मकर संक्रांति पर निशा बबलू सिंह ने पेश की सेवा की मिसाल, सैकड़ों जरूरतमंदों को मिला सहारा

निशा सिंह की संघर्ष की कहानी, लोगों के लिए प्रेरणास्रोत

मकर संक्रांति पर निशा बबलू सिंह ने पेश की सेवा की मिसाल, सैकड़ों जरूरतमंदों को मिला सहारा

अजित सिंह /राजेश तिवारी ( ब्यूरो) 

रेणुकूट /सोनभद्र-

मकर संक्रांति के पावन पर्व पर जहाँ पूरा देश उत्सव में डूबा था, वहीं सोनभद्र के रेणुकूट क्षेत्र में सेवा और समर्पण की एक अनुपम तस्वीर देखने को मिली। पूर्व अध्यक्ष रेणुकूट, निशा बबलू सिंह के परिवार द्वारा उनके कार्यालय पर भव्य भंडारे का आयोजन किया गया और भीषण ठंड को देखते हुए व्यापक स्तर पर कंबल वितरण का कार्य संपन्न हुआ।

निशा सिंह की कहानी संघर्ष और आत्मबल की एक मिसाल है। अपने पति की हत्या के बाद उन्होंने टूटने के बजाय समाज सेवा का कठिन मार्ग चुना। आज वे सोनभद्र की पहली ऐसी आत्मनिर्भर महिला के रूप में उभरी हैं, जिन्होंने अपनी एक समर्पित टीम तैयार की है। यह टीम दिन-रात क्षेत्र के असहाय और निर्धन लोगों की सेवा में जुटी रहती है। स्थानीय लोगों का मानना है कि जो तत्परता जनप्रतिनिधियों (सांसदों और विधायकों) को दिखानी चाहिए थी, वह सेवा भाव निशा सिंह अकेले दिखा रही हैं।

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सोनभद्र जैसे औद्योगिक क्षेत्र में आज भी मजदूरों का शोषण एक बड़ी समस्या है। जहाँ कई जनप्रतिनिधि इन मुद्दों पर मौन साधे रहते हैं, वहीं निशा सिंह अपने पति के दिखाए गए मार्गदर्शन पर चलते हुए गरीब और लाचार मजदूरों की ढाल बनकर खड़ी रहती हैं। इस सेवा यात्रा में उनके बड़े पुत्र अभय प्रताप सिंह भी पूरी निष्ठा के साथ अपने पिता और परिवार के संस्कारों को आगे बढ़ा रहे हैं। युवाओं के लिए अभय आज एक प्रेरणा बन चुके हैं, जो राजनीति से ऊपर उठकर सामाजिक सरोकारों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

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निशा सिंह की टीम का कार्य केवल भोजन और वस्त्र वितरण तक सीमित नहीं है। पूर्वांचल क्षेत्र में उनके परिवार की पहचान एक ऐसे मददगार के रूप में है जो संकट के समय सबसे पहले खड़ा होता है। यदि कोई गरीब व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार पड़ता है, तो उनकी टीम उसे लखनऊ, बनारस या दिल्ली जैसे बड़े शहरों के अस्पतालों तक ले जाती है। इलाज की व्यवस्था से लेकर मरीज की देखभाल तक, टीम हर संभव प्रयास करती है ताकि कोई भी आर्थिक अभाव में दम न तोड़े। कहते हैं कि संस्कार ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।

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पूरे पूर्वांचल में ऐसे समाजसेवी बहुत कम देखने को मिलते हैं जो किसी भी हद तक जाकर पीड़ितों का साथ दें। निशा सिंह का कहना है कि वे ईश्वर से बस यही प्रार्थना करती हैं कि उन्हें इतनी शक्ति मिलती रहे ताकि वे समाज के वंचित वर्गों की सेवा निरंतर करती रहें। मकर संक्रांति के इस आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि समाज में बदलाव लाने के लिए केवल पद की नहीं, बल्कि सेवा के सच्चे जज्बे की जरूरत होती है।

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