कलम के साथ अब कंबल से सेवा, पत्रकार अजीत सिंह ने पेश की मानवता की मिसाल
कम्बल पाकर गरीबों के चेहरे खिले, लोगों ने की भूरि भूरि प्रसंशा
राजेश तिवारी के साथ रीता कुमारी की खास रिपोर्ट
समाज में जहां एक ओर भ्रष्टाचार और समस्याओं का अंबार लगा है, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे व्यक्तित्व भी हैं जो अपने उत्तरदायित्वों से परे जाकर समाज सेवा की नई परिभाषा लिख रहे हैं। जनपद सोनभद्र के जागरूक पत्रकार अजीत सिंह इन दिनों अपने मानवीय कार्यों के कारण चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। वे न केवल खबरों के जरिए समाज की विसंगतियों को उजागर कर रहे हैं, बल्कि इस कड़कड़ाती ठंड में असहायों के लिए 'मसीहा' बनकर भी सामने आए हैं।

पत्रकार अजीत सिंह ने आइए मिलकर परिवर्तन लाएं और खुद को बदलो, समाज बदलेगा के संकल्प के साथ एक विशेष सेवा अभियान शुरू किया है। इस अभियान के तहत वे स्वयं उन स्थानों पर पहुँच रहे हैं जहाँ भीषण ठंड में लोग खुले आसमान के नीचे या अभावों में जीवन जीने को मजबूर हैं। अजीत सिंह का मानना है कि साधु-संत हमारी भारतीय संस्कृति की धरोहर हैं। वे जनपद के छोटे-बड़े मंदिरों में जाकर वहां रह रहे संतों, गरीब, असहाय और दिव्यांगों को कंबल वितरित कर रहे हैं।
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उन्होंने भावुक होकर कहा, जब एक मानव, दूसरे मानव के बारे में नहीं सोचेगा तो कौन सोचेगा? मंदिर छोटा हो या बड़ा, हर उस स्थान पर मदद पहुँचनी चाहिए जहाँ ठंड से लोग ठिठुर रहे हैं। सेवा कार्य के साथ-साथ अजीत सिंह ने शासन-प्रशासन की कमियों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। उनका कहना है कि सरकारी कंबल वितरण अक्सर केवल कागजों, फोटो या शिविरों तक ही सीमित रह जाता है। इस कारण सहायता उन वास्तविक पात्रों तक नहीं पहुँच पाती, जो दुर्गम इलाकों में रहते हैं या चलने-फिरने में असमर्थ हैं।
उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि अधिकारी केवल शिविरों तक सीमित न रहें, बल्कि घर-घर जाकर सर्वे करें। खासकर दुर्गम आदिवासी क्षेत्रों और मलिन बस्तियों में सीधी मदद पहुँचाई जाए। जो वृद्ध और दिव्यांग शिविर तक नहीं आ सकते, प्रशासन उनके द्वार तक राहत सामग्री पहुंचाए।अजीत सिंह केवल कंबल ही नहीं बांट रहे, बल्कि वे गरीब परिवारों की बुनियादी समस्याओं को भी सूचीबद्ध कर रहे हैं ताकि उन्हें शासन और सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से रखा जा सके।
उनका स्पष्ट मानना है कि एक सच्चे पत्रकार का धर्म केवल समस्या बताना नहीं, बल्कि समाधान का हिस्सा बनना भी है।उनके इस निस्वार्थ कार्य की स्थानीय नागरिकों, प्रबुद्ध वर्ग और समाजसेवियों द्वारा जमकर सराहना की जा रही है। उनका यह प्रयास समाज में एक सकारात्मक संदेश दे रहा है कि यदि व्यक्ति स्वयं पहल करे, तो बदलाव निश्चित है।


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