हिंदी और हिंदुत्व के पुरोधा थे वैदिक जी

हिंदी और हिंदुत्व के पुरोधा थे वैदिक जी

स्वतंत्र प्रभात 
 
वेद पताप वैदिक के आकस्मिक निधन से ऐसा लगा जैसे  अचानक आसमान से कोई तारा टूट कर अनंत में समा गया उनके बारे में देश में लिखने वाले असंख्य हैं ,लेकिन यदि मैं उनके साथ अपनी स्मृतियों को उजागर न करुँ तो मुझे एक अपराध बोध लगातार सताता रहता .मेरे लिए सतत लेखन की प्रेरणा पुंज थे वैदिक जी। वैदिक जी से कोई चार दशक से संपर्क था .मैं उनका न शिष्य था और न भक्त ,लेकिन उनके लेखन और दर्प के साथ हिंदी के लिए काम करने के तरीके का मै प्रशंसक अवश्य था और हमेशा रहूंगा भी।  
 
वे जब भी मिले आत्मीयता और सहजता से मिले ,लेकिन उनके साथ एक भी ऐसी मुलाक़ात नहीं हुई जिसमें हम उनसे जूझे न हों. उनकी तमाम बातों से मेरी असहमति रही .लेकिन वे कमाल के आदमी थे .अपने तर्कों के साथ अंत तक लड़ते थे .पिछले चौबीस घंटों में वैदिक जी के जीवन को लेकर असंख्य संस्मरण  सामने आ चुके हैं .इसलिए उनके बारे में लिखना एक दुस्साहस है, वो भी तब जबकि वे नहीं हैं .बहुत कम लोगों को पता होगा कि एक समय मै ग्वालियर में  जिस अखबार का  में सम्पादक था उसके लिए वैदिक जी नियमित लिखते थे और दिल्ली दफ्तर को अपनी सेवाएं देने के लिए  लगभग उतावले थे .अखबार का मालिक भी उनकी सेवाएं लेने के लिए उतावला था. दोनों के अपने हित थे .दुर्भाग्य से बात नहीं बनी .लेकिन हमारा वार्तालाप चलता रहा .अंत तक चलता रहा। 

वैदिक जी हिंदी के अनथक योद्धा तो थे ही. हिंदी के लिए उन्होंने जितनी लड़ाई लड़ी उतनी शायद किसी दूसरे ने नहीं लड़ी. वे जहाँ भी जाते हिंदी को लेकर अपनी लिखी पुस्तिका निशुल्क बांटते थे .किताब कैसे छपती थी ,ये सिर्फ उन्हें ही पता था. शायद कोई हिंदी प्रेमी महानुभाव इस किताब का खर्च उठाते थे .मुझे वैदिक जी की अहमन्यता से हमेशा तकलीफ होती थी .कोई माने या न माने वे गजब की फेंकते थे और पूरे आत्मविशास के साथ फेंकते थे .उसमें कितना सच होता था और कितनी कल्पना भगवान ही जाने। 

अफगान मामलों के वे विशेषज्ञ थे ही. अनेक राष्ट्राध्यक्षों से उनके दोस्ताना रिश्ते थे और इसे लेकर वे हमेशा गर्वोन्नत होते थे .मुझे हमेशा लगता था कि वे डांवाडोल होने वाले पत्रकार हैं ,क्योंकि वे आज जिस मुद्दे पर अडिग दिखाई देते थे ,कल उसी मुद्दे के खिलाफ भी खड़े हो जाते थे .मेरे हिसाब से उन्हें उनकी प्रतिष्ठा के हिसाब से जितना सम्मान मिलना था उतना नहीं मिला .मै उनके भीतर इस बात को लेकर हमेशा एक अकुलाहट देखता था .राजकीय मान-सम्मान हर किसी को अच्छा लगता है,वैदिक जी भी इसके अभिलाषी थे ,किन्तु उनकी अभिलाषाएं शायद अतृतप्त ही रहीं। 

वैदिक जी के प्रति मेरी आस्था उस समय डांवांडोल हुई जब वे एक बाबा के प्रचारक बन गए .उन्होंने हिंदुत्व को लेकर भी अपना ताना-वाना बदला .मुझे हमेशा लगता रहा कि वे ऐसा अपनी अतृप्त इच्छाओं को पूरा करने के लिए कर रहे होंगे .मुमकिन है कि मै सौ फीसदी गलत होऊं .लेकिन मेरी धारणा नहीं बदलना थी सो नहीं बदली .वे मुझे सतत लिखने के लिए उकसाते थे और उन्हीं की प्रेरणा से मैंने बिना नागा लिखना शुरू किया .अनेक अवसर तो ऐसे आये जब उनके और मेरे लेख एक ही अखबार में साथ साथ छपे। 

नियमित लेखन एक कठिन काम है. खुशवंत सिंह और कुलदीप नैयर हर पत्रकार नहीं हो सकता .वैदिक जी इस मामले में तमाम नियमित लिखने वालों पर भारी पड़ते थे .अक्सर हाथ से लिखते थे.स्मृतियों का अनंत भण्डार था उनके पास .जो लिखते थे उसमें पारदर्शुता होती थी .उनका गुस्सा और प्रेम उनके लेखन में साफ़ दिखाई देता था .उनकी राजनीतिक विचारधारा जो भी रही हो लेकिन वे सबके प्रिय रहे .उन्होंने बड़ी सावधानी से अपने आपको सभी राजनीतिक दलों से जोड़कर रखा था .यदि किसी से मोह भांग हुआ तो छिपाया नहीं और यदि किसी के तरफ झुके तो खुलकर झुके। 

एक पत्रकार के नाते उनका सबसे बड़ा गुण ये था कि वे निर्भीक थे.किसी से डरते हुए मैंने उन्हें कभी नहीं देखा.दूसरे उन्होंने अपने जीवनकाल में जो यश-कीर्ति कमाई वो उनके लेखन की बदौलत ही उन्हें मिली .उन्होंने लेखन के इतर कुछ और किया हो ऐसा मुझे नहीं लगता .वे हाफिज सईद से मिले ,मैंने इस पर जिज्ञासा प्रकट की तो उन्होंने उत्तर या सफाई देने के बजाय प्रतिप्रश्न किया-' आप अपने इलाके के डाकू सरगनाओं से क्यों मिलते हैं ? किसी ने आपको कहा क्या ऐसा करने के लिए ?' वे कहते थे कि पत्रकार का धर्म है कि वो अपनी और से जज न बने .सबसे मिले.उससे भी जिससे मिलना मुश्किल होता है या अपराध समझा जाता है। 

मध्यप्रदेश जैसे पिछड़े प्रदेश से निकले वैदिक जी ने प्रदेश का मान अपने लेखन से बढ़ाया .अपने प्रदेश और अपने शहर को प्रतिष्ठा दिलाई .उनसे पहले ये काम राजेंद्र माथुर,प्रभाष जोशी ,आलोक मेहता जैसे और पत्रकार भी कर चुके थे लेकिन वे सब वैदिक जी जैसे लिख्खाड़ और धाकड़ नहीं थे .सबकी अपनी सीमाएं थीं,किन्तु वैदिक जी की कोई सीमा न थी.वे हर सीमा पार कर सकते थे और उन्होंने ऐसा लगातार किया भी आज से उनके लिखे लेख पढ़ने को नहीं मिलेंगे.ये एक तरह की रिक्तता ही है जिसे कोई दूसरा नहीं भर सकता.मै उनकी तरह ही सतत लिखते रहने के संकल्प के साथ अपनी विनम्र श्रृद्धांजलि अर्पित करता हूँ। 

 
 
 

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