माघ मेले में ‘शंकराचार्य’ बनाम प्रशासन: आस्था, कानून और सत्ता के टकराव 

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस, संत समाज उग्र—अखिलेश यादव बोले: यह सनातन धर्म का अपमान है

माघ मेले में ‘शंकराचार्य’ बनाम प्रशासन: आस्था, कानून और सत्ता के टकराव 

ब्यूरो प्रयागराज। मौनी अमावस्या स्नान पर्व के दौरान प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच हुआ टकराव अब केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह आस्था, परंपरा, कानून और राजनीति के बड़े संघर्ष का रूप ले चुका है। शंकराचार्य पिछले कई दिनों से धरने पर बैठे हैं, जबकि मेला प्रशासन ने उन्हें नोटिस जारी कर 24 घंटे में यह स्पष्ट करने को कहा है कि वे स्वयं को ‘शंकराचार्य’ कैसे घोषित कर रहे हैं।
 
इस विवाद में अब किन्नर अखाड़े की जगद्गुरु हिमांगी सखी भी खुलकर शंकराचार्य के समर्थन में सामने आ गई हैं। उन्होंने कहा कि प्रयागराज की घटना से देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सनातन धर्म को लेकर गलत संदेश गया है। उन्होंने प्रशासन से सार्वजनिक रूप से माफी की मांग करते हुए कहा कि शंकराचार्य जैसे पद पर आसीन संत के साथ किया गया व्यवहार करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को आहत करता है। विवाद पर राजनीति भी गरमा गई है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मेला प्रशासन और प्रदेश सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि “शंकराचार्य और साधु-संत हमारी संस्कृति की शोभा हैं। उनसे प्रमाण पत्र मांगना सनातन धर्म का अपमान है।”
 
अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि जो बीजेपी के हिसाब से नहीं चलता, उसे नोटिस दिया जाता है और असहमति जताने पर ईडी-सीबीआई का डर दिखाया जाता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की मांग भी की।प्रशासन का पक्ष है कि मौनी अमावस्या के दिन भारी भीड़ के कारण कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्राथमिकता ।
 
 प्रशासन का सवाल है कि यदि कोई बड़ा हादसा हो जाता तो जिम्मेदारी किसकी होती? विवाद की जड़ में शंकराचार्य पद की वैधता भी आ गई है। अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने ज्योतिषपीठ शंकराचार्य पद से जुड़े विवाद में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक पर अंतरिम रोक लगाई थी। अदालत ने कहा था कि जब तक पूर्व शंकराचार्यों से जुड़ा लंबित विवाद पूरी तरह सुलझ नहीं जाता, नई नियुक्ति को अंतिम नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर मेला प्रशासन ने नोटिस जारी किया है।
 
हालांकि शंकराचार्य के वकील पीएन मिश्रा का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहीं भी यह नहीं कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद ‘शंकराचार्य’ पद का प्रयोग नहीं कर सकते। उनका आरोप है कि प्रशासन का नोटिस न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप है, जिस पर अवमानना की कार्रवाई हो सकती है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद संत समाज दो धड़ों में बंटा दिखाई दे रहा है। एक पक्ष इसे संतों के सम्मान और सनातन परंपरा पर हमला बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष शंकराचार्य पद की परंपरागत प्रक्रिया और कानूनी वैधता पर सवाल उठा रहा है। माघ मेले की एक घटना अब राष्ट्रीय बहस बन चुकी है—जहाँ सवाल सिर्फ स्नान या नोटिस का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि धर्म की मर्यादा तय करेगा कौन—परंपरा, कानून या सत्ता। 
 
दूसरी ओर प्रशासन के नोटिस का जवाब 8 पेज में दे दिया गया है।जो अंग्रेजी में है।स्वामी अविमुक्तेश्वर नंद जी ने कहा  है कि सुप्रीम कोर्ट की आड़ लेकर प्रशासन बच नहीं सकता है।शंकराचार्य ने कहा है कि शंकराचार्य के पद को क्या मुख्य मंत्री और प्रधान मंत्री तय करेंगे। यहां तक इस धार्मिक मसले का निपटारा राष्ट्र पति भी नहीं कर सकती।
 
कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा है कि संत महात्माओं पर इतना बड़ा अत्याचार तो अंग्रेजो और मुगलों के शासन में भी नहीं हुआ कांग्रेस के शासनम तो लेकिन धर्मक सबसे बड़े अलमदार योगी आदित्यनाथन वह भी कर दिखाया जो इतिहास में कभी नहीं हुआ इससे बड़ा पाप कोईसकताहीनहीं सकता।
 
सिद्ध संत श्री कालिदास महाराज ने कहा है कि शंकराचार्य जी को इज्जत और सम्मान के साथ स्नाकरने की इजाजत मिलनी चाहिए थी जिसको ना देकर प्रशासन ने धार्मिक मर्यादाका अपमान किया है ।उन्होंने कहा कि वेद पाठी बह्मणकी छोटी पकड़ कर घसीटना मारना पीटना  बहुत बड़ा पाप हुआ है इस पर प्रशासन को प्रायश्चित करना चाहिए और मुख्यमंत्री को कार्रवाई करना चाहिए।
 
 दया शंकर त्रिपाठी

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