लोकराजा शाहू छत्रपति जी महाराज जयंती विशेष

Swatantra Prabhat Desk Picture
Published On

(शाहू महाराज जयंती विशेष)


विकास कुमार एवं डॉ. प्रह्लाद माने 

औपनिवेशिक भारत में भारतीय राजाओं की चेतना का विकास केवल ब्रिटिश हुकूमत के दिखाए गए मार्ग तक ही सीमित था। 19 वीं और 20 वीं शताब्दी की रियासतों के राजाओं में विरोध के स्वर तो निकलते ही नहीं थे अपितु जनकल्याण के कार्य भी नहीं किए जाते थे । परंतु मराठा साम्राज्य के लोकराजा शाहू छत्रपति नें जनकल्याण  के कार्यों में अपनी रुचि दिखाई और समाज में नई चेतना का विकास किया । शाहू जी एक समाज सुधारक ही नहीँ अपितु प्रगतिशील विचार वाले व्यक्तित्व भी थे । वंचित वर्गों की उत्कृष्टता और उत्थान के लिए उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पण कर दिया था । सामाजिक न्याय और वंचितों के शैक्षणिक उन्नयन के लिए उन्होंने जो काम किया उसकी प्रासंगिकता और महत्व न केवल महाराष्ट्र की जनता के लिए है बल्कि सम्पूर्ण भारत के लिए भी  हैं । उन्होंने महात्मा फुले के सत्यशोधक आंदोलन को भी आगे बढ़ाया साथ तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के लिए भी कार्य किया ।

‘लोकराजा शाहू छत्रपति’ पुस्तक का लेखन प्रो. रमेश जाधव के द्वारा किया गया । यह पुस्तक 2012 में प्रकाशित हुई जिसमें शाहू महाराज की विचारधारा और जीवन दर्शन पर सम्यक प्रकाश डाला गया है । यह पुस्तक कुल 25 अध्यायों में विभाजित है जिसमें लेखन प्राथमिक विषयवस्तु और द्वितीयक विषयवस्तु दोनों का संकलन कर एक पुस्तक का आकार दिया है । इसमें लेखक नें अनुभवजन्य और ऐतिहासिक दोनों पद्धतियों को भी सम्यक रूप से प्रयोगित किया है । डॉ जाधव नें शाहू जी महाराज के विषय में एक मानक लेखन किया है जिसकी परिचर्चा अकादमिक जगत और सामान्य लोगों के मध्य भी समानांतर होती रहती है । इस पुस्तक का प्रत्येक अध्याय भाषा की गतिशीलता और प्रवाह से बंधा हुआ है । यह  उनके जीवन के कार्यों और कार्यक्रमों का मूल्यांकन तो प्रस्तुत करती ही है साथ ही समाज नई चेतना के विकास का संचार भी करती है । जब 1707 में मुगल शासक औरंगजेब की मृत्यु हो गई तब मराठा साम्राज्य में राजगद्दी का प्रश्न उठा और आपसी संघर्ष प्रारंभ हुआ। शाहू  महाराज का जन्म 26 जून,1874 को हुआ इनके बचपन का नाम यशवंतराव उर्फ बाबासाहब था । यह दो भाई थे । इनके छोटे भाई का नाम पिराजीराव उर्फ बापूसाहब था । 

नालंदा के शीतला मंदिर की भगदड़ त्रासदी भीड़ प्रबंधन की विफलता और व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न Read More नालंदा के शीतला मंदिर की भगदड़ त्रासदी भीड़ प्रबंधन की विफलता और व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न

इनके पिता का नाम आबासाहब घाटगे था । एवं माता का नाम राधाबाई था । जब कोल्हापुर की गद्दी के उत्तरधिकारी का का सवाल उभर रहा था उसी समय कोल्हापूर की राजमाता सकवार बाई नें घाटगे के पुत्र यशवंतराव को गोद लिया और गोद विधान समारोह 17 मार्च 1884 से 21 मार्च तक मनाया गया । उसी समय कृष्णा जी को उनका शिक्षक नियुक्त किया गया । आगामी शिक्षा के लिए उन्हे बंबई भेजा गया जहाँ उन्होंने मकनाटन महोदय के मार्ग दर्शन में शैक्षणिक कार्य प्रारंभ किया । वह सदैव आम जनमानस से बातचीत करना और उनसे संपर्क करना अधिक पसंद करते थे । यही कारण रहा की उन्होंने आम जनमानस की प्रगति को ही अपने जीवन का आधार बनाया । छत्रपति शाहू महाराज  को एक भारत में सच्चे लोकतान्त्रिक नेता थे जिनका मानना था कि लोकतंत्र लोकमन और लोकमंच का विषय है जिसमें आधे से अधिक आवादी के विकास और सहभागिता किए बिना सुदृढ़ नहीं बनाया जा सकता है ।

भारत के पुनर्जागरण की तथा-कथा,देश की सर्वांगीण प्रगति का मूल राष्ट्रीय जागरण Read More भारत के पुनर्जागरण की तथा-कथा,देश की सर्वांगीण प्रगति का मूल राष्ट्रीय जागरण

