80 वर्ष की उम्र में भी ‘बब्बर शेर’ का जज़्बा: वीर कुंवर सिंह के विजयोत्सव पर गूंजा शौर्य

वर्ष 1777 में जन्मे इस वीर योद्धा ने अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में भी अंग्रेजों के सामने घुटने टेकने के बजाय डटकर मुकाबला किया

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प्रयागराज। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बाबू वीर कुंवर सिंह के विजयोत्सव (23 अप्रैल) पर पूरे क्षेत्र में उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया गया। इस अवसर पर शहीद क्रांतिकारी बाबू झूरी सिंह के प्रपौत्र रामेश्वर सिंह ने उनके अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति को याद करते हुए कहा कि “80 वर्ष की उम्र में भी जिस तरह कुंवर सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, वह आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है।”
 
रामेश्वर सिंह ने बताया कि बिहार के जगदीशपुर में जन्मे कुंवर सिंह न केवल एक बड़े जागीरदार थे, बल्कि जनप्रिय और साहसी नेतृत्वकर्ता भी थे। वर्ष 1777 में जन्मे इस वीर योद्धा ने अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में भी अंग्रेजों के सामने घुटने टेकने के बजाय डटकर मुकाबला किया।
 
उन्होंने बताया कि मिर्जापुर क्षेत्र में युद्ध के दौरान कुंवर सिंह की मुलाकात भदोही के क्रांतिकारी बाबू झूरी सिंह से हुई थी। इस मुलाकात के बाद दोनों वीरों ने मिलकर मिर्जापुर, सोनभद्र और रीवा क्षेत्रों में अंग्रेजों के खिलाफ जोरदार संघर्ष किया। इसी दौरान हलिया थाने को आग के हवाले करने जैसी घटनाएं भी हुईं, जिसने अंग्रेजी हुकूमत को हिला कर रख दिया।
 
1857 की क्रांति में निभाई अहम भूमिका
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857 के दौरान कुंवर सिंह की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। मंगल पांडे की क्रांति की चिंगारी से प्रेरित होकर उन्होंने दानापुर के सिपाहियों और स्थानीय युवाओं के साथ मिलकर आरा नगर पर कब्जा कर लिया। जेल तोड़कर कैदियों को मुक्त कराया और अंग्रेजों के खजाने पर अधिकार स्थापित किया। इसके बाद बीबीगंज और बिहिया के जंगलों में अंग्रेजों के साथ भीषण युद्ध हुआ, जहां उन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। हालांकि अंग्रेजों की भारी सेना के सामने कई बार उन्हें पीछे हटना पड़ा, लेकिन उनका संघर्ष जारी रहा।
 
अद्भुत साहस की मिसाल
इतिहास में वर्णित है कि जब गंगा पार करते समय उनकी बांह में अंग्रेजों की गोली लगी, तो उन्होंने संक्रमण से बचने के लिए अपनी कलाई स्वयं काटकर गंगा में समर्पित कर दी। यह घटना उनके अदम्य साहस और देशभक्ति का प्रतीक बन गई। घायल अवस्था में भी उन्होंने हार नहीं मानी और 23 अप्रैल 1858 को जगदीशपुर पर पुनः विजय प्राप्त कर अंग्रेजों को करारा जवाब दिया। लेकिन गंभीर चोटों के कारण 26 अप्रैल 1858 को इस महान योद्धा का निधन हो गया।
 
“हर भारतीय मनाए 23 अप्रैल को शौर्य दिवस”
रामेश्वर सिंह ने कहा कि 23 अप्रैल केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय वीरता और स्वाभिमान का प्रतीक है। उन्होंने अपील की कि इस दिन को पूरे देश में “शौर्य दिवस” के रूप में मनाया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास और वीरों के बलिदान को याद रख सकें। कार्यक्रम के दौरान स्थानीय लोगों ने भी वीर कुंवर सिंह के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी और उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया।

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