सोनभद्र करोड़ों की लागत से लगी स्ट्रीट लाइटें बेकार, बाल श्रम और अधिकारियों की लापरवाही से जनता बेहाल

सड़क चौडिकरण के नाम पर हादसों को न्यौता दे रहे हैं नाबालिक बच्चे, चलवाया जा रहा है भारी वाहन, जिम्मेदार मौन

अजित सिंह / राजेश तिवारी Picture
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ओबरा की सड़कों पर छाया अंधेरा जिम्मेदार मौन, बाल मजदूरों की संख्या में इजाफा

अजित सिंह ( ब्यूरो रिपोर्ट) 

ओबरा/सोनभद्र-

सोनभद्र के ओबरा में बग्गा नाला से शारदा मंदिर तक सड़क किनारे लगाई गईं करोड़ों रुपये की लागत से स्ट्रीट लाइटें अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं। जहां इन लाइटों की औसत जीवन अवधि 5 साल बताई जाती है, वहीं ये साल भर के भीतर ही खराब पड़ी हैं। कुछ महीनों जलकर ठप हो गईं, तो कुछ खंभे टूटकर झूल रहे हैं। कई पोलों के स्विच बॉक्स टूटे-फूटे पड़े हैं, जिससे खुले तार मौत को दावत दे रहे हैं।

इस गंभीर स्थिति में भी संबंधित अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं, जिससे जनता में भारी आक्रोश है।इस पूरे मामले में एक और बेहद गंभीर पहलू सामने आया है, जो बाल संरक्षण अधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। बताया जा रहा है कि सड़क चौड़ीकरण के काम में ठेकेदार नाबालिग लड़कों से जेसीबी चलवा रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि 17 साल का एक लड़का जेसीबी चला रहा है, जिसे बिजली के तारों की कोई जानकारी नहीं है।

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इस गंभीर लापरवाही के बावजूद, जहां खुदाई की जा रही है, वहीं पर जिम्मेदार अधिकारी भी मौजूद हैं, मगर उनके आंखों पर पट्टी बंधी हुई प्रतीत होती है। यह स्पष्ट रूप से बाल श्रम कानून का उल्लंघन है और बच्चों के जीवन को खतरे में डालने जैसा है। बड़ा प्रश्न यह है कि बाल संरक्षण अधिकारी क्या जानबूझकर इन गंभीर उल्लंघनों से आंखें मूंद रहे हैं।स्थानीय निवासियों और हमारी पड़ताल से पता चला है कि इस पूरी अव्यवस्था के पीछे जिम्मेदार अधिकारियों की घोर लापरवाही और उदासीनता है।

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सड़क किनारे लगे इन लाइटों के खंभों की दशा देखकर लगता है कि इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। न तो कोई इनकी मरम्मत करवा रहा है और न ही इन्हें ठीक से देखने वाला कोई अधिकारी मौके पर मौजूद रहता है। परिणामस्वरूप, ये लाइटें अब सिर्फ एक दिखावा बनकर रह गई हैं, जो रात के अंधेरे में कोई रोशनी नहीं देतीं। हाल ही में चल रहे सड़क चौड़ीकरण के काम ने इस समस्या को और भी बढ़ा दिया है।

जेसीबी मशीनें बेतरतीब तरीके से खुदाई कर रही हैं, जिससे इन लाइटों के बिजली के तार तहस-नहस हो रहे हैं। आरोप है कि मौके पर कोई भी जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं रहता, जिसके चलते जेसीबी चालक अपनी मनमानी कर रहे हैं। खुले में पड़े बिजली के तार किसी भी बड़े हादसे को न्योता दे सकते हैं, खासकर बारिश के मौसम में यह स्थिति और भी भयावह हो सकती है।

विडंबना यह है कि एक तरफ जिला अधिकारी इस लाइट के संबंध में संज्ञान लेकर बैठकें कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ लोक निर्माण प्रांतीय खंड के द्वारा पीडब्ल्यूडी विभाग (जो सड़क चौड़ीकरण का कार्य करवा रहा है) लाइटों को तहस-नहस कर रहा है। इस आपसी समन्वय की कमी और विभागों की खींचतान का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी परियोजना चल रही है, लेकिन पीसीएल विभाग (जो इन लाइटों के लिए जिम्मेदार है) का कोई भी जिम्मेदार अधिकारी मौके पर मौजूद नहीं है। अब यह देखना होगा कि इस लापरवाही से जो सड़क बनाई जा रही है, वह कब तक टिकी रहती है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जनता के करोड़ों रुपये की लागत से लगी ये लाइटें महज कुछ महीनों में ही बेकार हो गईं। इन लाइटों की अवधि 5 साल तक की होती है, लेकिन 5 साल तो दूर, इन्हें लगे अभी साल भर भी पूरा नहीं हुआ है और ये बंद पड़ी हैं। यह न केवल सार्वजनिक धन की बर्बादी है, बल्कि यह उन सरकारी परियोजनाओं की गुणवत्ता, निगरानी और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है, जिनका उद्देश्य जनता को सुविधाएं प्रदान करना है।

स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन और संबंधित विभाग से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और खराब पड़ी लाइटों को दुरुस्त करवाने की मांग की है। साथ ही, सड़क चौड़ीकरण के दौरान बिजली के तारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, बाल श्रम पर रोक लगाने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई करने की भी अपील की गई है। देखना यह होगा कि कब तक इन बेहाल लाइटों को रोशनी नसीब होती है, कब तक बाल श्रम पर रोक लगती है, और कब तक सोनभद्र का यह महत्वपूर्ण मार्ग फिर से रोशन होता है।

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