राजा रवि वर्मा के चित्रों में जीवित गौरवशाली भारतीय परंपरा

उन्होंने भारतीय पौराणिक कथाओं के पात्रों को मानवीय संवेदनाओं के साथ जीवंत रूप में प्रस्तुत किया

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महेन्द्र तिवारी 
 
भारतीय चित्रकला के गौरवशाली इतिहास में राजा रवि वर्मा एक ऐसे युगपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हैं जिन्होंने अपनी कूची और रंगों के माध्यम से भारतीय संस्कृति को एक नई पहचान और वैश्विक गरिमा प्रदान की। 29 अप्रैल 1848 को केरल के किलिमनूर नामक छोटे से गांव में जन्मे इस महान कलाकार ने उस समय कला की साधना प्रारंभ की जब वह केवल राजदरबारों की दीवारों और प्राचीन मंदिरों के गर्भगृहों तक ही सीमित थी। रवि वर्मा का जन्म एक ऐसे कुलीन परिवार में हुआ था जहाँ कला, साहित्य और संस्कृति का संगम पहले से ही विद्यमान था और इसी वातावरण ने उनकी अंतर्निहित प्रतिभा को पल्लवित होने का सुअवसर प्रदान किया।
 
बचपन से ही उनके हाथों में रंगों और रेखाओं का जो जादू था उसे उनके परिवार ने शीघ्र ही पहचान लिया और उन्हें कला के क्षेत्र में निरंतर प्रोत्साहित किया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा के साथ ही चित्रकला का अभ्यास निरंतर चलता रहा और शीघ्र ही उनकी ख्याति त्रावणकोर के महाराजा तक पहुँच गई। महाराजा के संरक्षण ने रवि वर्मा के जीवन को एक निर्णायक मोड़ दिया जहाँ उन्हें न केवल संसाधन उपलब्ध हुए बल्कि वैश्विक कला की बारीकियों को समझने का अवसर भी प्राप्त हुआ।
 
उस दौर में भारत में तैल चित्रकला की प्रविधि बहुत कम प्रचलित थी और भारतीय कलाकार मुख्य रूप से पारंपरिक शैलियों में ही कार्य कर रहे थे। रवि वर्मा ने यूरोपीय शैली की यथार्थवादी कला का गहराई से अध्ययन किया और उसे भारतीय विषयों के साथ समाहित करने का साहसिक प्रयास किया। उन्होंने अपनी कला में पाश्चात्य प्रविधि और भारतीय आत्मा का जो संगम किया उसने चित्रकला के इतिहास में एक नवीन अध्याय जोड़ दिया। उनकी कला की सबसे विलक्षण विशेषता यह थी कि उन्होंने भारतीय पौराणिक कथाओं के पात्रों को मानवीय संवेदनाओं के साथ जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।
 
रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों के जो पात्र अब तक केवल कल्पनाओं या पांडुलिपियों के विवरणों तक ही सीमित थे वे रवि वर्मा के चित्रों में हाड़-मांस के मनुष्य की तरह जीवंत होकर सामने आए। उनके द्वारा चित्रित राम, सीता, कृष्ण, द्रौपदी और शकुंतला के चित्रों में भावनाओं की जो गहराई और चेहरों पर जो भाव विद्यमान थे उन्होंने जनमानस के हृदय को स्पर्श किया। विशेष रूप से देवी लक्ष्मी और सरस्वती के जो स्वरूप उन्होंने अपनी तूलिका से गढ़े वे आज भी करोड़ों भारतीय घरों के पूजा स्थलों में श्रद्धा के साथ देखे जा सकते हैं।
 
रवि वर्मा की कला का एक महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय स्त्री के सौंदर्य और उसकी गरिमा का चित्रण था। उनके चित्रों में स्त्रियां केवल सौंदर्य का प्रतीक मात्र नहीं थीं बल्कि वे भावनात्मक रूप से अत्यंत सशक्त और गरिमापूर्ण दिखाई देती थीं। उन्होंने भारतीय नारी को एक ऐसे आदर्श रूप में प्रस्तुत किया जिसमें सौम्यता, शक्ति और मर्यादा का अद्भुत संतुलन था। उनके द्वारा चित्रित साड़ी पहने हुए स्त्रियों के चित्रों ने न केवल भारतीय वेशभूषा को एक वैश्विक पहचान दी बल्कि वह भारतीय नारीत्व की एक शाश्वत छवि बन गई।
 
उनके चित्रों में रंगों का चयन और वस्त्रों की सिलवटों का सूक्ष्म चित्रण इतना यथार्थवादी था कि दर्शक उन चित्रों के साथ एक आत्मीय जुड़ाव महसूस करने लगता था। उनकी कला में केवल बाहरी सौंदर्य ही नहीं बल्कि पात्रों की मानसिक अवस्था और उनके अंतर्द्वंद्व को भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था। शकुंतला का अपने पैर से कांटा निकालने का बहाना करके पीछे मुड़कर देखना हो या दमयंती का हंस से संवाद, हर चित्र एक पूरी कहानी स्वयं में समेटे हुए था।
 