 एक सच्चे साम्राज्य की प्रगति तभी संभव है जब शिक्षा का विकास होगा । लोगों में चेतना विकसित होगी ।उनका मानना था की सभी मनुष्य एक समान है और मानवता ही सर्वश्रेष्ठ धर्म  है । प्रारम्भिक दिनों  में वह भी पूजा पाठ करते थे और वर्ण विभाजन में विश्वास भी रखते थे ,परंतु वेदोक्त की घटना के बाद इनसे बचने लगे ,क्योंकि नारायण पुरोहित जो एक बार स्नान के समय पुराणोक्ति मंत्रों का वाचन कर रहे थे जबकि महाराज को लगा की वेदोक्त मंत्रों का वाचन हो रहा है जिसमें उनके मित्र राजाराम ने प्रश्न भी किया तब नारायण पुरोहित ने कहा की वह सिर्फ ब्राह्मणों और क्षत्रयों के लिए होता है आप तो है नहीं। यही कारण रहा की  इन कुरीतियों को दूर करते हुए विभिन्न  क्षेत्रों में कई सुधार  किए इसलिए उन्हे आधुनिक साम आज सुधारक के नाम से भी जाना जाता। वह केवल  कोल्हापुर के इतिहास में नहीं अपितु पूरे वर्ष में एक अमूल्य मणि के रूप में आज भी प्रसिद्ध हैं। छत्रपति साहू महाराज ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने राजा होते हुए भी दलित और शोषित वर्ग के कष्ट को समझा और सदा उनसे निकटता बनाए रखी। उन्होंने दलित वर्ग के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू की थी। 

घर के अदृश्य संविधान में स्त्री का संशोधन Read More घर के अदृश्य संविधान में स्त्री का संशोधन

गरीब छात्रों के छात्रावास स्थापित किये और बाहरी छात्रों को शरण प्रदान करने के आदेश दिए। शाहू  महाराज के शासन के दौरान 'बाल विवाह' पर ईमानदारी से प्रतिबंधित लगाया गया। उन उनका मानना था कि केवल नियम कानून बना देने से शासन प्रणाली संचालित नहीं हो जाती है ,उसे अनुप्रायोगिक करने के लिए स्वयं निरक्षण आवश्यक है । ऐसे महापुरुष के जीवन के बारे में सामान्य जानकारी देना आवश्यक हसी ,क्योंकि किसी भी महापुरुष का जीवन सरल और सहज नहीं होता है । यही कारण है की उनके जीवन से भी प्रेरणा मिलती है । अंग्रेजी शिक्षक और अंग्रेजी  शिक्षा का प्रभाव छत्रपति शाहू महाराज के दिलों-दिमाग पर गहराई से पड़ा था। शाहू जी  वैज्ञानिक सोच को न सिर्फ वे मानते थे बल्कि इसे बढ़ावा देने का हर संभव  प्रयास  करते थे। पुरानी प्रथा, परम्परा  अथवा काल्पनिक बातों को वे महत्त्व नहीं देते थे। उनका  मानना था मानव- मानव में ऊंच-नीच नहीं होता है । सामाजिक संरचना में भी सभी सामअन है इसलिए किसी को किसी से भेदभाव नहीं करना चाहिए । यही कारण रहा कि कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति शाहूजी ने अपने दलित सेवक गंगाराम कांबले की चाय की दुकान खुलने पर वहाँ चाय पीने जाने का फ़ैसला किया, यह उस समय के लिए सहज और सरल नहीं था 

क्योंकि जब जाति प्रथा और धार्मिक उन्माद चरम पर था । उन्होंने आधुनिक समय के आरक्षण की शुरुवात अपने शासन राज्य में उस समय प्रारंभ कर दिया था जब इसके प्रति सरकार और अन्य राजाओं को चेतना भी नहीं थी । उन्होंने महिलावों के लिए आधुनिक शिक्षा प्रणाली से शिक्षित करने की वकालत की । वह मानव धर्म को ही सर्वश्रेष्ठ मानते थे ,उन्होंने अपने राज्य समता मूलक समाज के लिए प्रत्येक नवाचार स्थापित किए । उनका मनाना था कि शिक्षा में केवल पुरुषों का अधिकार नहीं होना चाहिए बल्कि महिलावों को भी बराबर शिक्षा का अवसर मिले जिस राज्य में एक वर्ग अशिक्षित रहेगा वह प्रगतिशील नहीं बन सकता है । शिक्षा की प्रगति के लिए छत्रवासों की व्ययस्था की और प्राथमिक शिक्षा के लिए भरकस परसे किया  किया । यही आधुनिक सोच और आधुनिक नवाचारों के अनुक्रम के उपक्रमों नें इन्हे आधुनिक समाज को विकसित करने वाला प्रमुख शिल्पकार बना दिया । डॉ जाधव की इस पुस्तक की समीक्षा जयंती समारोह के सदर्भ में शाहू महाराज के समस्त कार्यों का मूल्यांकन प्रस्तुत करती हैं । ऐसे सच्चे नायक के जयंती में उन्हें  नमन ।  

 

About The Author

Post Comments

Comments