धमकी भरी चाय और टूटता पत्रकारिता का मनोबल: अश्विनी श्रीवास्तव 

धमकी भरी चाय और टूटता पत्रकारिता का मनोबल: अश्विनी श्रीवास्तव 

चित्रकूट। जब किसी थाने का प्रभारी स्वयं फोन करके एक पत्रकार को थाने बुलाता है और मधुर स्वर में कहता है—“पत्रकार साहब, आपके जो दुश्मन हैं, वो मेरे दोस्त हैं। खबर का प्रकाशन करने से पहले एक बार पूछ लिया कीजिए, कहीं ऐसा न हो जाए कि आपके खिलाफ मुकदमा लिखना पड़े”—तो यह केवल एक संवाद नहीं रहता, यह पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सीधा दबाव बन जाता है।
 
आगे जब वही अधिकारी यह भी जोड़ देता है कि “मैं डीआईजी और एसपी को कुछ नहीं भजता, तुम जैसे पत्रकार हजार-पंद्रह सौ में बिकते हैं। मैंने जिले में छोटे से बड़े तक 25 जजों को पचासों हजार का ‘चाय-पानी’ कराया है, इसलिए मुझसे सावधान रहिए”—तो यह कथन केवल धमकी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है। ऐसे शब्द एक पत्रकार के आत्मसम्मान, निष्पक्षता और निर्भीकता को तोड़ने के लिए पर्याप्त होते हैं।
 
पत्रकार का मनोबल वहीं टूट जाता है। वह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि सच लिखने की कीमत कहीं बहुत भारी तो नहीं। कानून, व्यवस्था और न्याय की बात करने वाले जब स्वयं भय का वातावरण बना दें, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कैसे मजबूत रह पाएगा?
 
विडंबना यह है कि इसी धमकी के बाद वही दरोगा चाय पिलाता है, सम्मान दिखाता है, मानो सब कुछ सामान्य हो। सवाल यह नहीं कि चाय पिलाई गई—सवाल यह है कि वह चाय किस भावना से पिलाई गई। क्या वह सम्मान की चाय थी या चेतावनी की? क्या वह संवाद था या दबाव का आवरण?
 
पत्रकारिता कोई सौदेबाज़ी नहीं है। यह समाज के प्रति उत्तरदायित्व है। जब खबरें रिश्तों और रसूख के तराजू पर तौली जाने लगें, तब सच का दम घुटने लगता है। ऐसी “धमकी भरी चाय” न केवल एक पत्रकार को कमजोर करती है, बल्कि पूरे समाज के सूचना के अधिकार को चोट पहुंचाती है।
 
आज आवश्यकता है कि सत्ता, पुलिस और प्रशासन यह समझें कि पत्रकार का काम सवाल पूछना है, अनुमति लेना नहीं। और पत्रकारों को भी यह याद रखना होगा कि डर के आगे झुकना सच के साथ विश्वासघात है।

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