भारतीय चित्रकला को महलों से निकालकर झोपड़ियों तक पहुँचाने का श्रेय भी निर्विवाद रूप से राजा रवि वर्मा को ही जाता है। वर्ष 1894 में उन्होंने मुंबई में एक शिलामुद्रणालय अर्थात लिथोग्राफी प्रेस की स्थापना करके एक क्रांतिकारी कदम उठाया। इस प्रेस के माध्यम से उनके चित्रों की हजारों प्रतियां छपने लगीं और बहुत ही कम मूल्य पर सामान्य लोगों के लिए उपलब्ध होने लगीं। इससे पहले कला केवल धनी वर्ग और शासकों के विलास का साधन समझी जाती थी परंतु रवि वर्मा ने अपनी इस दूरदर्शिता से कला का लोकतंत्रीकरण कर दिया।
 
उनके द्वारा बनाए गए चित्र कैलेंडरों और पोस्टरों के रूप में प्रत्येक घर की शोभा बनने लगे। इसी माध्यम से भारतीय देवी-देवताओं की एक निश्चित छवि जनमानस के मस्तिष्क में स्थायी रूप से अंकित हो गई। यह उनकी कला का ही प्रभाव था कि उस समय के साधारण भारतीय भी अपनी संस्कृति और धार्मिक प्रतीकों के साथ गर्व से जुड़ सके।
 
रवि वर्मा की सफलता केवल भारत तक ही सीमित नहीं रही बल्कि उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी भारतीय कला का परचम लहराया। वर्ष 1873 में ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में उन्हें पुरस्कृत किया गया जिससे उनकी ख्याति विश्वव्यापी हो गई। इसके पश्चात उन्हें भारत की विभिन्न रियासतों जैसे बड़ौदा, मैसूर और उदयपुर के राजाओं का निमंत्रण और संरक्षण प्राप्त हुआ।
 
उन्होंने देश के विभिन्न अंचलों की व्यापक यात्राएं कीं और वहां की विविधतापूर्ण संस्कृति, वेशभूषा और जनजीवन को अपनी कला में स्थान दिया। उनकी इन यात्राओं ने उनकी कला को और अधिक समृद्ध और समावेशी बनाया। हालांकि उनकी इस पाश्चात्य शैली की कुछ पारंपरिक कलाकारों ने आलोचना भी की और इसे भारतीयता के विरुद्ध बताया परंतु समय ने सिद्ध किया कि रवि वर्मा ने वास्तव में भारतीय कला को आधुनिकता के साथ जोड़कर उसे नया जीवन प्रदान किया था।
 
उनकी कला में छाया और प्रकाश का जो प्रयोग था वह अद्वितीय था। उन्होंने चित्रों में गहराई पैदा करने के लिए जिस सूक्ष्मता से कार्य किया वह आज भी कला के विद्यार्थियों के लिए शोध का विषय है। उनके चित्रों के रंगों में एक ऐसी चमक और स्थायित्व था जो दशकों बाद भी धूमिल नहीं हुआ। वे केवल एक चित्रकार ही नहीं थे बल्कि भारतीय संस्कृति के एक ऐसे दूत थे जिन्होंने विदेशी शासन के दौर में भी भारतीय मूल्यों को गौरव के साथ स्थापित किया।
 
2 अक्टूबर 1906 को इस महान विभूति का निधन हो गया लेकिन वे अपनी कला के रूप में आज भी अमर हैं। उनकी विरासत आज भी भारतीय चित्रकारों को प्रेरित करती है और उनके बनाए चित्र आज भी विश्व के प्रतिष्ठित संग्रहालयों में सुरक्षित रखे गए हैं। रवि वर्मा का जीवन हमें सिखाता है कि प्रतिभा और समर्पण के माध्यम से सीमाओं को तोड़ा जा सकता है और कला के जरिए समाज में एक व्यापक वैचारिक परिवर्तन लाया जा सकता है।
 
राजा रवि वर्मा ने कला को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर उसे राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम बनाया। उनके चित्रों ने उस कालखंड में भारतीयों के भीतर अपनी परंपराओं के प्रति स्वाभिमान जगाने का कार्य किया जब पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव चरम पर था। उनकी सबसे बड़ी देन यही है कि उन्होंने आम आदमी की आंखों को कला परखने की दृष्टि दी और कला को जन सामान्य की भावना का अभिन्न अंग बना दिया।
 
आज भी जब हम किसी पौराणिक आख्यान की कल्पना करते हैं तो हमारे मन में अनायास ही वही रूप उभरते हैं जिन्हें रवि वर्मा ने अपनी कल्पना से साकार किया था। भारतीय कला के इतिहास में उनका नाम सदैव एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ के रूप में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा और आने वाली पीढ़ियां उनके कार्यों से निरंतर प्रेरणा प्राप्त करती रहेंगी।

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