शांति वार्ता विफल, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़े विस्फोट की आशंका
पाकिस्तान त्रिशंकु बन लटक रहा है
पश्चिम एशिया की तपती रेत पर एक बार फिर बारूद की गंध तेज हो गई है, और इस बार केंद्र में है अमेरिका,ईरान,इजरायल का जटिल त्रिकोण, जिसमें पाकिस्तान एक ऐसे संदेशवाहक की भूमिका में फँसता दिख रहा है जो न पूरी तरह किसी का हो पाया और न ही अपने घर की हालत संभाल पाया। हार्मुज़ जलडमरूमध्य, जिसे दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र माना जाता है, इस संभावित टकराव का सबसे खतरनाक मोर्चा बन चुका है। यहां से गुजरने वाले तेल टैंकरों पर ज़रा-सी चिंगारी भी वैश्विक अर्थव्यवस्था में विस्फोट कर सकती है।
अमेरिका लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है, जबकि इजरायल इसे अपने अस्तित्व के लिए सीधा खतरा मानता है और समय-समय पर ईरानी ठिकानों पर हमले करता रहा है। हाल के महीनों में घटनाओं की श्रृंखला ने तनाव को और अधिक तीखा कर दिया है। लाल सागर में जहाजों पर हमले, सीरिया और इराक में मिलिशिया गतिविधियाँ, और गाज़ा संघर्ष के बाद बढ़ा हुआ क्षेत्रीय असंतुलन,इन सबने हालात को विस्फोटक बना दिया है। इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान ने खुद को एक मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की, लेकिन यह कूटनीतिक दांव उसके लिए भारी पड़ता दिख रहा है।
आर्थिक रूप से पहले से जूझ रहे देश ने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की मेहमाननवाज़ी के लिए महंगे होटलों और सुरक्षा इंतजामों पर भारी खर्च किया, जिसका बोझ आखिरकार उसकी आम जनता पर टैक्स और महंगाई के रूप में पड़ा, और यही कारण है कि देश के भीतर असंतोष की लहर तेज हो गई है। पाकिस्तान की यह स्थिति घर का न घाट जैसी हो गई है। एक ओर वह अमेरिका को खुश रखने की कोशिश करता है, दूसरी ओर ईरान जैसे पड़ोसी को नाराज़ भी नहीं करना चाहता, और इसी संतुलन की कोशिश में उसकी आंतरिक आर्थिक स्थिति और अधिक कमजोर और जर्जर हो रही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने हालिया बयानों में स्पष्ट संकेत दिया है कि अमेरिका क्षेत्र में अपने हितों और सहयोगियों की सुरक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाने को तैयार है, और यदि ईरान ने उकसावे वाली गतिविधियाँ बंद नहीं कीं तो कठोर जवाब दिया जाएगा। यह बयान सीधे तौर पर सैन्य कार्रवाई की संभावना को खारिज नहीं करता बल्कि उसे एक रणनीतिक विकल्प के रूप में खुला रखता है। दूसरी ओर ईरान का रुख भी उतना ही सख्त है तेहरान का कहना है कि वह अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय प्रभाव की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
यदि उसके हितों पर हमला हुआ तो जवाब निर्णायक और व्यापक होगा। ईरानी नेतृत्व बार-बार यह दोहरा रहा है कि हार्मुज़ जलडमरूमध्य उसकी रणनीतिक पकड़ में है और जरूरत पड़ने पर वह वैश्विक तेल आपूर्ति को बाधित कर सकता है, जो दुनिया के लिए एक भयावह संकेत है। इस पूरे समीकरण में इजरायल की भूमिका भी बेहद आक्रामक बनी हुई है वह ईरान के परमाणु ठिकानों और उसके सहयोगी नेटवर्क को खत्म करने के लिए लगातार सैन्य विकल्पों पर विचार करता रहा है, और कई बार गुप्त अभियानों के जरिए ईरान को नुकसान पहुंचा चुका है।
इन तीनों शक्तियों के बीच बढ़ती अविश्वास की खाई किसी भी छोटे घटनाक्रम को बड़े युद्ध में बदल सकती है, और हार्मुज़ जलडमरूमध्य इसका सबसे संवेदनशील बिंदु है, जहां एक मिसाइल, एक ड्रोन या एक गलतफहमी भी वैश्विक संकट का कारण बन सकती है। पाकिस्तान की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में सबसे दयनीय दिखाई देती है। एक ओर वह खुद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रासंगिक बनाए रखने के लिए इस तरह की मध्यस्थता करता है, लेकिन दूसरी ओर उसकी आर्थिक हकीकत उसे इस भूमिका के लिए तैयार नहीं होने देती विदेशी कर्ज, महंगाई, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता से जूझते देश के लिए यह कूटनीतिक साहस कहीं न कहीं आत्मघाती साबित हो रहा है।
आम पाकिस्तानी नागरिक के लिए यह स्थिति और भी पीड़ादायक है, क्योंकि वह न तो इन वैश्विक रणनीतियों का हिस्सा है और न ही उसके पास इनका कोई लाभ है, लेकिन कीमत वही चुका रहा है,महंगे ईंधन, बढ़ते टैक्स और घटती जीवन-स्तर के रूप में। यदि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव वास्तव में युद्ध में बदलता है, तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा; भारत सहित पूरी दुनिया पर इसके आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव पड़ेंगे, खासकर ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार मार्गों पर। इसलिए यह समय केवल शक्ति प्रदर्शन का नहीं, बल्कि संयम और संवाद का है, लेकिन मौजूदा हालात में जिस तरह से बयानबाज़ी और सैन्य गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, उससे शांति की संभावना कमजोर और टकराव की आशंका अधिक मजबूत दिखाई देती है।
संजीव ठाकुर


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