अफीम युद्ध से फेंटानिल युद्ध तक

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जब से डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की सत्ता पर फिर से काबिज हुए हैं। उनका व्यवहार पूरी दुनिया के प्रति ऐसा हो गया है जैसे कि वो मालिक है और बाकि सब उसके आदेश का पालन करने वाले नौकर, कभी कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बता देना, कभी  ग्रीनलैंड के बहाने डेनमार्क को धमकाना, कभी भारत सहित दूसरे देशों के प्रवासियों को बेड़ियों और हथकड़ियों में जकड वापिस उनके देश फैंक जाना, कभी युक्रेन के राष्ट्रपति को खुलेआम अतंरराष्ट्रीय प्रैस के सामने धमकाना और बेइज्जत करना, कभी ट्रेड टैरिफ रेट के जरिए अन्य देशों पर दबाव बनाने की कोशिश करना के अलावा अन्य और भी बहुत से मुद्दे हैं जिनको लेकर ट्रंप पर विश्व को अपनी ताकत का एहसास करवाने की सनक सी सवार दिखाई देती है।
 
बेशक अन्य देश अपने अपने हिसाब से उसको उत्तर दे रहें हैं परन्तु कही ना कही ट्रंप की खुद को श्रेष्ठ दिखाने की कोशिश साफ दिखाई दे रही है। अपने ही देश के पूर्व राष्ट्रपति को अंतर्राष्ट्रीय प्रैस के सामने बेवाकूफ कहना उसके अहंकार को साफ-साफ  दर्शा रहा है। अब ट्रंप के अहंकार का सामना चीन से हुआ है। निसंदेह चीन हमारा दुश्मन देश है। अपनी विस्तारवादी नीति के तहत उसका अपना हर पड़ोसी से विवाद है। भारत की भी उसने बहुत सी भूमि कब्जा रखी है परन्तु यह भी सच है आज अमेरिका जिन तीन देशों से सबसे ज्यादा खौफजदा है उनमें भारत के अलावा चीन और रूस हैं।
 
अमेरिका यह जानता है एशिया कि यह तिकड़ी एक होकर यदि उसके सामने खड़ी हो गई तो अमेरिका की बदमाशी का अंत होते देर नही लगेगी। एक बात सभी जानते है कि भारत का सच्चा दोस्त यदि कोई है तो वो रूस है अमेरिका भारत का दोस्त कभी नही हो सकता। अमेरिका भारत के हक में कभी सयुंक्त राष्ट्र महासंघ में विटो का इस्तेमाल नही करेगा जैसा कि रूस भारतीय हितों की रक्षा के लिए समय समय पर करता रहा है। अमेरिका भारत को रक्षा उपकरणों के बड़े बाजार के तौर पर देखता है। ट्रंप ने भारत, चीन और ब्राजील को सबसे ज्यादा शुल्क लगाने वाले देश करार दे दिया है।
 
ट्रंप का कहना है कि उनका प्रशासन अमेरिका फर्स्ट यानी अमेरिका पहले की नीति पर काम करेगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए कहा है कि जो देश अमेरिका पर जितना टैरिफ लगाएगा, उसके बदले में अमेरिका भी 2 अप्रैल से उस देश पर उतना ही टैरिफ लगाएगा। ट्रंप के इस एलान ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। चीन जो पहले ही ट्रंप के टैरिफ से जूझ रहा है, उसने अमेरिका को धमकी दे डाली है।
 
चीन के विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर साझा एक पोस्ट में लिखा है कि अगर अमेरिका युद्ध ही चाहता है, फिर चाहे वो टैरिफ युद्ध हो या फिर व्यापार युद्ध या किसी भी तरह का युद्ध तो हम तैयार हैं और अंत तक इस लड़ाई को लड़ेंगे। अमेरिका को चेतावनी देते हुए लिखा कि फेंटानिल का मुद्दा बनाकर अमेरिका चीन से आने वाले सामान पर टैरिफ बढ़ा रहा है। ऐसे में अपने हितों को सुरक्षित रखना हमारा अधिकार है। अमेरिका के फेंटानिल संकट के लिए न अमेरिका और न ही कोई और जिम्मेदार है।
 
इसके बावजूद मानवता और अमेरिका के प्रति समर्थन जताते हुए हमने इसके खिलाफ कड़े कदम उठाए। इसके बावजूद हमारी कोशिशों को मानने के बजाय अमेरिका, हम पर ही आरोप लगा रहा है और चीन को ही टैरिफ बढ़ाने के नाम पर ब्लैकमेल कर रहा है। वे हम पर उनकी मदद के लिए दबाव बना रहे हैं। इस तरह से अमेरिका की परेशानी हल नहीं होगी और इससे हमारे द्विपक्षीय संबंध और सहयोग भी कमजोर होगा। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि धमकी देकर हमें डराया नहीं जा सकता। दबाव या धमकी चीन से डील करने का सही तरीका नहीं है।
 
जो भी चीन पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। अगर अमेरिका सच में फेंटानिल समस्या से निपटना चाहता है तो सही तरीका ये है कि चीन से बात करे और एक दूसरे को पूरा सम्मान दें। फेंटानिल की अवैध तस्करी हर साल अमेरिका के करोड़ों डॉलर और हजारों नागरिक निगल जाती है। फेंटानिल, कोकीन और हिरोइन के तरह एक मादक पदार्थ है परन्तु यह कोकीन-हिरोइन के उल्ट पूर्ण रूप से केमिकल्स से बनने वाला सिंथेटिक ड्रग है।
 
इसकी तस्करी अमेरिका में मैक्सिको, कोलम्बिया और कनाडा से होते है परन्तु इस ड्रग को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कैमिकल्स भारी मात्रा में चीन बनाता है और चीन अवैध रूप से इन कैमिकल्स को मेक्सिको आदि देशों में पहुंचाता है, जहां ड्रग माफिया इन कैमिकल्स से फेंटानिल तैयार कर अमेरिका पहुंचाते है। इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका में फेंटानिल का कारोबार चीन ही चला रहा है। चीन ने अमेरिका में फेंटानिल युद्ध वैसे ही आरंभ किया है जैसे ब्रिटेन ने 19वी शताब्दी में चीन में अफीम युद्ध का आगाज किया था।
 
जिसके कारण चीन को हांगकांग और मोटी रकम हर्जाने के तौर पर ब्रिटेन को सौंपनी पड़ी थी। ट्रंप ड्रग कार्टेल को आतंकवादी संगठन कह चुके हैं। यदि ट्रंप सरकार कोई ऐसा कानून बना देती है जिसमें ड्रग कार्टेलों को आतंकवादी संगठन घोषित किया जाए, तब सरकार की कार्टेलों के बारे में सैन्य खुफिया जानकारी एकत्र करने और इन समूहों को कोई भी भौतिक सहायता प्रदान करने वाले लोगों पर मुकदमा चलाने की क्षमता बढ़ जाएगी। इससे अमेरिकी सरकार के लिए कार्टेलों के खिलाफ सीधे सैन्य हस्तक्षेप का आदेश देना राजनीतिक रूप से आसान हो जाएगा।
 
उदाहरण के तौर पर ट्रम्प के पहले कार्यकाल के दौरान, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स को एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया गया। इसके प्रमुख जनरल कासिम सुलेमानी को एक साल से भी कम समय बाद अमेरिकी ड्रोन हमले में मार दिया गया था। वैसे ड्रग माफिया को आतंकवादी करार देना अमेरिका के लिए आसान नही होगा क्योंकि इसका अमेरिकी नागरिकों पर भी असर पड़ेगा। 

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