महानगर: अवसरों की भूमि या संवेदनाओं का सूखा मैदान?

जगमगाते महानगरों के भीतर पनपती खामोश महामारी

प्रो. आरके जैन “अरिजीत” पहले शहरों को उम्मीदों की फैक्ट्री कहा जाता था। यहाँ रोशनी कभी बुझती नहीं, सपने थकते नहीं और भीड़ ठहरती नहीं। फिर भी इस अनवरत चहल-पहल के बीच एक गहरी खामोशी जन्म ले रही है।...
संपादकीय  स्वतंत्र विचार