में शामिल लोगों में से 36 फीसद में तीन या अधिक कीटनाशकों का मिश्रित असर देखा गया, जो गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों की ओर संकेत करता है। विषाक्त पदार्थ भूजल और वायु प्रदूषण के रास्ते शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। जांच के बाद आई रपट में कहा गया है कि 54 फीसद नमूनों में एंटीबायोटिक्स और 39 फीसद में स्टेरायड पाए गए। यह हार्मोन के असंतुलन और कैंसर जोखिम बढ़ा सकता है। किसानों को इस बारे में जानकारी नहीं दी गई है कि किसी फसल पर कितनी मात्रा में कीटनाशकों का छिड़काव किया जाना चाहिए।
विशेषज्ञ कहते हैं कि अनाजों और फल-सब्जियों में यह मात्रा इतनी रहनी चाहिए कि मनुष्यों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर न पड़े। इस तरह से ‘एमआरएल’ कीटनाशकों के अंधाधुंध और गलत प्रयोग पर बंदिश लगाने वाली पहली शर्त है, लेकिन सिर्फ मुनाफा कमाने के लिए तमाम फलों को कार्बेट से पकाया जा रहा है यहां तक कि देश में बिकने वाले काॅल्ड ड्रिंक और ब्रेड में भी खतरनाक स्तर तक रसायन का इस्तेमाल धडल्ले से किया जा रहा है ऐसे हालात में भारत में कैंसर की महामारी का बढ़ता खतरा नियंत्रित करना संभव नहीं है। सरकार और आमजन सभी को जागरूक होना होगा।
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