व्यक्तिगत अहम् को धर्म युद्ध बताना सनातन धर्म एवं सांस्कृतिक मूल्यों के विपरीत : हिन्दू विचार मंच पाकुड़िया इकाई

अभिमन्यु वध आदि स्मरण कराते हुए धर्म की व्यापकता बताई, जिस पर कर्ण चुप हो गया

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पाकुड़िया, पाकुड़, झारखण्ड:-  495 वर्षों के उपरांत भारतवर्ष की पावन भूमि अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर देश की सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के आलोक में भव्य-दिव्य श्रीराम मंदिर के निर्माण एवं देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा श्रीराम मूर्ति का विधिवत प्राण प्रतिष्ठा करने पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती की आलोचना से लेकर मौनी अमावस्या पर त्रिवेणी संगम स्नान और इन दिनों व्यक्तिगत अहम् के अश्व पर सवार होकर शंकराचार्य ने गौ रक्षा के नाम पर योगी आदित्यनाथ के विरुद्ध लखनऊ प्रस्थान को धर्म युद्ध बताकर सनातनियों में धर्म के प्रति संशय-भ्रम पैदा कर भारत की प्रगति को अवरुद्ध करने की कुचेष्टा करते दिख रहे हैं।
 
इसे धर्म युद्ध कहना सनातन सांस्कृतिक मूल्यों के विपरीत ही नहीं अपितु राष्ट्र विरोधी तत्वों को बल प्रदान कर राष्ट्रीय प्रगति को अवरुद्ध करने की कुचेष्टा कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी।स्मरण रहे सनातन धर्म कोई व्यक्ति नहीं है और न ही किसी के द्वारा थोपी गई मान्यता है। धर्म का व्यापक अर्थ कर्म है और धर्म वही है जो मानवीय हितों का संवर्धन करते हुए राष्ट्र की रक्षा-सुरक्षा में सहायक हो।क्या शंकराचार्य जी को यह प्रसंग ज्ञात नहीं है कि श्रीकृष्ण ने सूर्यपुत्र कर्ण को वध करने की आज्ञा दी जब वह अस्त्र-शस्त्र को रथ पर रख कीचड़ में फंसे रथ के पहिये को निकाल रहा था। तब कर्ण ने इसे अधर्म कहते हुए कृष्ण को धिक्कारा। तब योगेश्वर ने कर्ण को द्रौपदी के चीरहरण, अभिमन्यु वध आदि स्मरण कराते हुए धर्म की व्यापकता बताई, जिस पर कर्ण चुप हो गया।
 
शंकराचार्य कहते हैं कि वे ग्यारह मार्च को लखनऊ में शंख बजाकर गौरक्षा के लिए उद्घोष करेंगे जैसे महाभारत युद्ध को श्रीकृष्ण ने धर्म युद्ध कहा था। सनातन धर्म और सांस्कृतिक मूल्यों में गौ माता का स्थान ऊँचा रहा है और आज भी है। यद्यपि सनातन परम्पराओं में जीव हत्या को पाप कहते हुए सभी जीवों की रक्षा करना धर्म कहा गया है।रघुवंशी महाराज शिवि ने तो एक कबूतर की रक्षा हेतु अपने प्राण अर्पित करने को तत्परता दिखाई थी। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हिन्दू होने का प्रमाण मांगते हुए संन्यासी नहीं होने की बात कह दी। परन्तु उन्हें धर्म की व्यापकता के आलोक में दशरथ नंदन अयोध्या अधिपति श्रीरामचन्द्र जी के बाल्य, तरुण और अश्वमेध यज्ञ करने के उपरांत चक्रवर्ती सम्राट बनने तक के कालक्रमों पर गंभीरता से मंथन करते हुए धर्म के मर्म को समझना चाहिए।
 
क्या रामजी केवल पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन कर धर्म की व्यापकता और सार्थकता सिद्ध की, या प्रजापालन करते हुए आर्यावर्त और जम्बूद्वीप को मानव तथा राष्ट्र विरोधी तत्वों का संहार कर समृद्धि के शिखर पर पहुँचाया? वहीं श्रीराम ने माँ जानकी को वनवास देने के उपरांत क्या स्वयं संन्यासी जीवन नहीं जिया? केवल गेरुआ वस्त्र धारण करना ही संन्यास नहीं है। इसके साथ कामना और वासनाओं का पूर्ण परित्याग करना ही वास्तविक संन्यास है।
 
हिन्दू कोई मत-पंथ नहीं है। हिन्दू एक विशाल जीवन शैली है और इसकी अवधारणा में सम्पूर्ण विश्व एक विशाल परिवार के रूप में समाया है जिसमें सबके कल्याण की कामना की गई है। वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दर्शन में वे हिन्दू हैं चाहे वे किसी भी मत-पंथ या उपासना पद्धति को मानते हों, यदि उनकी राष्ट्रीय निष्ठा भारतीय राष्ट्र के प्रति समर्पित हो।
 
हालांकि प्राचीन वेदों, उपनिषदों और स्मृतियों में हिन्दू शब्द का उल्लेख नहीं मिलता है। तात्पर्य यह है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती महाराज जी को व्यक्तिगत अहम् का परित्याग कर योगी आदित्यनाथ जैसे कर्मनिष्ठ प्रशासक के विरुद्ध गौरक्षा के नाम पर प्रदेश को अस्थिर नहीं करना चाहिए। इससे न केवल सनातनी भ्रमित होंगे बल्कि भारत विरोधी लॉबी को भी सहारा मिलेगा।
 
जहाँ तक गौमाता की रक्षा की बात है, इसकी चर्चा विपक्षी तथा सत्ता पक्ष के नेताओं द्वारा लोकसभा और विधानसभाओं में कर समस्या का समाधान संविधान के तहत सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। योगी जी के प्रशासनिक काल में गौमाता को सुरक्षा तो मिल ही रही है, वहीं दूसरी ओर माता-बहनें भी स्वयं को सुरक्षित अनुभव करते हुए प्रगति की ओर बढ़ रही हैं। यदि कोई विचलित है तो वह भूमाफिया, अपराधी तथा अराष्ट्रीय तत्व हैं।
 
वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को भी शंकराचार्य जी का पूरा सम्मान राष्ट्रहित में करना चाहिए ताकि भारतवर्ष की पावन धरा पर 7वीं से 13वीं सदी तक आक्रांताओं तथा उसके बाद देशी राजाओं की आपसी प्रतिस्पर्धा और द्वेष के कारण मुगल व अंग्रेजों के पराधीन काल में भारतीयों पर हुई यातनाओं से सबक लेते हुए हम भारतीय अपने स्वर्णिम अतीत से प्रेरणा लेकर भारतवर्ष को पुनः सभी क्षेत्रों में शक्तिशाली बनाते हुए समृद्धि के शिखर पर पहुँचा सकें।

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