अधिकारी या यूनियन नेता?

डेप्युटी आरएमओ अंबेडकर नगर द्वारा पिछले 5 महीने में इनसे लगभग 10 बार पत्र जारी कर पूरे मामले पर जवाब मांगा जा चुका है

अधिकारी या यूनियन नेता?

सवाल उठता है कि बोरे का प्रमाण पत्र देते वक्त इन एमओ / एमआई का यूनियन और यूनियन के नेता कहां थे?

स्वतंत्र प्रभात-

सीनियर रिपोर्टर/विपिन शुक्ला


अंबेडकर नगर! एकता में शक्ति होती है लेकिन एकता गलत उद्देश्यों या भ्रष्टाचार के लिए होने लगे तथा शासन द्वारा बनाई गई विधि व्यवस्था भंग होने लगे तो वो ठीक नहीं है। सारे एमओ/एमआई द्वारा प्रमाण पत्र व बिल बनाकर देने के बावजूद जिस प्रकार से विभागीय जांच और मजिस्ट्रेटी जांच को   प्रभावित कर पूरे मामले को लंबा खींच रहें है वो कतई विभाग व विधि व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। 


खाद्य रशद विभाग एक बदनाम विभाग हमेशा से रहा है उसकी बानगी भी कई बार देखने को मिलती रहती है।अंबेडकर नगर के एमओ/एमआई द्वारा जिस प्रकार से यूनियन बनाकर  पूरे जिले को डिस्टर्ब कर मनमानी किया जा रहा है ऐसा शायद ही कभी देखने को मिला हो।

मामला अंबेडकर नगर में एक मिलर के उपयोगी बोरे की पेमेंट से संबंधित है, सारे एमओ/एमआई द्वारा उपयोगी बोरे की पेमेंट पर मलाई खाने को न मिलने की दशा में एसआरओ को यूनियन बना कर चिट्ठी लिखी जाती है कि फर्जी साइन द्वारा बोरे के भुगतान के लिए कुछ मिलरों द्वारा बिल प्रस्तुत हुआ है। जिससे अमिता इंडस्ट्रीज का भुगतान रुक गया था जब इस  पर  शिकायत होने के बाद उपयोगी बोरे के बिल पर फर्जी हस्ताक्षर की मजिस्ट्रेटी जांच के अलावा तमाम जांच बैठी तो ये उस पर ये जवाब देने से लगातार बच रहे हैं। जबकि उसमे इनको सिर्फ़ इतना बताना है कि मौजूदा बिल पर इनके हस्ताक्षर है कि नहीं है।


यहीं नहीं डेप्युटी आरएमओ अंबेडकर नगर द्वारा पिछले 5 महीने में इनसे लगभग 10 बार पत्र जारी कर पूरे मामले पर जवाब मांगा जा चुका है और यही नहीं डेप्युटी आरएमओ द्वारा पूर्व में इसी मामले पर मजबूर होकर इनके खिलाफ़ विभागीय कार्यवाही के लिए भी लिखा गया  लेकिन आरएफसी साहब या विभाग के उच्च अधिकारियों द्वारा कोई कार्यवाही न होने की वजह से अप्रत्यक्ष रूप से सारे एमओ/एमआई का मनोबल बढ़ाने का काम हुआ है।

 

तमाम मीडिया में खबरें भी लगातार चली और चल रहीं है कि मजिस्ट्रेटी जांच काफी सुस्त चल रही है इन सबके बावजूद शासन प्रशासन और खास कर जिले के एमओ/एमआई के कान पर जूं तक नहीं रेंग रहा है। सवाल ये है कि आख़िर जिले और विभाग के उच्च अधिकारी इस पर क्यों मौन साध कर बैठे हैं?

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