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भारतीय नवसंवत्सर : युगधर्म का उद्घोष बने
भारत में चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा तिथि (युगादि तिथि) से हिंदू नव वर्ष की अर्थात विक्रम संवत की शुरुआत होती है। इस वर्ष यह पावन दिन(सवंत 2082 का प्रथम दिवस) भारत में सरकारी कामकाज के लिए स्वीकृत ग्रेग्ररियन कैलेंडर जिसे हम अंग्रेज़ी/ईसाई कैलेंडर भी कहते हैं के अनुसार 30 मार्च,2025 को आ रहा है। शासन स्तर पर अंग्रेजी कैलेंडर के प्रचलन में होने के बाबजूद भारत अपनी धार्मिक, सामाजिक तथा अन्य सांस्कृतिक परंपराओं के निर्वहन के लिए भारतीय कैलेंडर को सदियों से महत्व देता रहा है।
भारत की ही तरह कुछ और देश भी है जो पूरी तरह ग्रेग्रेरियन कैलेंडर को नहीं मानते हैं तथा धार्मिक आदि कारणों से अपने देश के कैलेंडर को भी महत्व देते हैं जैसे ईरान, अफगानिस्तान (हिजरी कैलेंडर), इथियोपिया (इथियोपियन कैलेंडर), नेपाल (विक्रम संवत),सऊदी अरब (इस्लामिक हिजरी कैलेंडर), चीन (चीनी चंद्र कैलेंडर), भारत (विक्रम संवत), इजरायल (हिब्रू कैलेंडर) आदि।
हिन्दूओं द्वारा नव संवत्सर के प्रथम दिवस को नव वर्ष की शुरुआत के रूप में मान्यता देने के पीछे कई ठोस सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक तथा अध्यात्मिक कारण है।ऐसी मान्यता है कि इस तिथि पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना आरंभ की थी(ब्रह्मपुराण) तथा कालगणना (समय-गणना) प्रारंभ की थी। इसी तिथि पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम तथा धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ था ,इसी तिथि से सतयुग आरंभ हुआ था, इसी तिथि से चैत्र नवरात्र(देवी अराधना का पर्व) आरंभ होती है तथा इसी दिन 1875 को जागरूकता और पुनर्जागरण के प्रतीक आर्य समाज की स्थापना हुई।
भारतीयों के लिए नवसंवत्सर इस लिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसकी शुरुआत न्याय के प्रतीक महाराजा विक्रमादित्य ने की थी जो वैदिक ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित है तथा प्राकृतिक चक्रों के अनुरूप है।वैज्ञानिक और खगोलीय दृष्टिकोण से नव संवत्सर के प्रथम दिवस पर सूर्य संक्रांति काल में होता है, चंद्रमा शुक्ल पक्ष में होता है तथा वसंत विषुव के निकट होती है अथार्त सूर्य और चंद्रमा दोनों उच्च ऊर्जा में होते हैं। प्रकृति नया चक्र शुरू कर रही होती है मसलन पेड़-पौधे नई कोंपलों को जन्म दे रहे होते हैं, फसलें पक चुकी होती हैं या पकने की स्थिति में होती हैं, और मौसम का मिजाज बदल रहा होता है।
यह तिथि इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यह लगभग संपूर्ण भारत में भारतीय नववर्ष के प्रथम दिवस के रूप में स्वीकार है, और अधिकांश भारतीय भी उसी रूप में इसका पूरे हर्ष और उल्लास से स्वागत करते हैं जैसे महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश आदि गुड़ी पड़वा के रूप में,आंध्र प्रदेश और कर्नाटक उगादि के रूप में तथा राजस्थान थापना के रूप में। वहीं सिंधी समाज इस तिथि को चेती चाँद के रूप में तथा कश्मीरी पंडितों द्वारा इस तिथि को नवरेह के रूप में मनाया जाता है।
एक विचार आता है कि अंग्रेजी कैलेंडर तथा इसकी 1 जनवरी को नववर्ष के प्रथम दिवस के रूप में वैश्विक मान्यता प्राप्त है। भारत में भी अंग्रजों के शासनकाल से ही इस कलैंडर को सरकारी व निजी संस्थानों द्वारा व्यवहार में लाया जा रहा है, तथा इसकी एक जनवरी को नए साल की शुरुआती दिन के रूप में स्वीकारा जाता है। यह धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्रीय भेदभाव से परे भी दिखाई देता है।जनता के मन में भी इसी कैलेंडर की तिथियां और माह रच-बस गए हैं, तथा अधिकांश जनता मन से या बेमन से या फिर मजबूरी बस जन्म,मरण, शादी की तिथि, नोकरी में आने की तिथि, नोकरी से सेवा निवृत्त होने की तिथि,पदोन्नति की तिथि, न्यायालय में केस दर्ज करने तथा केस मुक्त होने की तिथि,गृह प्रवेश तिथि, बेटा-बेटी के जन्म तथा विवाह की तिथि, स्कूल आदि में प्रवेश की तिथि आदि सभी महत्वपूर्ण कार्यों की तिथियों को याद रखने के लिए अंग्रेजी कैलेंडर पर निर्भर है तो फिर हिन्दू कैलेंडर (विक्रम संवत्सर) की चर्चा करना, उसके माह और तिथियों को स्मरण करना तथा उसके प्रथम दिवस को अंग्रेजी कलैंडर के नववर्ष के प्रथम दिन की तुलना में अधिक महत्व देने का क्या औचित्य है?
मेरा ऐसा मानना है कि हम भारतीयों को खुले मन से यह विचार करना होगा कि क्या अंग्रेजी नव वर्ष (1 जनवरी) पूरी तरह से पश्चिमी अवधारणा का प्रतीक नहीं है?, क्या यह हम भारतीयों को अपनी संस्कृति से दूर नहीं करता? क्या ऐसा करने से भारतीय परंपराएं और संस्कृति धीरे-धीरे कमज़ोर नहीं होती? क्या इसका कोई धार्मिक, प्राकृतिक, आध्यात्मिक आधार है? क्या इसके मनाने के तौर-तरीकों समाज में कृत्रिमता,अनैतिक गतिविधियाँ, उपभोक्तावाद को बढ़ावा नहीं देते?वहीं हमें इन प्रश्नों के उत्तर भी निष्पक्ष रूप से अपने आप से पूछना होगा कि क्या हमें प्रकृति, धर्म, संस्कृति, और परंपराओं से जुड़े तथा हिन्दू (हिन्दुस्तान) कैलेंडर को महत्व देते हुए नववर्ष के प्रथम दिवस ‘गुड़ी पड़वा’को हर्ष और उल्लास से नहीं मनाना चाहिए?, क्या भारतीयों को अपनी संस्कृति की रक्षा और पहचान को बनाए रखने के लिए जाति, धर्म, राज्य से ऊपर उठकर नव संवत्सर को अधिक महत्व नहीं देना नहीं चाहिए?
मेरा ऐसा मानना है कि हमें अंग्रेजी कैलेंडर तथा हिन्दू कैलेंडर के नववर्ष शुरुआत की तुलनात्मक विवेचना कर के भी देखना चाहिए। यदि हम ऐसा करते हैं तो पाते हैं कि नव संवत्सर का प्रथम दिवस हमारी अपनी परंपराओं, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा है, जबकि अंग्रेजी कैलेंडर की 1 जनवरी पश्चिमी परंपरा का हिस्सा है, औपनिवेशिक मानसिकता तथा सांस्कृतिक गुलामी का प्रतीक है।1 जनवरी सिर्फ एक औपचारिक तिथि परिवर्तन है, जबकि नव संवत्सर की गुड़ी पड़वा वास्तव में एक नव वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है।
नव संवत्सर की गुड़ी पड़वा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को आती है, इसके विपरीत 1 जनवरी का कोई विशेष खगोलीय या प्राकृतिक महत्व नहीं होता; यह सिर्फ ग्रेगोरियन कैलेंडर का पहला दिन है, जिसे यूरोप में ईसाई धर्म के विस्तार के साथ अपनाया गया।नव संवत्सर धर्म, सत्कर्म, शक्ति और ज्ञान की उपासना का समय है, तथा इसे एक पर्व के रूप में उपवास, हवन और पूजा-पाठ के साथ मनाया जाता है, जो मानसिक शुद्धता और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है।जबकि 1 जनवरी आतिशबाजी, पश्चिम रंग में ढली पार्टी, मौज मस्ती और दिखावे का माध्यम बन चुका है।
हिंदू नव वर्ष (नव संवत्सर) से नवऋतु (वसंत) का आगमन होता है, जिससे पर्यावरण में भी नयापन आता है। जबकि अंग्रेजी नववर्ष की शुरुआत ऐसी किसी नयेपन की ओर संकेत नहीं करती।हिन्दू नव वर्ष के प्रथम दिवस को सैलिब्रेट करने में हमें संस्कृति, परंपरा,धर्म, अध्यात्म, इतिहास, प्रकृति, विज्ञान, राष्ट्रीय एकता, स्वास्थ्य और सकारात्मकता का संकेत और दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है जबकि अंग्रेजी नववर्ष का इन सबसे कोई लेना देना नहीं है।
मुझे लगता है कि यह संवत्सर यह भी प्रश्न करता है कि क्या तुम्हारी आधुनिकता में संस्कृति का प्राण बसता है? क्या विकास की अट्टालिकाओं में संस्कारों के दीप जलते हैं?या तुम उस पश्चिमी हवा में अपने मूल को ही तज बैठे हो? अतः मेरा सभी भारतवासियों से आग्रह है कि - यह नवसंवत्सर केवल तिथि नहीं,
यह युगधर्म का उद्घोष है। यह तुम्हें पुकारता है— अपने अभ्युदय की ओर, अपने आत्मबोध की ओर,
अपने स्वर को पहचानने की ओर। चेतना के इस प्रभात में अपने पूर्वजों के स्वप्नों को स्वर दो, संस्कृति को अभ्युदय दो, परंपरा को गति दो, और इस नवसंवत्सर को सच्चे अर्थों में नव बनाओ!


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